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Awarapan 2 Review: इमरान हाशमी के नॉस्टैल्जिया का चला जादू, सीरियल Kisser की तोड़ी इमेज, 'गैंगस्टर' रोल में चमकीं शबाना

इमरान हाशमी की सबसे मचअवेटेड फिल्म आवारापन 2 आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है. इमरान हाशमी उस हीरो के तौर पर लौटे हैं जिसे बॉलीवुड ने हमेशा पसंद किया है. जानिए आखिर कैसी है ये फिल्म.

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कैसी है आवारापन 2 फिल्म? (Photo: x/@VisheshFilms)
कैसी है आवारापन 2 फिल्म? (Photo: x/@VisheshFilms)
फिल्म:आवारापन 2
3.5/5
  • कलाकार : इमरान हाशमी, शबाना आजमी, दिशा पटानी
  • निर्देशक :नितिन कक्कड़

'गुलामी से मेरा रिश्ता पुराना है...' लगभग 19 साल पहले जब 'आवारापन' सिनेमाघरों में आई थी, तो बॉक्स ऑफिस पर उसका हाल कुछ खास नहीं रहा था. फिल्म फ्लॉप हो गई थी. लेकिन वक्त बदला, टीवी और इंटरनेट के जरिए इस फिल्म ने लोगों के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि आज यह एक 'कल्‍ट क्‍लासिक' बन चुकी है. इसी जबरदस्त फैन फॉलोइंग का नतीजा है कि आज इतने सालों बाद आई 'आवारापन 2' को थिएटर में शानदार ओपनिंग मिली है. यकीन मानिए, सुबह-सुबह के शो में सिनेमाघरों में भीड़ बहुत लंबे समय बाद देखने को मिली है.

थिएटर के अंधेरे में बैठकर ऐसा लगा मानो वक्त पीछे मुड़ गया हो और हम 2000 के दशक में वापस लौट आए हों. यह वो दौर था जब विशेष फिल्म्स का दबदबा सिर्फ बड़े पर्दे पर ही नहीं, बल्कि टीवी चैनलों पर भी हुआ करता था. उनके पसंदीदा हीरो इमरान हाशमी पर्दे पर आते थे और बैकग्राउंड में हिट गानों की बौछार शुरू हो जाती थी. 'आवारापन 2' भी काफी हद तक इसी पुराने और आजमाए हुए फॉर्मूले पर चलती है, जो सीधे आपके दिल को छूती है.

क्या है 'आवारापन 2' की कहानी?
फिल्म की कहानी ठीक वहीं से आगे बढ़ती है जहां पहली फिल्म खत्म हुई थी. शिवम (इमरान हाशमी) को पिछली फिल्म के आखिरी सीन में छह गोलियां लगी थीं, लेकिन वह किसी तरह बच जाता है. अब वह जुर्म की काली दुनिया छोड़ चुका है और उसका लगाव एक छोटी अनाथ बच्ची से हो जाता है, जिसे उसने बचाया था. शिवम उस बच्ची का नाम 'आलिया' (मायरा शिवन) रखता है- जो उसकी मर चुकी प्रेमिका की याद दिलाती है.

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लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है जब इंटरपोल से शिवम को पता चलता है कि आलिया को गोद लेने के पीछे एक बहुत बड़ा जाल था और उसे चाइल्ड ट्रैफिकिंग (बच्चों की तस्करी) के धंधे में धकेला जा रहा था. शिवम अपनी जान पर खेलकर उसे बचाने निकल पड़ता है. लेकिन इस मिशन में कामयाब होने के लिए उसे जोरावर (पूरन गब्बी) के गैंग में शामिल होना पड़ता है, जो इस पूरे काले धंधे का मास्टरमाइंड है. इसके आगे जो होता है, वही इस फिल्म की असली कहानी है, जो आपको आखिरी तक सीट से बांधकर रखती है.

पुरानी यादें और असली लोकेशंस का मजा
फिल्म के राइटर बिलाल सिद्दीकी ने एक ऐसी स्क्रिप्ट तैयार की है जो मिलेनियल्स (2000 के दशक के दर्शकों) को पुराने दिनों की याद दिलाती है. वहीं दूसरी तरफ, आज की जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी गानों और इमोशंस के जरिए यह समझ पाएगी कि आखिर इमरान हाशमी का असली जादू क्या हुआ करता था. इसके अलावा शाद रंधावा और श्रिया सरन की झलक सबसे सही मौकों पर देखने को मिली. इसके लिए डायरेक्टर की तारीफ बनती हैं.

फिल्म की ज्यादातर शूटिंग बैंकॉक में हुई है और मेकर्स ने माहौल को असली दिखाने के लिए अच्छा-खासा पैसा खर्च किया है. सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म को सेट या AI/VFX वाले फर्जी बैकड्रॉप पर बनाने के बजाय असली फील्ड में शूट किया गया है, जिससे स्क्रीन पर एक रियलिस्टिक फील आता है.

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एक्टर्स की परफॉर्मेंस
एक्टिंग के मामले में, यह वही पुराने इमरान हाशमी हैं जिन्हें देखकर एक पूरी पीढ़ी जवान हुई है. वह पूरी फिल्म की जान हैं. पहली 'आवारापन' से लेकर अब तक उनके अंदाज में कोई बदलाव नहीं आया है और यही इस फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है. उनकी आंखें और उनकी खामोशी बहुत कुछ कह जाती है.

शबाना आजमी ने गैंगस्टर क्वीन 'नफीसा' के रोल में बेहतरीन काम किया है. पर्दे पर उनका प्रेजेंस काफी दमदार लगता है. जारा के किरदार में दिशा पटानी ठीक-ठाक लगी हैं. उनके पास डायलॉग-म्यूजिक भले ही कम हों, लेकिन स्क्रीन पर प्रेजेंस पूरा है. वहीं विलेन जोरावर बने पूरन गब्बी ने अपना स्टाइलिश लुक तो दिखाया, लेकिन एक डर पैदा नहीं किया.

अगर इस फिल्म का कोई दिल है, तो वह इसका म्यूजिक है. गाने इतने खूबसूरत हैं कि आप खुद-ब-खुद इसमें खो जाते हैं. जब थिएटर के स्पीकर्स पर 'Tera Mera Rishta - New Version' और 'Yeh Awarapan', 'Ve Junoon' बजता है, तो एक अलग ही माहौल बन जाता है. वहीं 'तो फिर आओ' का नया टच आपके अंदर पुरानी यादों को फिर से ताजा कर देता है. इसका म्यूजिक आप सिर्फ सुनते नहीं हैं, बल्कि महसूस करते हैं.

कहां चूक गई फिल्म? 
फिल्म पूरी तरह से परफेक्ट नहीं है. इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि कहानी काफी हद तक प्रेडिक्टेबल यानी जिसका अंदाजा पहले से लगाया जा सकता है. पूरन गब्बी का विलेन वाला रोल काफी हल्का लगता है, उन्हें देखकर डर जैसा माहौल नहीं बनता. शबाना आजमी के किरदार के साथ भी थोड़ी नाइंसाफी हुई है- वह स्क्रीन पर भारी-भरकम गाड़ियों और गार्ड्स के काफिले के साथ तो चलती हैं, पर उनका वो खौफ कायम नहीं हो पाता.

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देखना चाहिए या नहीं
कुल मिलाकर कहें तो 'आवारापन 2' एक 2000 के दशक की स्टाइल वाली फिल्म है, और यही बात इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और कमजोरी भी. यह गंभीर हीरो, दर्दभरा रोमांस, गोलियों की तड़तड़ाहट और सबसे खास वही आइकॉनिक म्यूजिक वापस लेकर आती है.

जो लोग इमरान हाशमी के गानों के दीवाने रहे हैं, उनके लिए यह फिल्म नॉस्टैल्जिया का एक जबरदस्त डोज है. कई सीन्स में आपको वाकई रोंगटे खड़े करने वाला अहसास होगा. फिल्म का क्लाइमैक्स काफी असरदार है जो दर्शकों को यकीनन पसंद आएगा. शिवम के इस किरदार में आज भी दम बाकी है, और सच कहें तो यह फिल्म इमरान हाशमी के कंधे पर ही सफलता हासिक करेगी. जैसा कि 'द बैड्स ऑफ बॉलीवुड' में राघव जुयाल ने कहा था- 'अख्खा बॉलीवुड एक तरफ और इमरान हाशमी एक तरफ.'

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