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Street Fighter Review: फाइट ही फाइट, कहानी के नाम पर बत्ती गुल! दिमाग की दही कर देगी स्ट्रीट फाइटर

फिल्म की कहानी का असली मकसद इन किरदारों को एक के बाद एक मुकाबलों में उतारना है. इसके लिए फिल्म कोई खास बहाना बनाने की कोशिश भी नहीं करती. हर थोड़ी देर में एक नई लड़ाई, एक नई दुश्मनी या किसी मशहूर फाइटिंग मूव को दिखाने का मौका आ जाता है.

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कैसी है स्ट्रीट फाइटर फिल्म. (Photo: ITG)
कैसी है स्ट्रीट फाइटर फिल्म. (Photo: ITG)
फिल्म:एक्शन
2/5
  • कलाकार : नोआ सेंटिनेओ, एंड्रयू कोजी, जेसन मोमोआ, विद्युत जामवाल
  • निर्देशक :किताओ सकुराई

हॉलीवुड मूवी Street Fighter एक्शन सिनेमा के आजमाए हुए फॉर्मूले पर आगे बढ़ने वाली फिल्म है. इसमें दर्जनों बड़े और रंगीन किरदार हैं, जोरदार मुकाबले हैं और दुनिया पर कब्जा करने की साजिश रचने वाला खलनायक भी है. पूरी फिल्म अपने नाम के अनुसार ही आगे बढ़ती है. फिल्म में फाइट ही फाइट है. इतनी फाइट है कि कहानी आखिर क्या है, इसका कोई अता-पता नहीं है. लेकिन फिर भी एक खासियत है. 

किताओ सकुराई के निर्देशन में बनी यह लाइव एक्शन फिल्म कैपकॉम के मशहूर फाइटिंग गेम फ्रेंचाइजी पर आधारित है. कहानी में Rue (एंड्रयू कोजी) और केन मास्टर्स (नोआ सेंटीनियो) दो ऐसे फाइटर हैं, जिनके रास्ते अलग हो चुके हैं. तभी चुन-ली (कैलिना लियांग) उन्हें वर्ल्ड वॉरियर टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए साथ लाती है. शुरुआत में यह अपने अतीत से दोबारा जुड़ने की कहानी लगती है, लेकिन जल्द ही मामला एक बड़ी साजिश तक पहुंचता है.

फिल्म की कहानी का असली मकसद इन किरदारों को एक के बाद एक मुकाबलों में उतारना है. इसके लिए फिल्म कोई खास बहाना बनाने की कोशिश भी नहीं करती. हर थोड़ी देर में एक नई लड़ाई, एक नई दुश्मनी या किसी मशहूर फाइटिंग मूव को दिखाने का मौका आ जाता है. खेल की इस दुनिया के बाहर क्या हो रहा है, इसकी चिंता फिल्म को बहुत ज्यादा नहीं है. पर फिल्म देखते हुए हमें मजा कम आता है, कोफ्त ज्यादा होती है और दिमाग का दही होने लगता है.

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स्ट्रीट फाइटर फिल्म का एक सीन.
स्ट्रीट फाइटर फिल्म का एक सीन.

यह वीडियो गेम पर बनी लाइव एक्शन फिल्म है, जिसका मकसद मनोरंजन करना है. फिल्म समझती है कि मूल गेम की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उसके असाधारण किरदार और हद से ज्यादा अविश्वसनीय मुकाबले ही हैं. यही वजह है कि फिल्म का पूरा फोकस एक्शन सीन पर ही रहा. नतीजा ये एक ऐसी फिल्म है, जो कई बार हद से ज्यादा बचकानी और बेतुकी लग सकती है, लेकिन अपने इस अंदाज को लेकर शर्मिंदा नहीं होती.

फिल्म की कास्टिंग भी इसकी खूबियों में शामिल है. सकुराई ने ऐसा कलाकारों को लिया है, जिसमें एक्टर्स, रेसलर्स, म्यूजीशियन और एक्शन स्टार्स एक साथ हैं. ये मेल थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन पर्दे पर किरदारों को देखते हुए इसके पीछे की सोच समझ आने लगती है.

डेविड डास्टमालचियन की बात करें तो वह एम. बाइसन के रूप में खलनायकी का नाटकीय अंदाज लेकर आते हैं. वहीं एंड्रयू कोजी और नोआ सेंटीनियो, Rue और केन के व्यक्तित्व में अंतर बनाए रखते हैं, जिससे तमाम अफरातफरी के बीच कहानी को एक आधार मिलता है. कैलिना लियांग की चुन-ली भी इन फाइटर्स को एक साथ लाने में अहम भूमिका निभाती है.

स्ट्रीट फाइटर फिल्म का एक सीन.
स्ट्रीट फाइटर फिल्म का एक सीन.

वीडियो गेम के किरदारों पर फिल्म बनाते समय कास्टिंग की अहमियत और बढ़ जाती है. दर्शक इन किरदारों को बरसों से स्क्रीन पर देखते आए हैं. ऐसे में सिर्फ उनके जैसे कपड़े पहना देना काफी नहीं होता. यहां कलाकारों का अभिनय और उनकी शारीरिक फुर्ती इन किरदारों को महज कॉस्प्ले यानी किसी मशहूर किरदार की वेशभूषा धारण करने वाले लोगों की नकल बनने से बचाती है.

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विद्युत जामवाल इस फिल्म से हॉलीवुड में डेब्यू कर रहे हैं. वह धालसिम के किरदार में नजर आते हैं, लेकिन इतने बड़े कलाकारों के समूह में उन्हें अपनी छाप छोड़ने के लिए ज्यादा वक्त नहीं मिलता. फिल्म में '50 सेंट' को जैक्सन बालरॉग के किरदार में देखना दिलचस्प है, जबकि 'रोमन रेंस' अनोआई अकूमा बने हैं.

विद्युत अपने छोटे से रोल में बाकी बड़े और रंगीन किरदारों के बीच टिके रहते हैं. उनका मार्शल आर्ट्स का अनुभव देखते हुए धालसिम के लिए उनकी कास्टिंग स्वाभाविक लगती है. हालांकि, फिल्म उनके हुनर का बेहतर इस्तेमाल कर सकती थी. 

फिल्म का एक दिलचस्प फैसला किरदारों के अतीत के कुछ हिस्सों को एनीमेशन के जरिए दिखाना है, जिसके बाद कहानी फिर लाइव एक्शन में लौट आती है. 

स्ट्रीट फाइटर फिल्म का एक सीन.

हालांकि, जिन खूबियों के चलते स्ट्रीट फाइटर थोड़ी बहुत मनोरंजक बनती है, वही इसकी सीमाएं भी तय करती हैं. अच्छाई और बुराई की लड़ाई बहुत हद तक जानी-पहचानी राह पर चलती है. मर्दानगी और ताकत से भरी इस दुनिया में भावनाओं के लिए ज्यादा जगह नहीं है. लगातार होते मुकाबले कुछ दर्शकों को थका भी सकते हैं. फिल्म अपनी ही बनाई दुनिया में इतनी डूबी रहती है कि किरदारों की जिंदगी उनके आपसी मुकाबलों और दुश्मनियों से आगे बढ़ती नहीं दिखती.

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फिल्म अपने मूल कॉन्सेप्ट के साथ पूरी तरह सहज है और उसे आज के हिसाब से बदलकर किसी खास संदेश में ढालने की कोशिश नहीं करती.

और हां एक बात और.. फिल्म में जिस तरह से महिलाओं को नीचा दिखाने वाले कुछ मजाक शामिल किए गए हैं. वो किसी एंगल से कूल नहीं हैं और ना ही आज की महिलाएं उन्हें बर्दाश्त करने के मूड में हैं. अब वो दिन लद गए जब इस तरह के फूहड़ डायलॉग पर तथाकथित हंसी आने की उम्मीद की जाती थी. 

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