टॉम क्रूज ने पिछले करीब एक दशक का बड़ा हिस्सा दौड़ते, उड़ते, छलांग लगाते, पहाड़ों पर चढ़ते और तरह-तरह के असंभव कारनामे करते हुए बिताया है. उन्होंने हमें बार-बार याद दिलाया कि फिल्म स्टार होने का मतलब सिर्फ कैमरे के सामने खड़ा होना नहीं, कुछ कर दिखाना भी है लेकिन Digger उस टॉम क्रूज की छवि के बिल्कुल उलट फिल्म है, जिसे हम पिछले कई सालों से देखते आए हैं. यहां वह ना दौड़ते हैं, ना हवा में उड़ते हैं, ना कोई स्टंट करते हैं. वह लगभग स्थिर खड़े रहते हैं, पेट पर प्रोस्थेटिक लगाते हैं, सिर पर झड़ते बालों का लुक अपनाते हैं और एक ऐसे अरबपति तेल कारोबारी का किरदार निभाते हैं, जिसकी महत्वाकांक्षाएं शायद दुनिया के अंत की वजह बन सकती हैं.
दूसरे शब्दों में कहें तो यह वही अप्रत्याशित मोड़ है, जो टॉम क्रूज को एक बार फिर दिलचस्प बना देता है. अलेजांद्रो गोंजालेज इनारितु के निर्देशन में बनी Digger में क्रूज डिगर दरअसल रॉकवेल नाम के ताकतवर टेक्सास ऑयल टायकून की भूमिका में हैं. ग्रीनलैंड में उसका ड्रिलिंग प्रोजेक्ट एक भयानक पर्यावरणीय तबाही को जन्म देता है. बर्फ का एक विशाल हिस्सा टूटकर अलग हो जाता है और यूरोप के लिए खतरा पैदा हो जाता है. इसके बाद डिगर उस संकट को ठीक करने निकलता है, जिसे पैदा करने में उसकी खुद की भूमिका रही है लेकिन उसके मिशन में इंसानियत बचाने से ज्यादा अहम शायद खुद को उस शख्स के रूप में स्थापित करना है, जो पूरी मानवता को बचा सकता है. फिल्म में रिज अहमद, सैंड्रा ह्यूलर, जॉन गुडमैन, जेसी प्लेमन्स और सोफी वाइल्ड भी अहम भूमिकाओं में हैं.
फिल्म का आधार पहली नजर में लगभग जानबूझकर हास्यास्पद लगता है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इनारितु इसे सिर्फ हास्य का खेल बनाकर नहीं छोड़ते. डिगर के व्यक्तित्व में एक खास किस्म का अहंकार है. उसने इतनी दौलत और ताकत जमा कर ली है कि उसके कामों के दूरगामी नतीजे भी उसे किसी वास्तविक त्रासदी की तरह नहीं, महज एक असुविधा की तरह नजर आते हैं. वैज्ञानिक जब उसे चेतावनी देते हैं कि उसकी गतिविधियां भयावह पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा रही हैं, तो उसका पहला रिएक्शन पछतावा नहीं होता. वह समाधान ढूंढने लगता है और ऐसा समाधान, जिसमें नियंत्रण की कमान उसके ही हाथ में रहे.
टॉम क्रूज इस विडंबना को बखूबी समझते हैं. डिगर कोई दबा-छिपा किरदार नहीं है और क्रूज भी उसे वैसा निभाने की कोशिश नहीं करते. उनका लहजा लार्जन देन लाइफ है और अभिनय कई जगह कैरिकेचर की सीमा तक पहुंच जाता है लेकिन इसके पीछे एक सोच है. डिगर का आत्मविश्वास लगभग बच्चे जैसा है. उसे सचमुच लगता है कि दुनिया की हर समस्या का हल निकाला जा सकता है. बस आपके पास पर्याप्त पैसा, ताकत या फिर इतनी ऊंची आवाज होनी चाहिए कि बाकी सबकी आवाज दब जाए.
यहीं Digger टॉम क्रूज की स्थापित स्क्रीन इमेज को उलट देती है. पिछले कई वर्षों से उनकी फिल्मों में उनकी छवि एक ऐसे किरदार की रही है, जो हर मुश्किल का सामना करने में सक्षम है. मिशन इम्पॉसिबल के एथन हंट को ही देख लीजिए. वह घायल हो सकता है, थक सकता है, डर सकता है, लेकिन विमान उड़ाना हो तो वह विमान उड़ा ही देगा. डिगर उसी आत्मविश्वास का दूसरा रूप है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वह आत्मविश्वास ऐसे आदमी के पास है, जिसने खुद तबाही पैदा करने में भूमिका निभाई है.

वह ऐसी कहानी का हीरो बनना चाहता है, जिसमें समस्या भी वही है. यही फिल्म का सबसे तीखा हास्य है. इनारितु, अलेक्जेंडर डिनेलारिस, निकोलस जियाकोबोन और सबीना बरमैन के साथ मिलकर कहानी को क्लाइमेट सटायर, डिजास्टर फिल्म और डार्क कॉमेडी के एक अजीबोगरीब मिश्रण में बदल देते हैं. हालांकि डिगर कोई सीधा-सपाट निष्कर्ष देने के बजाय ऐसी दुनिया रचती है, जहां हर व्यक्ति अपनी सुविधा के मुताबिक वास्तविकता का एक वर्जन पेश कर रहा है.
इसी वजह से फिल्म के कुछ बेहतरीन दृश्य वाकई अप्रत्याशित बन जाते हैं. एक खास दृश्य में डिगर उस समय वैश्विक सभा को संबोधित करता है, जब संकट लगातार गहराता जा रहा है. फिल्म कुछ देर के लिए अपनी उन्मादी रफ्तार रोक देती है और एक असहज सवाल सामने रखती है कि क्या पर्यावरण की तबाही के लिए सिर्फ कुछ गिने-चुने खलनायक जिम्मेदार हैं? या फिर पूरी अर्थव्यवस्थाएं, उद्योग और हमारी जीवनशैली ही उस व्यवस्था पर टिकी हुई हैं, जो इस विनाश को लगातार बढ़ावा देती है?
यह उन दुर्लभ क्षणों में से है, जब डिगर चिल्लाना बंद करके सोचने लगता है. अफसोस कि फिल्म हमेशा यह नहीं समझ पाती कि कब रुक जाना चाहिए. इनारितु की विजुअल महत्वाकांक्षा बड़ी है. इमैनुएल लुबेज्की की सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जो एक साथ भव्य भी लगती है और भीतर से बीमार भी. डिगर की विशाल हवेली सिर्फ ऐशो-आराम की जगह नहीं, बल्कि उसकी असीमित लालसा और अतिरेक का स्मारक लगती है.

फिल्म एक विचार पेश करती है, उसे और आगे धकेलती है, फिर उससे भी आगे निकल जाती है. कोई ऐसा मजाक, जो पहली बार असरदार लगता है, बार-बार दोहराए जाने पर अपना असर खो देता है. कोई अजीब दृश्य पहले चौंकाता है, लेकिन उसके तुरंत बाद उससे भी ज्यादा अजीब दृश्य आ जाता है सिर्फ इसलिए कि फिल्म ऐसा कर सकती है और यहीं Digger अपने ही मुख्य किरदार जैसी लगने लगती है. डिगर खुदाई बंद नहीं कर सकता और इनारितु भी फिल्म में कुछ नया जोड़ना बंद नहीं कर पाते.
सहायक कलाकारों का काम भी मजबूत है, हालांकि पटकथा उन्हें उतनी जगह नहीं देती, जिसके वे हकदार हैं. रिज अहमद वैज्ञानिक गणेश के किरदार में बेचैन बुद्धिमत्ता लेकर आते हैं. वही शख्स डिगर को लगातार उसके फैसलों के खतरनाक नतीजों से आगाह करता रहा है. सैंड्रा ह्यूलर फिल्म में एक विस्फोटक ऊर्जा लेकर आती हैं, जबकि जॉन गुडमैन राजनीतिक बेतुकेपन को पूरी तरह अपनाते दिखाई देते हैं.
फिर भी डिगर आखिरकार टॉम क्रूज की फिल्म है. हॉलीवुड के सबसे नियंत्रित और अनुशासित स्टार्स में से एक टॉम को ऐसे आदमी के किरदार में देखना दिलचस्प है, जो खुद पर बिल्कुल नियंत्रण नहीं रख पाता. क्रूज फिल्म के हर अजीब फैसले के साथ पूरी तरह खड़े नजर आते हैं, फिर चाहे वह शारीरिक बदलाव हो, उनका दिखावटी आत्मविश्वास, बेपरवाह अकड़ या फिर वे अप्रत्याशित क्षण, जहां उनका किरदार अचानक कहीं ज्यादा कमजोर और मानवीय दिखाई देने लगता है. हर प्रयोग काम नहीं करता. कई जगह फिल्म जरूरत से ज्यादा हो जाती है लेकिन शायद इसकी यही सबसे दिलचस्प बात भी है. ऐसी फिल्म देखना, जो अजीब जोखिम लेने की कोशिश करे और कभी-कभार चूक भी जाए, उस फिल्म से ज्यादा दिलचस्प है जो हर खुरदरे किनारे को घिसकर इतनी सुरक्षित हो जाए कि बहस के लिए कुछ बचे ही नहीं.
डिगर बिखरी हुई, अतिरेक से भरी और कई बार जरूरत से ज्यादा सेल्फ अवेयर फिल्म है लेकिन यह विजुअली दुस्साहसी भी है और मजेदार भी. फिल्म टॉम क्रूज के अभिनय पर टिकी है, जो याद दिलाता है कि जब वह अपने बनाए स्टारडम के सुरक्षित ढांचे से बाहर निकलते हैं, तब भी वह इतने दिलचस्प क्यों बने हुए हैं.