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'ब्रांड मोदी' को घेरने के लिए राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला पॉलिटिक्स’... औचक वार, छोटा दस्ता और सरकार पर सीधा प्रहार

राहुल गांधी की हालिया राजनीति में औचक कार्रवाई, अचानक धरना और छोटे समूह के साथ विरोध दर्ज कराने का तरीका चर्चा में है. भट्टा-पारसौल से लेकर हाल के प्रदर्शनों तक उनके राजनीतिक अंदाज में अचानक एक्शन और सीधे टकराव की झलक दिखाई देती है. उनके करीबी इसे सियासी नफा-नुकसान से अलग फैसले लेने की उनकी शैली बताते हैं. वहीं, कांग्रेस की राजनीति में राहुल गांधी की इस छवि को सरकार के सामने एक अलग राजनीतिक ब्रैंड के तौर पर पेश करने की कोशिश दिखाई देती है.

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राहुल गांधी लगातार मोदी सरकार को घेरने के लिए ‘गुरिल्ला रणनीति’ का इस्तेमाल करते दिख रहे हैं (Photo: X/@INCIndia)
राहुल गांधी लगातार मोदी सरकार को घेरने के लिए ‘गुरिल्ला रणनीति’ का इस्तेमाल करते दिख रहे हैं (Photo: X/@INCIndia)

कभी अचानक धरना, कभी थाने की ओर कूच, कभी बिना किसी पूर्व सूचना के किसी जगह पहुंच जाना-राहुल गांधी की राजनीति में ‘सरप्राइज’ अब रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है.

औचक एक्शन, कानों-कान खबर नहीं

राहुल गांधी लगातार मोदी सरकार को घेरने के लिए ‘गुरिल्ला रणनीति’ का इस्तेमाल करते दिख रहे हैं.

कभी औचक धरना, कभी पुलिस थाने की ओर कूच, तो कभी अचानक किसी जगह पहुंच जाना-कानों-कान किसी को खबर नहीं। किसी को शक न हो, इसलिए साथ में बड़ी भीड़ भी नहीं. कभी अकेले पहुंचना, तो कभी छोटे से दस्ते के साथ.

राहुल गांधी बार-बार यह पैंतरा इस्तेमाल कर रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि इस तरह की रणनीति उनके लिए बिल्कुल नई नहीं है. इसकी झलक बहुत पहले भट्टा-पारसौल में दिखाई दी थी, जब वह बाइक पर सवार होकर किसानों से मिलने पश्चिमी उत्तर प्रदेश पहुंच गए थे.

पुराना पैंतरा, अब ज्यादा धार

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उनकी इस रणनीति में तीव्रता आई है. राहुल गांधी पहले भी कह चुके हैं कि वह अपने विरोधियों को ‘न्यूट्रल’ करने के लिए उनकी कमजोरियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं.

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उनको यह प्रेरणा उनका मार्शल आर्ट में कौशल से मिली है. राहुल गांधी मार्शल आर्ट्स की कई विधाओं का अभ्यास करते रहे हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी वह दिन भर चलने के बाद शाम को भारत यात्रियों के मार्शल आर्ट्स के ट्रेनिंग सेशन लेते  थे.

धरना पॉलिटिक्स के लिए फिटनेस का फॉर्मूला

दिलचस्प बात यह है कि धरना पॉलिटिक्स के लिए भी जबरदस्त ऊर्जा की जरूरत होती है. राहुल गांधी एक रील में खुद बता चुके हैं कि तमाम व्यस्तताओं के बावजूद वह फिजिकल फिटनेस को बेहद जरूरी मानते हैं और रोज करीब एक घंटे कसरत करते हैं.

यह भी पढ़ें: राहुल-प्रियंका धरने के लिए जंतर-मंतर नहीं जा पाए, पुलिस ने दो घंटे हिरासत में रखकर छोड़ा

हकीकत यह है कि राहुल गांधी ये बातें पहले भी कहते रहे हैं, लेकिन कुछ साल पहले उनकी बातों के मायने अलग थे. आज उन्हीं बातों और तौर-तरीकों को ज्यादा गौर से देखा जा रहा है. खास तौर पर तब, जब जमीनी और धरना पॉलिटिक्स में कांग्रेस उनकी इस छवि को भुनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही.

‘अड़ियल’ तेवर या सोची-समझी रणनीति?

हाल के दिनों में राहुल गांधी लगातार अपनी आक्रामक रणनीति से सरकार को घेर रहे हैं. चाहे प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ते हुए धरने पर बैठना हो या संसद मार्ग पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज जाने दिए जाने तक वहीं अड़े रहने की जिद - हर बार कोशिश टकराव के राजनीतिक संदेश को और धार देने की दिखती है.

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धरना पॉलिटिक्स में राहुल गांधी का यह अड़ियल रवैया उनके हर सियासी वार को और आक्रामक बना रहा है.

राहुल गांधी के करीबी मानते हैं कि वह सही और गलत का फैसला सियासी नफा-नुकसान के तराजू पर नहीं तौलते. कई बार उन्होंने ऐसे फैसले लिए हैं जिनका खामियाजा भी उन्हें उठाना पड़ा, लेकिन उनके साथ काम करने वाले कहते हैं - वह जो सोचते हैं, वही करते हैं.

ब्रैंड मोदी के सामने ‘एंटी-मोदी’ ब्रैंड?

राहुल गांधी के सामने चुनौती बड़ी है. सामने ‘ब्रैंड मोदी’ की मजबूत और स्थापित राजनीतिक विरासत है. ऐसे में राहुल गांधी के व्यक्तित्व को मोदी से बिल्कुल विपरीत राजनीतिक ब्रैंड के तौर पर पेश करने की कोशिश दिखाई देती है.

एक तरफ नियंत्रित और स्थापित सत्ता का ब्रैंड, दूसरी तरफ औचक एक्शन, सड़क पर उतरने और टकराव मोल लेने वाली राजनीति.

अब जनता को तय करना है कि आने वाले सियासी रण में उसे कौन-सा ब्रैंड ज्यादा पसंद आता है.

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