फरीदाबाद के किसान रामेश्वर शर्मा ने मूली की खेती के लिए खेत किराए पर लिया, बीज खरीदा और फसल तैयार करने में अपनी जमा-पूंजी लगा दी. लेकिन जब फसल उगने लगी तो उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया. मूली बनने के बजाय पौधों में बालियां निकलने लगीं. हालत ऐसी हो गई कि बाजार में कोई उनकी मूली खरीदने को तैयार नहीं हुआ. इसके बाद किसान ने दुकानदार के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की. करीब तीन साल बाद फैसला आया, लेकिन मुआवजे की रकम से किसान संतुष्ट नहीं है.
बीज में मिलावट का आरोप, फसल हुई बर्बाद
यह मामला फरीदाबाद के किसान रामेश्वर शर्मा का है. उन्होंने नवंबर 2023 में एक निजी बीज भंडार से टाइकोन वैरायटी का मूली का बीज खरीदा था. किसान ने एक एकड़ खेत 60 हजार रुपये में किराए पर लिया था. इसके अलावा खाद, जुताई और बीज पर भी खर्च किया. उन्हें उम्मीद थी कि मूली की फसल से अच्छी कमाई होगी, लेकिन बुवाई के करीब 20 दिन बाद ही पौधों में बालियां निकलने लगीं. मूली तैयार नहीं हुई और पूरी फसल बर्बाद हो गई.
रामेश्वर शर्मा का दावा है कि दुकानदार और कंपनी के सर्वेयर ने भी बीज में करीब 90 प्रतिशत मिलावट होने की बात मानी थी. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती है.
2 लाख रुपये के मुआवजे की मांग, कोर्ट ने दिए 50 हजार
फसल बर्बाद होने के बाद किसान ने दुकानदार से समझौता करने के बजाय उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराने का फैसला किया. रामेश्वर ने फसल के नुकसान, मानसिक परेशानी और वकील की फीस समेत कुल 2 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की.
किसान के मुताबिक, 2023 से 2026 के बीच उन्हें 15 से 20 बार कोर्ट की तारीखों पर जाना पड़ा. इस दौरान वकील की फीस और दूसरे खर्चों में भी उनकी रकम लगी. करीब तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद उपभोक्ता फोरम ने दुकानदार को दोषी माना और 50 हजार रुपये मुआवजा देने का फैसला सुनाया.
'अब 50 हजार रुपये में क्या होगा?'
फैसले के बाद रामेश्वर शर्मा का कहना है कि फसल बर्बाद होने से उन्हें पहले ही बड़ा नुकसान हुआ था. इसके बाद इंसाफ पाने के लिए तीन साल तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े. उनका सवाल है कि जब खेती में लगी लागत और कानूनी लड़ाई का खर्च इतना अधिक हो गया, तो 50 हजार रुपये के मुआवजे से क्या फायदा होगा?
किसान के मुताबिक, वह इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, लेकिन अब पंचकूला में अपील करने के पक्ष में भी नहीं हैं. उनका कहना है कि वहां आने-जाने में ही करीब 50 हजार रुपये खर्च हो सकते हैं. ऐसे में मुआवजे की रकम अपील के खर्च में ही निकल जाएगी.
रामेश्वर शर्मा की यह लड़ाई खेती में इस्तेमाल होने वाले बीज की गुणवत्ता और किसानों को होने वाले आर्थिक नुकसान का सवाल भी उठाती है. किसान के लिए खराब बीज का नुकसान सिर्फ एक फसल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी लागत, मेहनत और न्याय पाने की लड़ाई भी उससे जुड़ जाती है.