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जमीन, प्रमोशन और मेडल... भगत सिंह को फांसी दिलाने वाले अफसरों-गवाहों को अंग्रेजों ने क्या-क्या दिया?

लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह को फांसी दिलाने में मदद करने वाले अफसरों और सरकारी गवाह बनने वालों को ब्रिटिश सरकार ने जमीन, नकद इनाम, प्रमोशन और मेडल देकर नवाजा था. ये कहानी बताती है कि अंग्रेज अपना मकसद पूरा करने के लिए कैसे वफादारियां और निष्ठा खरीदते थे.

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आज भगत सिंह की जयंती है.
आज भगत सिंह की जयंती है.

आज 28 सितंबर को शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती है. देश भर में उनके बलिदान और क्रांतिकारी विचारों को याद किया जा रहा है. इतिहास में ऐसे कम नायक होते हैं जिन्हें भगत सिंह जैसा सम्मान मिल पाता है. वे वामपंथियों, दक्षिणपंथियों में समान रूप से प्रिय हैं. भारत की आजादी और भगत सिंह की जिंदगी में लाहौर षड्यंत्र केस अहम चैप्टर है. 

भगत सिंह को सजा क्यों मिली थी? 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को अमानवीय 'पब्लिक सेफ्टी बिल' के विरोध में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका. उन्होंने अपनी मांगें साफ करने के लिए हाथ से लिखे कुछ पर्चे भी फेंके.

यह कम तीव्रता वाला बम था, जिसका मकसद लेजिस्लेटिव असेंबली के किसी सदस्य को मारना या घायल करना नहीं था. धमाके के बाद मचे शोर-शराबे के बीच भगत सिंह और बी.के. दत्त वहीं खड़े रहे और बाद में खुद पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. 

भगत सिंह की मंशा हिंसा कभी नहीं रही, वे अंग्रेजी सत्ता को चेताना चाहते थे. 

राय बहादुर सूर्यनारायण थे अंग्रेजों के वकील

इस मुकदमे की सुनवाई 7 मई को ब्रिटिश मजिस्ट्रेट बी.पी. पूल के सामने शुरू हुई. भगत सिंह और बी.के. दत्त की तरफ से इंडियन नेशनल कांग्रेस के सदस्य आसिफ अली पेश हुए, जबकि सरकारी वकील राय बहादुर सूर्यनारायण थे. 

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यह नतीजा निकालते हुए कि भगत सिंह और बी.के. दत्त ने "किंग मेजेस्टी की प्रजा को मारने या घायल करने" के इरादे से बम फेंका था, जज ने आरोप तय किए और दोनों क्रांतिकारियों को ब्रिटिश जज लियोनार्ड मिडलटन की अध्यक्षता वाली सेशंस कोर्ट में भेज दिया.

इस मामले में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.
 
जज श्री किशन को ब्रिटिश सरकार ने 'राय साहिब' का टाइटल दिया

लेकिन ब्रिटिश सरकार इतने से ही संतुष्ट नहीं थी. भगत सिंह का नाम एक और मामले से जोड़ा गया. ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स और हेड कॉन्स्टेबल चनन सिंह की हत्या. पुलिस ने अपना मामला इस आधार पर बनाया कि असेंबली चैंबर में भगत सिंह द्वारा फेंके गए पर्चों की लिखावट और सॉन्डर्स की हत्या के बाद लाहौर में कई जगहों पर चिपकाए गए पर्चों की लिखावट एक जैसी थी. 

इस मामले को 'लाहौर षड्यंत्र केस' के नाम से जाना जाता है. सॉन्डर्स और चनन सिंह की हत्या के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर मुकदमा चलाया गया. लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई बोरस्टल जेल में शुरू हुई. इंडिया टुडे के मुताबिक इसकी सुनवाई फर्स्ट-क्लास मजिस्ट्रेट पंडित श्री किशन ने की, जिन्हें बाद में ब्रिटिश सरकार ने 'राय साहिब' की उपाधि दी थी. 

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'लाहौर षड्यंत्र केस' में 7 अक्टूबर 1930 को विशेष न्यायाधिकरण ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को जॉन सांडर्स की हत्या के लिए मृत्युदंड सुनाया. 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को फांसी दे दी गई.

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर चले इस मुकदमे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ. आरोपियों को कभी भी ट्रिब्यूनल के सामने पेश नहीं किया गया. उनका पक्ष नहीं सुना गया. बचाव पक्ष के वकील को अभियोजन पक्ष के लगभग 450 गवाहों से जिरह करने की इजाज़त नहीं दी गई. बचाव पक्ष के वकील को केवल उन्हीं गवाहों से जिरह करने की अनुमति दी गई जो सरकारी गवाह बन गए थे. 

सरकारी गवाहों की दिलचस्प कहानी

बाद में इन सरकारी गवाहों को ब्रिटिश सरकार ने उपकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 

पंजाब के एक आईएएस अधिकारी आर.के. कौशिक ने भारत और पाकिस्तान के अभिलेखों की गहन पड़ताल कर यह जानकारी सामने रखी थी. उन्होंने अपने शोध के आधार पर यह लिखा है कि  भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने अपने ‘सहयोगियों’ को जमीन, नकद इनाम, प्रमोशन और पदक देकर नवाजा. इससे जुड़ा उनका लेख हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था. 

 भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के चार साथी हंस राज वोहरा, जय गोपाल, फणींद्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी सरकारी गवाह बन गए थे. वे पंजाब पुलिस द्वारा इस मामले में पेश किए गए 457 गवाहों में शामिल थे. फांसी के बाद उन चारों को इनाम दिया गया. 

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वोहरा ने पैसे के रूप में कोई लाभ लेने से इनकार कर दिया. लेकिन पंजाब सरकार ने उन्हें स्पॉन्सर किया और उन्हें प्रतिष्ठित लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ने का मौका मिला. 

पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स करने के बाद उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म की डिग्री हासिल की. 1936 में लाहौर लौट आए. 1942 में ब्यूरो ऑफ़ पब्लिक इन्फॉर्मेशन में असिस्टेंट इन्फॉर्मेशन ऑफ़िसर नियुक्त हुए और 1948 तक लाहौर के 'सिविल एंड मिलिट्री गज़ट' के संवाददाता रहे.

लेखक कुलदीप नैयर ने अपनी किताब 'द मार्टर: भगत सिंह - एक्सपेरिमेंट्स इन रेवोल्यूशन' (2000) में बताया है कि 1929-30 के लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई के दौरान वोहरा की गवाही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत की सज़ा सुनाए जाने में बहुत अहम थी.

नगद इनाम और जमीन

जय गोपाल को 20,000 रुपये का इनाम मिला. फणींद्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी को ब्रिटिश सरकार के प्रति उनकी सेवाओं और वफ़ादारी के बदले बिहार के चंपारण ज़िले में 50-50 एकड़ ज़मीन मिली. द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार फणींद्र नाथ घोष की सुरक्षा के लिए सरकार ने एक जवान नियुक्त किया था. 

घोष लाहौर षड्यंत्र मामले में सरकारी गवाह बन गए थे.  रिपब्लिकन आर्मी के सदस्यों को लगा कि अन्य गवाहों की तुलना में घोष की गवाही ही उन तीन क्रांतिकारियों को फांसी दिए जाने के लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार थी. 

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फणीन्द्र घोष कई अन्य मामलों में भी सरकारी गवाह बने थे. द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार हाजीपुर के गांधी आश्रम में उनके साथी क्रांतिकारियों ने उन्हें मारने की योजना बनाई और इस काम को अंजाम देने के लिए बैकुंठ शुक्ल को चुना गया. 

योजना के अनुसार बैकुंठ ने चंद्रमा सिंह के साथ मिलकर 9 नवंबर, 1932 को बेतिया के मीना बाज़ार में फणींद्र नाथ और उनके दोस्त गणेश प्रसाद गुप्ता पर जानलेवा हमला किया. यह एक बेहद साहसी ऑपरेशन था. जिसे उस कॉन्स्टेबल की मौजूदगी में अंजाम दिया गया, जिसे सरकार ने घोष के सरकारी गवाह बनने के बाद उनकी सुरक्षा के लिए तैनात किया था. 

फणींद्र नाथ घोष ने अपने डाइंग डिक्लेरेशन में किसी का नाम नहीं लिया और 17 नवंबर, 1932 को उनकी मौत हो गई, जबकि उनके दोस्त की मौत तीन दिन बाद 20 तारीख को हुई. इस मामले में बैकुंठ शुक्ल को फांसी हुई. 

जेल के अफसरों को इनाम 

भगत सिंह की फांसी को अंजाम देने वाले अफसरों को भी बड़े लाभ मिले. हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार जेल सुपरिंटेंडेंट मेजर पी.डी. चोपरा को फांसी के महज दो दिन बाद पंजाब के DIG (प्रिजन) का प्रमोशन मिला. 

डिप्टी जेल सुपरिटेंडेंट खान साहिब मोहम्मद अकबर खान जो भगत सिंह और उनके दो साथियों को फांसी दिए जाने के बाद रो पड़े थे, उन्हें सस्पेंड कर दिया गया था, लेकिन बाद में उन्हें असिस्टेंट जेल सुपरिटेंडेंट के तौर पर वापस रख लिया गया. हालांकि 7 मार्च 1931 को उनसे 'खान साहिब' का ख़िताब वापस ले लिया गया. 

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अगला नंबर आता है पंजाब के जेल महानिरीक्षक (IG) लेफ्टिनेंट कर्नल एफ.ए. बार्कर का. बार्कर को 'सर' की नाइटहुड उपाधि से सम्मानित किया गया और उन्हें रिटायरमेंट से पहले भारत से बाहर जाने की छुट्टी मंज़ूर की गई. 

द ट्रिब्यून में छपी रिटायर्ड आईएएस आर के कौशिक की रिपोर्ट अनुसार भगत सिंह फांसी दिए जाने के कुछ दिनों बाद ही पंजाब के DIG (जेल) लेफ्टिनेंट कर्नल NR पुरी को पंजाब का IG (जेल) बना दिया गया. 

लाहौर षड्यंत्र मामले की जांच करने वाले अधिकारी SP खान बहादुर शेख अब्दुल अज़ीज़ को समय से पहले ही 'सिलेक्शन ग्रेड SP' के पद पर प्रमोट कर दिया गया, जिसके चलते तीन साल बाद उन्हें DIG के पद पर प्रमोशन मिला. भारत में ब्रिटिश शासन के 200 सालों के इतिहास में यह इकलौता ऐसा मामला था, जिसमें हेड कॉन्स्टेबल के तौर पर नौकरी शुरू करने वाला व्यक्ति DIG के पद से रिटायर हुआ. 

खान बहादुर अब्दुल अज़ीज़ के सबसे बड़े बेटे मसूद अज़ीज़ को नवंबर 1931 में पंजाब पुलिस में नॉमिनेशन के ज़रिए DSP के पद पर नियुक्त किया गया था.  खान बहादुर को लायलपुर में 50 एकड़ ज़मीन भी दी गई थी. 

DSP सुदर्शन सिंह जिन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शवों का अंतिम संस्कार किया था, उन्हें कसूर में एडिशनल सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (ASP) के पद पर प्रमोट किया गया. बाद में वे सितंबर 1942 में पंजाब पुलिस के SP के तौर पर रिटायर हुए.

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लाहौर के रहने वाले कश्मीरी राय साहिब पंडित श्री कृष्ण  फांसी के समय कसूर के SDM थे. वे पहले इस मामले में ट्रायल मजिस्ट्रेट थे. उन्हें गवर्नर की ओर से "प्रशंसा पत्र" दिया गया और बाद में नियमों से हटकर ADM के पद पर प्रमोट किया गया.  बटाला में जन्मे शेख अब्दुल हमीद जो लाहौर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट थे, और अटक में जन्मे राय साहिब लाला नाथू राम जो लाहौर के सिटी मजिस्ट्रेट थे, उन्हें भी पंजाब के गवर्नर FW डीमोंटमोरेंसी (FW DeMont'morency) ने व्यक्तिगत रूप से सराहा. 

आज जब देश भगत सिंह की जयंती मना रहा है, यह याद रखना जरूरी है कि उनके बलिदान के पीछे सिर्फ ब्रिटिश अदालत का फैसला नहीं था, बल्कि एक पूरी व्यवस्था थी जिसे अंग्रेजों ने साजिश कर तैयार किया था. वे भारतीयों की खुद्दारी को पैसे, पद और प्रतिष्ठा का लालच देकर खरीदते थे.  

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