जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नेशनल कॉन्फ्रेंस में जारी मतभेद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला को दो पन्नों की तल्ख चिट्ठी लिखी है.
मेहदी ने बताया है कि वो लोकसभा से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं, लेकिन पद छोड़ने से पहले पार्टी नेतृत्व को धारा 370 पर बदले अपने रुख के लिए जनता को जवाब देना होगा.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रुहुल्लाह 3 नवंबर 2026 को संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे सकते हैं. ये तारीख उनकी जिंदगी में बेहद खास है क्योंकि इसी दिन (3 नवंबर 2000) उनके पिता आगा सैयद मेहदी की आतंकियों ने आईईडी धमाके में हत्या कर दी थी.
'इस्तीफा तो आप बिना मांगे ले लें, लेकिन पहले जवाबदेही तय हो'
फारूक अब्दुल्ला के सार्वजनिक रूप से उनका इस्तीफा मांगे जाने के जवाब में रुहुल्लाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पत्र शेयर किया. उन्होंने लिखा, 'इस्तीफा तो आपके बिना मांगे भी आ जाएगा, लेकिन उससे पहले जवाबदेही तय होनी चाहिए. मैं उन सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा हूं जो मैंने पत्र में पूछे हैं.'
अपनी चिट्ठी में शिया नेता रुहुल्लाह ने लिखा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस की मौजूदा स्थिति अब बीजेपी के रुख से अलग नहीं लग रही है. उन्होंने कहा, 'कड़वा सच ये है कि हम धारा 370 की मांग तक नहीं कर रहे, हम तो राज्य के दर्जे के लिए भीख मांग रहे हैं, जो कि एक ऐसा अधिकार है जिसे खुद सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है.'
2024 के घोषणापत्र पर उठाए सवाल
पार्टी के कोर नैरेटिव पर सवाल उठाते हुए श्रीनगर सांसद ने याद दिलाया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 2024 का विधानसभा चुनाव धारा 370 और 35A की बहाली के वादे पर लड़ा और जीता था. उन्होंने पूछा, 'आज हम सहूलियत के हिसाब से ये तर्क दे रहे हैं कि जिस सरकार ने धारा 370 हटाई, वो इसे कभी वापस नहीं देगी. ये तर्क सही हो सकता था, लेकिन जब 2024 में हमने घोषणापत्र बनाया था, तब भी केंद्र में बीजेपी की ही सरकार थी. फिर हमने अपने मेनिफेस्टो में धारा 370 की बहाली का वादा क्यों शामिल किया?'
रुहुल्लाह ने आगे लिखा, 'क्या हम ऐसे वादे कर रहे थे जिन्हें हम जानते थे कि पूरा नहीं कर सकते? या क्या हमने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के लोगों को मिले जख्मों का इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक फायदे लेने के लिए किया, ताकि सरकार बनने के बाद वादों को भुलाया जा सके? अगर ऐसा है तो ये सिर्फ राजनीतिक भूल नहीं, बल्कि एक पाप और नाकामी है.'
'स्वायत्तता प्रस्ताव पारित करने वाले फारूक अब्दुल्ला अब क्यों चुप हैं?'
रुहुल्लाह ने फारूक अब्दुल्ला के पिछले कार्यकाल का जिक्र करते हुए उन्हें याद दिलाया, 'मैं ये सवाल अनादर में नहीं पूछ रहा हूं. मुझे याद है कि आप उसी विधानसभा के मुख्यमंत्री थे जिसने जुलाई 2000 में स्वायत्तता प्रस्ताव पारित किया था. उसके लिए भी हिम्मत की जरूरत थी. फिर अब जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों का जिक्र करना इतना नागवार क्यों गुजर रहा है कि आपको सार्वजनिक रूप से मेरा इस्तीफा मांगना पड़ा?'
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उन्होंने कहा कि आज जम्मू-कश्मीर की 65 फीसदी युवा आबादी बेरोजगारी से जूझ रही है. हमारी जमीन, प्राकृतिक संसाधन, भाषा और संस्कृति पर लगातार दबाव है. ऐसे में जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य बीजेपी के सामने घुटने टेकना नहीं, बल्कि लोगों के अधिकारों के लिए लड़ना है.