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बेंगलुरु का फ्रीडम पार्क बना दक्षिण भारत का 'जंतर-मंतर', मीम्स और इंस्टाग्राम से शुरू हुआ Gen-Z का प्रदर्शन

बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में पिछले 10 दिनों से बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के युवा आंदोलन चल रहा है जो मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, मीम्स और लाइव स्ट्रीम के जरिए फैल रहा है.

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दक्षिण भारत का जंतर-मंतर बना बेंगलुरु का फ्रीडम पार्क. (photo:Social Media)
दक्षिण भारत का जंतर-मंतर बना बेंगलुरु का फ्रीडम पार्क. (photo:Social Media)

पिछले 10 दिनों से बेंगलुरु का फ्रीडम पार्क शहर के सामान्य प्रदर्शन स्थल से बदलकर देश की युवा पीढ़ी के एक बड़े आंदोलन का केंद्र बन गया है, जहां करीब हर रोज  1,000 से 3,000 युवा इकट्ठा हो ते थे. बिना किसी राजनीतिक बैनर, छात्र संगठन या केंद्रीय नेतृत्व के शुरू हुआ ये आंदोलन मुख्य रूप से इंस्टाग्राम, मीम्स और लाइव स्ट्रीम के जरिए लोगों तक पहुंचा.

जैसे-जैसे दिल्ली के जंतर मंतर से वीडियो, मीम्स और लाइव स्ट्रीम सोशल मीडिया पर वायरल हुए. उसके साथ-साथ बेंगलुरु के हजारों युवा इस प्रदर्शन से जुड़ गए. बताया जा रहा है कि कई लोग दिल्ली जाना चाहते थे,  लेकिन काम, पढ़ाई या पैसों की कमी की वजह से नहीं जा पाए. फ्रीडम पार्क उनके लिए एक विकल्प बन गया.

प्रदर्शन में पहुंचे युवा हाथ से बने पोस्टर, पोर्टेबल स्पीकर लेकर आए, जिसमें वह नारे और म्यूजिक चला रहे थे. साथ ही वॉलंटियर्स ने पीने के पानी बोतले बांट रहे थे और अजनबी जल्दी ही साथी बन गए. प्रदर्शन के दौरान हिंदी, अंग्रेजी के नारों के साथ-साथ कन्नड़ नारे में भी गूंज रहे थे. भाषणों के बीच कविता-पाठ का दौर भी चला और विरोध-प्रदर्शन के पोस्टरों में बेंगलुरु का खास स्थानीय मज़ाक और बोलचाल की भाषा झलक रही थी.

बेंगलुरु के वकील अभिषेक ने बताया कि इस प्रदर्शन में उनकी भागीदारी ऑनलाइन शुरू हुई थी. वो हर रात कम से कम एक घंटा  जंतर-मंतर के मीम्स और वीडियो देखते हुए बिताता था. इससे मुझे एक अजीब-सा जोश मिलता था. मैं इसका हिस्सा बनना चाहता था. भले ही मैं 'Gen-Z' का हिस्सा नहीं हूं, लेकिन वो जो कर रहे थे, उससे मैं जुड़ा हुआ महसूस करता था.

उन्होंने दावा किया कि उन्होंने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों को मैकडॉनल्ड्स से 5 बर्गर भी भेजे थे. स्क्रीन पर देखने के बाद वो खुद फ्रीडम पार्क पहुंचे.

शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक पर नाराजगी

वहीं, मार्केटिंग में काम करने वाली रिया ने काम छोड़कर इस आंदोलन में भाग लिया और मौके पर ही ऑनलाइन पोस्टर मंगवाकर प्रदर्शन का हिस्सा बनीं.

रिया ने बताया कि मीम्स ने लोगों का ध्यान खींचा, लेकिन मुख्य मुद्दा पेपर सिस्टम और जवाबदेही का था. उन्होंने कहा कि ये केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का मामला नहीं है, बल्कि युवाओं को हल्के में लिए जाने का विरोध है. रिया ने अपने बीजेपी समर्थक परिवार और पिता से तीन बार बहस करने के बाद फ्रीडम पार्क पहुंचकर युवाओं के अधिकारों और शिक्षा सुधार के पक्ष में अपनी आवाज उठाई.

राजनीतिक दलों की गैरमौजूदगी में बढ़ा आंदोलन

बेंगलुरु में हुए विरोध प्रदर्शन की सबसे खास बात ये रही कि ये किसी राजनीतिक पार्टी के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रहा. कोई बड़ा राजनीतिक नेता मंच पर नहीं आया. हालांकि, कुछ फिल्मों में काम कर चुके कलाकारों ने संक्षिप्त उपस्थिति दर्ज कराई. हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत बेंगलुरु पुलिस ने भी काफी संयमित रुख अपनाया. पुलिस ने यातायात को सुचारू रखा और सीमा के अंदर शांतिपूर्ण प्रदर्शन बनाए रखने के लिए आयोजकों का सहयोग किया.

ऑनलाइन शुरू हुआ ये आंदोलन फ्रीडम पार्क में एक अनुशासित और स्वतःस्फूर्त जनसभा में बदल गया. रोजाना का प्रदर्शन खत्म होने के बाद युवाओं ने बिना किसी टकराव या बैरिकेड तोड़ने के प्रयास के खुद ही स्थल खाली कर दिया. फ्रीडम पार्क के इस प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि इंस्टाग्राम और डिजिटल चर्चाओं से जुड़े युवा अब सिर्फ फोन स्क्रीन पर इतिहास बनते देखने के बजाय खुद सड़क पर उतरकर बदलाव लाने के लिए तैयार हैं.

लगभग 10 दिनों तक फ्रीडम पार्क का माहौल जंतर-मंतर जैसा रहा- ऐसा इसलिए नहीं कि दोनों विरोध प्रदर्शन एक जैसे थे, बल्कि इसलिए क्योंकि वो एक ही पीढ़ी, एक जैसी डिजिटल बातचीत और इस सोच से जुड़े थे कि फोन की स्क्रीन पर इतिहास बनते देखना अब काफी नहीं है.

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