नेपाल के दुर्गम पहाड़ों में 19 दिनों तक एक ऐसी फिल्म की शूटिंग होती रही, जिसकी भनक स्थानीय प्रशासन तक को नही थी. नेपाल सरकार की नाक के नीचे एक ऐसी फिल्म फिल्माई जा रही थी, जिससे चीन सहज नहीं था. कैमरे के सामने 1959 का सीन था. घोड़े, हथियार, पहाड़ों में छिपकर किए जा रहे हमले और वो लोग, जो दलाई लामा को भारत तक पहुंचाने वाली यात्रा का हिस्सा थे. और जिन्हें इतिहास में भी उस तरह जगह नहीं मिली.
फिल्म की शूटिंग नेपाल में बेहद सीक्रेट मोड में की गई. शूटिंग के लिए जब नेपाल सरकार से परमिशन ली गई तो बताया गया कि फिल्म का नाम द हिमालयन रॉबिनहुड है. लेकिन उसकी आड़ में फोर रिवर्स, सिक्स रेंजेज नाम से फिल्म की शूटिंग महज 19 दिनों में पूरी की. ये फिल्म चुशी गंगद्रुक के उन तिब्बती लड़ाकों की कहानी है, जिनका संघर्ष दलाई लामा के 1959 में तिब्बत से भारत आने की ऐतिहासिक घटना से जुड़ता है.
आजतक डॉट इन से बातचीत में फिल्म के डायरेक्टर शेनपेन खिमसार ने बताया कि उनके लिए इस तरह के मुद्दे पर फिल्म बनाना सिर्फ एक रचनात्मक फैसला नहीं था. वह खुद इससे भावनात्मक तौर पर जुड़े हुए थे. जिस राजनीतिक और भौगोलिक संदर्भ में वह फिल्म बना रहे थे, वहां कहानी की असल सच्चाई सामने आ जाने का मतलब था शूटिंग का रुक जाना और पूरे प्रोजेक्ट का खतरे में पड़ जाना. लिहाजा जिस फिल्म को शूट करने में सामान्य परिस्थितियों में 45 से 60 दिन लग सकते थे, उसे उन्होंने 19 दिनों में पूरा किया.
लेकिन शूटिंग पूरी होने के बाद भी उनका काम खत्म नहीं हुआ था. नेपाल में शूट की गई फिल्म रील को सुरक्षित भारत पहुंचाना था. खिमसार को डर था कि अगर फिल्म की मास्टर रील जब्त हो गई तो वर्षों की मेहनत एक झटके में खत्म हो सकती है इसलिए मास्टर रोल और उसकी कॉपी को अलग-अलग गाड़ियों में रखा गया और रातोरात नेपाल से भारत लाया गया.

पिछले साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज हो चुकी फोर रिवर्स, सिक्स रेंजेज अब 11 सितंबर को भारत में हिंदी में रिलीज हो रही है लेकिन इस फिल्म की कहानी जितनी दिलचस्प पर्दे पर है, उसके बनने की कहानी भी उतनी ही असाधारण है. यह उस निर्देशक की कहानी है, जिसने डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक एक ऐसी स्मृति और इतिहास को अपने भीतर रखा, जिसे वह मानता है कि दुनिया ने पर्याप्त जगह नहीं दी.
आखिर ऐसी क्या बात थी, जिसने शेनपेन खिमसार को करीब 18 साल तक इस कहानी के पीछे लगाए रखा? इस पर वह कहते हैं कि मेरे लिए यह कहानी बाहर से आई हुई नहीं थी. मैं तिब्बती परिवार से आता हूं. बचपन से इन लोगों की कहानियां सुनता आया हूं. मेरे पिता भी उन लोगों की तरह भारत आए थे, जिन्हें उम्मीद थी कि एक दिन वापस तिब्बत लौटेंगे.
खिमसार ने 2008 के आसपास इस कहानी पर गंभीरता से रिसर्च शुरू की. करीब एक दशक उन्होंने सिर्फ रिसर्च में लगाया. किताबें पढ़ीं, अकादमिक शोध खंघाले, इस संघर्ष में शामिल योद्धाओं और उनके परिवारों. फिल्म तक पहुंचने में इसके बाद भी कई साल लगे.
वह कहते हैं कि मेरे लिए यह सिर्फ 1959 की एक ऐतिहासिक घटना नहीं थी. मैं इन लोगों की कहानियां सुनते हुए बड़ा हुआ हूं. उनके बच्चे और पोते मेरे दोस्त रहे हैं. जिन लोगों से मैंने बात की, उनमें कई 80-90 साल की उम्र के थे. उनके पास सिर्फ इतिहास नहीं था, उनके पास अपनी जिंदगी की यादें थीं.
1958 के आसपास तिब्बत में चीनी शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध तेज हुआ. इसी दौर में चुशी गंगद्रुक नाम का तिब्बती गुरिल्ला संगठन उभरा. 1959 में दलाई लामा के भारत आने के बाद भी इसके लड़ाके संघर्ष करते रहे. बाद में नेपाल के मुस्तांग इलाके में उनका एक बड़ा ठिकाना बना, जहां से वे तिब्बत में चीनी सेना के खिलाफ अभियान चलाते थे.
इन लड़ाकों को अमेरिका की सीआईए से प्रशिक्षण, हथियार और दूसरी सहायता भी मिली लेकिन 1960 के दशक के आखिर में अमेरिका-चीन संबंधों में बदलाव के साथ यह समर्थन धीरे-धीरे खत्म होने लगा.
लेकिन खिमसार ने अपनी फिल्म का केंद्र दलाई लामा को नहीं बनाया. क्यों? इस सवाल पर वह कहते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने में जब तिब्बत की बात होती है, तो जेहन में दलाई लामा आते हैं. वह तिब्बत से भारत आ गए. यह इतिहास में दर्ज है लेकिन उन्हें सुरक्षित भारत पहुंचाने वाले कौन लोग थे? किसने अपनी जान जोखिम में डाली? किन लोगों ने अपने परिवार खोए? कौन लोग बंदूक लेकर पहाड़ों में निकल गए थे? मैं उन्हीं लोगों की कहानी बताना चाहता था. उनके लिए यही इस इतिहास का वह हिस्सा था, जिसे फिर से सामने लाना जरूरी था.
खिमसार के मुताबिक, चुशी गंगद्रुक के शुरुआती दौर में आम लोग शामिल थे जिनमें किसान, व्यापारी और मजदूर थे. ये ऐसे लोग थे जिन्हें परिस्थितियों ने लड़ाका बना दिया था. वे किसी आधुनिक सेना के प्रशिक्षित सैनिक नहीं थे. उनके पास चीनी सेना के मुकाबले बेहद सीमित हथियार थे.
खिमसार कहते हैं कि ये लोग कोई सुपरहीरो नहीं थे. उन्हें भी भूख लगती थी, डर लगता था और परिवार की चिंता होती थी लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया.
खिमसार ने इस कहानी पर रिसर्च के दौरान जिन किस्सों को सुना, उनमें सबसे ज्यादा असर उन लोगों की जिंदगी की भयावह परिस्थितियों ने डाला. उनके मुताबिक, कई बार इन लड़ाकों के पास खाने तक के लिए कुछ नहीं होता था. हालात इतने खराब थे कि उन्हें चमड़े के जूते तक उबालकर खाने पड़े. उनकी पत्नियों और परिवारों ने भी बेहद कठिन परिस्थितियां झेलीं.
यही वह बिंदु था जहां खिमसार के लिए फिल्म युद्ध और बंदूकों की कहानी से आगे निकल गई. वह चाहते थे कि दर्शक सिर्फ लड़ाई न देखें, बल्कि उन लोगों की भूख, थकान, डर और मानसिक स्थिति को भी महसूस करें. शायद इसी वजह से उन्होंने कलाकारों को भी उस दुनिया के करीब ले जाने की कोशिश की.
खिमसार ने कलाकारों को करीब एक महीने तक नहाने नहीं दिया. सुनने में यह असामान्य लग सकता है, लेकिन उनका तर्क था कि अगर कलाकार हर शाम साफ होकर और आरामदायक माहौल में लौटेंगे, तो वे उन लोगों की जिंदगी की कठिनाई को कैसे महसूस करेंगे, जो पहाड़ों में लगातार संघर्ष करते हुए रहते थे?
यह उनके लिए सिर्फ मेथड एक्टिंग का प्रयोग नहीं था. वह चाहते थे कि कलाकारों के चेहरे, शरीर और व्यवहार में उस जीवन की थकान दिखाई दे. फिल्म की शूटिंग के दौरान कलाकारों को बेहद ऊंचाई पर काम करना पड़ा. कई कलाकार पहली बार अभिनय कर रहे थे. उन्हें घुड़सवारी भी सीखनी पड़ी और इसके लिए महज एक हफ्ते का वक्त था. शूटिंग की समयसीमा इतनी कम थी कि तैयारी और शूटिंग के बीच की दूरी लगभग खत्म हो गई थी.

फिल्म की सबसे असाधारण कहानी कैमरे के सामने नहीं, कैमरे के पीछे घट रही थी. खिमसार जानते थे कि नेपाल में तिब्बत, दलाई लामा और तिब्बती प्रतिरोध से जुड़ी कहानी को उसी रूप में शूट करना आसान नहीं होगा. उनका मानना था कि नेपाल पर चीन का राजनीतिक प्रभाव है और ऐसे विषय पर फिल्म की सच्चाई सामने आने पर शूटिंग रुक सकती है इसलिए उन्होंने एक दूसरी स्क्रिप्ट तैयार की द हिमालयन रॉबिनहुड. इसी नाम से शूटिंग की अनुमति ली गई, जबकि कैमरे के सामने बन रही थी फोर रिवर्स, सिक्स रेंजेज.
लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं थी कि एक दूसरी स्क्रिप्ट जमा कर दी गई और शूटिंग शुरू हो गई. शूटिंग के दौरान पुलिस की निगरानी और जांच का दबाव भी था. हर दिन यह आशंका बनी रहती थी कि फिल्म की वास्तविक कहानी सामने न आ जाए. ऐसे में 45 से 60 दिन में पूरी होने वाली फिल्म की शूटिंग को सिर्फ 19 दिन में पूरा किया गया.
19 दिनों की इस शूटिंग में सिर्फ समय ही चुनौती नहीं थी. ऊंचाई, मौसम, घोड़े, एक्शन सीक्वेंस और सीमित संसाधनों के बीच हर दिन एक नई मुश्किल लेकर आती थी. एक बड़े एक्शन सीन के दौरान आग और धमाके के बीच कैमरा चलाना था. खिमसार को लगा कि कैमरा टीम को इस जोखिम में डालना ठीक नहीं होगा इसलिए उन्होंने खुद कैमरा उठाया. उन्होंने पानी में भिगोई हुई जूट की बोरी से अपने लिए एक अस्थायी सुरक्षा कवर तैयार किया और आग के बीच जाकर शॉट शूट किया.
एक मौके पर तूफान की आशंका थी और क्रू के बीच चिंता बढ़ गई थी लेकिन शूटिंग रोकने का मतलब था उस बेहद छोटी समयसीमा को और मुश्किल बनाना. खिमसार ने काम जारी रखा. 19वें दिन आखिरकार कैमरा बंद हुआ लेकिन अब उनके सामने फिल्म बनाने से भी बड़ा सवाल था फिल्म को बचाना.
नेपाल में शूट किए गए फुटेज को भारत लाना था. खिमसार को डर था कि अगर फिल्म की रीलें या मास्टर फुटेज नेपाल में जब्त हो गए तो वर्षों की मेहनत खत्म हो जाएगी इसलिए मास्टर रोल और उसकी कॉपी को अलग-अलग गाड़ियों में रखा गया. एक गाड़ी में मास्टर फुटेज था, दूसरी में डुप्लीकेट. दोनों को रात में नेपाल से भारत की ओर रवाना किया गया. तर्क सीधा था कि अगर एक गाड़ी पकड़ी भी गई, तो दूसरी में फिल्म रील बची रहेगी.
चुशी गंगद्रुक की कहानी 1959 पर खत्म नहीं होती. 1974 में मुस्तांग में मौजूद तिब्बती लड़ाकों के सामने एक बिल्कुल अलग परिस्थिति थी. नेपाल सरकार ने उनसे हथियार डालने और सशस्त्र अभियान खत्म करने को कहा. नेपाली सेना को भी वहां भेजा गया लेकिन वर्षों से लड़ रहे इन लड़ाकों के लिए हथियार छोड़ना आसान नहीं था. ऐसे में उनके बीच दलाई लामा की आवाज पहुंची. एक रिकॉर्ड किए गए ऑडियो संदेश में उन्होंने लड़ाकों से हथियार डालने और शांतिपूर्वक आत्मसमर्पण करने की अपील की. आशंका थी कि अगर नेपाली सेना के साथ सशस्त्र टकराव हुआ तो बड़ी संख्या में लोग मारे जा सकते हैं.
जिन लोगों ने वर्षों तक संघर्ष किया था, उनके लिए यह फैसला भावनात्मक रूप से बेहद कठिन था. संगठन के एक पूर्व सदस्य के बयान के मुताबिक, शुरुआत में उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि दलाई लामा सचमुच हथियार डालने के लिए कह रहे हैं लेकिन जब रिकॉर्डिंग सुनाई गई और उन्हें दलाई लामा की आवाज सुनाई दी, तो उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया.
हालांकि हर किसी के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं था. कुछ लड़ाकों ने आत्मसमर्पण किया, कुछ गिरफ्तार हुए, कुछ भाग निकले और कुछ ने आत्महत्या तक कर ली. इस तरह 1974 में चुशी गंगद्रुक का सशस्त्र संघर्ष अपने अंत की ओर पहुंचा. यहीं फिल्म की कहानी युद्ध से निकलकर एक गहरी मानवीय त्रासदी में बदल जाती है. उन लोगों की त्रासदी, जिन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा एक संघर्ष को दे दिया और फिर एक दिन उन्हें अपने हथियार छोड़ने पड़े.
फिल्म को चीन की तरफ से अलगाववादी नैरेटिव से जोड़कर आलोचना मिली है लेकिन खिमसार इस आरोप को फिल्म के उद्देश्य से अलग करके देखते हैं. उनके लिए फिल्म का मकसद चीन के लोगों के खिलाफ नफरत पैदा करना नहीं, बल्कि उन तिब्बती लोगों की कहानी सामने लाना है, जिनकी भूमिका इतिहास में अक्सर बड़े राजनीतिक नामों के पीछे दब गई.
उनका कहना है कि उनके पास हिंसा का रास्ता नहीं है. उनके पास सिनेमा है. उनकी सोच का सार यही है कि किसी दूतावास पर बम फेंकना उनका रास्ता नहीं है. अपनी कहानी दुनिया तक पहुंचाना उनका रास्ता है. इस अर्थ में उनके लिए सिनेमा सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, एक शांतिपूर्ण प्रतिरोध भी है.
शेनपेन की फिल्म सिर्फ तिब्बत के अतीत को देखने की कोशिश नहीं करती. निर्देशक इस इतिहास को भारत की सुरक्षा और मौजूदा जियोपॉलिटिक्स से भी जोड़ते हैं. उनका मानना है कि भारत में चीन को लेकर बहुत कम फिल्में बनती हैं, जबकि चीन भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा है. वह सिलीगुड़ी कॉरिडोर और उत्तर-पूर्व की सुरक्षा जैसे सवालों का भी उल्लेख करते हैं.
उनके लिए तिब्बत को समझना सिर्फ इतिहास को समझना नहीं है. यह हिमालय, भारत-चीन सीमा और उस पूरे भूगोल को समझने का एक तरीका भी है, जहां इतिहास और वर्तमान राजनीति लगातार एक-दूसरे से टकराते हैं. शायद इसी वजह से वह चाहते थे कि यह कहानी भारत में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचे और इसके लिए फिल्म को हिंदी में भी लाया गया.
फिल्म के हिंदी नैरेशन के लिए शेनपेन ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी की आवाज चुनी. दोनों की दोस्ती कई साल पुरानी है. शेनपेन के मुताबिक, नवाजुद्दीन ने फिल्म देखी और कहानी से प्रभावित हुए. उन्होंने खुद नैरेशन के लिए अपनी आवाज देने की पेशकश की और इसके लिए कोई फीस नहीं ली.
खिमसार को लगा कि नवाजुद्दीन की आवाज में वह भावनात्मक वजन है, जिसकी इस कहानी को जरूरत थी. अब 11 सितंबर को जब फोर रिवर्स, सिक्स रेंजेज हिंदी में भारतीय दर्शकों के सामने होगी, तो उसके साथ सिर्फ 1959 का एक अध्याय नहीं आएगा. उसके साथ उन चेहरों की कहानी भी आएगी, जो दलाई लामा की भारत यात्रा के इतिहास में अक्सर दिखाई नहीं देते. इतिहास अक्सर बड़े नामों को याद रखता है लेकिन इतिहास कई बार गुमनाम चेहरे भी बना देते हैं और यह फिल्म उन्हीं गुमनाम लोगों की कहानी है.