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भारत के छोटे हथियारों के कारखानों पर संकट: 600 करोड़ का नुकसान और खाली पड़ी मशीनें, संसद समिति ने जारी की रिपोर्ट

संसद की स्थायी समिति ने भारत के छोटे हथियारों के कारखानों की खराब स्थिति पर चिंता जताई है. रिपोर्ट में उत्पादन क्षमता के खाली बैठने, 600 करोड़ रुपये से अधिक नुकसान, और गुणवत्ता में गंभीर खामियों का खुलासा हुआ है. सेना से मांग कम होने के कारण कारखानों को गृह मंत्रालय के ऑर्डर्स पर निर्भर रहना पड़ रहा है.

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भारत में छोटे हथियारों के कारखानों को लगातार नुकसान हो रहा है. (फाइल फोटो-PTI)
भारत में छोटे हथियारों के कारखानों को लगातार नुकसान हो रहा है. (फाइल फोटो-PTI)

देश की सुरक्षा से जुड़े हथियारों के प्रोडक्शन को लेकर चिंताजनक खबर सामने आई है. संसद की एक स्थायी समिति ने भारत के छोटे हथियारों बनाने वाले कारखानों की बदहाली पर कड़ा रुख अपनाया है. स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि पिछले कुछ सालों में इन कारखानों को 600 करोड़ रुपये से ज्यादा का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा बिना किसी काम के खाली बैठा है.

यह रिपोर्ट एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) को लेकर आई है, जो रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली एक सरकारी कंपनी (DPSU) है. यह देश में छोटे हथियारों के कारखानों का संचालन करती है. आइए जानते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या-क्या बड़े खुलासे हुए हैं.

सेना से नहीं मिली मांग, सिर्फ 10% हिस्सेदारी

संसद समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015-16 से लेकर 2019-20 के बीच सेना की तरफ से इन छोटे हथियारों के कारखानों को बहुत ही कम मांग मिली. इन पांच सालों में भारतीय सेना की कुल आपूर्ति में हिस्सेदारी महज 10% रही।

कारखानों को चलाने के लिए मुख्य रूप से गृह मंत्रालय (MHA) के ऑर्डर्स पर निर्भर रहना पड़ा, जो कि सभी फैक्ट्रियों की उत्पादन क्षमता को पूरी तरह इस्तेमाल करने के लिए नाकाफी थे.

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समिति ने सुझाव दिया है कि रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राज्य पुलिस बलों के साथ मिलकर एक लंबी अवधि की मांग योजना तैयार करे, ताकि अचानक ऑर्डर्स कम होने पर फैक्ट्रियां खाली न बैठें.

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फैक्ट्रियों की वित्तीय स्थिति बेहद दयनीय हो गई है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 से 2020 के बीच सिर्फ 12 चुनिंदा छोटे हथियारों के उत्पादन में ही इन तीन फैक्ट्रियों को 366 करोड़ रुपये का संचयी घाटा हुआ. कंपनी बनने के बाद वित्त वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दौरान भी 234 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया.

समस्या यह है कि कारखानों में प्रॉडक्शन की लागत बहुत ज्यादा है, जबकि बाजार में बेचने की कीमत लागत से कम तय की जाती है. समिति ने सलाह दी है कि लागत को कम करने के लिए प्राइवेट डिफेंस कंपनियों से मुकाबला किया जाए और नागरिक बाजार के लिए शिकारी व खेलकूद वाली राइफलें और गैर-घातक उपकरण बनाकर कमाई के नए रास्ते तलाशे जाएं.

हथियारों में तकनीकी खामियां और गुणवत्ता पर सवाल

संसद समिति ने हथियारों की क्वालिटी को लेकर भी कड़ी आपत्ति जताई है. जांच में सामने आया कि फाइनल जांच के दौरान हथियारों में कई तरह की गंभीर कमियां पाई गईं.जांच के दौरान बैरल बोर में चिप-ऑफ (डिफेक्ट), फायरिंग की गति का बहुत कम और ब्रीच-ब्लॉक में तकनीकी खामियां मिली हैं

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समिति ने निर्देश दिया है कि केवल आखिर में जांच करने के बजाय उत्पादन प्रक्रिया के दौरान ही गुणवत्ता की सख्त जांच होनी चाहिए, ताकि सैनिकों तक पूरी तरह सुरक्षित और बेहतरीन हथियार पहुंच सकें.

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इन्वेंट्री मैनेजमेंट को सुधारा की दी सलाह

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कारखानों में सामान का प्रबंधन बहुत खराब तरीके से हो रहा है. 31 मार्च 2020 तक इन तीनों फैक्ट्रियों के पास 641 करोड़ रुपये का स्टॉक जमा था, जो कुल उत्पादन लागत का 72% था. काम के बीच में फंसा हुआ सामान 56% था और इसमें 102% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

समिति ने मांग की है कि इन्वेंट्री मैनेजमेंट को सुधारा जाए, बेहतर डिमांड की भविष्यवाणी की जाए और समय पर स्टॉक की जांच हो ताकि पैसा अनावश्यक रूप से ब्लॉक न हो.

संसद समिति ने आखिर में यह भी कहा है कि AWEIL ने अपने संसाधनों का 2 से 3 प्रतिशत हिस्सा रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) पर खर्च करने की नई योजना बनाई है. हालांकि, समिति का कहना है कि इसके लिए सरकार को बजट से अलग और पक्का फंड देना चाहिए ताकि समय पर नए हथियार तैयार हो सकें जो हमारी सेना की आधुनिक जरूरतों को पूरा कर सकें.

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