मशहूर गायक जुबिन गर्ग आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज अब भी लोगों के बीच उसी शिद्दत से मौजूद है. अलग-अलग भाषाओं में गाए उनके गीत, संगीत की विविध शैलियों पर उनकी पकड़ और आवाज में उतरती भावनाएं उन्हें सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि असम और नॉर्थईस्ट की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बनाती हैं. 19 सितंबर 2025 को सिंगापुर में एक हादसे में उनका निधन हो गया था. आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर उनके संगीत सफर को याद करते हुए उस फैसले की भी चर्चा जरूरी है, जिसने ‘या अली’ जैसी जबरदस्त कामयाबी के बाद जुबिन गर्ग को बॉलीवुड से ही दूरी बनाने पर मजबूर किया.
52 साल के जुबिन सिंगापुर में नॉर्थईस्ट फेस्टिवल में परफॉर्म करने पहुंचे थे. स्कूबा डाइविंग के दौरान हुए हादसे में उनकी जान चली गई. उनके अचानक चले जाने की खबर ने प्रशंसकों से लेकर पूरी म्यूजिक इंडस्ट्री तक को स्तब्ध कर दिया था लेकिन जुबिन अपने पीछे इतना बड़ा संगीत संसार छोड़ गए हैं कि उनकी आवाज और उनके गीत आने वाली पीढ़ियों तक सुने जाते रहेंगे.
‘या अली’ ने रातोरात दी पहचान
जुबिन गर्ग के करियर में साल 2006 एक निर्णायक मोड़ लेकर आया. फिल्म ‘गैंगस्टर’ में उनका गाया ‘या अली’ रिलीज हुआ तो देखते ही देखते यह गाना देशभर में छा गया. प्रीतम के कंपोज किए इस गीत ने जुबिन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और उन्हें ग्लोबल इंडियन फिल्म अवॉर्ड्स (GIFA) में बेस्ट प्लेबैक सिंगर का पुरस्कार भी मिला. नॉर्थईस्ट में पहले से लोकप्रिय जुबिन की आवाज इस एक गाने के बाद देश के कोने-कोने तक पहुंच गई.
दिलचस्प यह है कि जिस गाने ने उनके लिए बॉलीवुड के दरवाजे खोले, उसी कामयाबी के बाद जुबिन ने इस इंडस्ट्री में लगातार बने रहने की कोशिश नहीं की. उनके पास मौके थे, ऑफर्स थे और एक ऐसा गाना था जिसने उन्हें देशभर में पहचान दिला दी थी. फिर उन्होंने पीछे हटने का फैसला क्यों किया?
बॉलीवुड की कामयाबी के बीच क्यों बनाई दूरी?
एक पुराने इंटरव्यू में जुबिन ने इस फैसले के पीछे की अपनी सोच बताई थी. उन्होंने कहा था कि बॉलीवुड के म्यूजिक में बदलाव बहुत धीमी गति से हो रहा था और इंडस्ट्री में पुराने सफल फॉर्मूलों को दोहराने का चलन ज्यादा था. ‘या अली’ की सफलता के बाद उनके सामने भी एक खास तरह के गानों की छवि बन रही थी और उन्हें डर था कि कहीं उनकी पहचान सिर्फ उसी तरह के संगीत तक सीमित न होकर रह जाए.
जुबिन ने कई बड़े प्रोजेक्ट्स से दूरी बनाई. उनके इस फैसले को लेकर इंडस्ट्री में तरह-तरह की चर्चाएं भी हुईं, लेकिन जुबिन अपने संगीत को लेकर समझौता करने के पक्ष में नहीं थे. उनके लिए सिर्फ ज्यादा काम करना जरूरी नहीं था. वह अपनी पसंद और रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ संगीत करना चाहते थे. शायद यही वजह थी कि बॉलीवुड की बड़ी सफलता के बावजूद उनका संगीत सफर सिर्फ हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं हुआ.
‘या अली’ के बाद प्रीतम के साथ क्यों नहीं किया काम?
‘या अली’ की जबरदस्त सफलता के बाद जुबिन और प्रीतम की जोड़ी से आगे भी कई यादगार गानों की उम्मीद की गई थी. लेकिन दोनों ने फिर साथ काम नहीं किया. इस बारे में जुबिन ने कहा था कि दोनों के काम करने के तरीके और उनके संगीत के रास्ते अलग थे इसलिए ‘या अली’ के बाद उनकी यह साझेदारी आगे नहीं बढ़ सकी.
हालांकि जुबिन के निधन की खबर ने प्रीतम को भी गहरे दुख में डाल दिया था. उनके अचानक चले जाने पर प्रीतम ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखकर शोक जताया और जुबिन की पत्नी गरिमा तथा उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की थी.
जुबिन गर्ग का सफर इस मायने में भी अलग रहा कि उन्होंने बॉलीवुड की एक बड़ी कामयाबी को अपने पूरे संगीत करियर की मंजिल नहीं बनने दिया. ‘या अली’ ने उन्हें देशभर में पहचान जरूर दी, लेकिन उनकी पहचान आखिरकार किसी एक फिल्म, भाषा या गाने तक सीमित नहीं रही. उनकी असली विरासत उस संगीत में है, जिसे उन्होंने अपनी शर्तों पर जिया और जिसने नॉर्थईस्ट की आवाज को देश के बड़े संगीत परिदृश्य तक पहुंचाया.