बड़े पर्दे पर स्पाई फिल्मों का दबदबा हर समय बना रहता है. इन कहानियों में एक्शन-थ्रिल-सस्पेंस और देशभक्ति का मिश्रण रहता है. पठान, टाइगर, वॉर, धुरंधर- ये वो स्पाई फिल्में हैं जिन्होंने मिलकर बॉक्स ऑफिस पर हजारों करोड़ों की कमाई की. धुरंधर तो बॉलीवुड की सबसे बड़ी पिक्चर बनी, जिसकी कहानी एक RAW के स्पाई की असल जिंदगी से प्रेरित थी.
RAW के संस्थापक की कहानी
RAW की कहानियां अक्सर हम पॉडकास्ट या किसी इंटरव्यू में सुनते हैं. एक जासूस किसी देश में घुसकर कैसे वहां नजर रखता है, और इसमें उसकी जान को कितना खतरा होता है इसकी कहानी सबको पता है. लेकिन इंडिया में RAW कैसे बना, इस आइडिया के पीछे किसका दिमाग था, ये जानकारी बड़े कम लोगों को होगी. मगर अब करण जौहर ने ये जिम्मा उठाया है.
फिल्ममेकर करण जौहर ने छह साल पहले अनाउंस किया था कि वो RAW के चीफ और संस्थापक रहे रामेश्वर नाथ काव (आर.एन. काव) की कहानी बड़े पर्दे पर लाएंगे. इसके बाद ये प्रोजेक्ट काफी लंबे समय तक अटका रहा. हालांकि अब इसकी रिलीज डेट सामने आ गई है. करण अपनी फिल्म को RAW की स्थापना के 60वें दिवस यानी 11 अगस्त 2028 को रिलीज करेंगे. ये फिल्म नितिन गोखले की किताब 'R.N. Kao: Gentleman Spymaster' पर आधारित होगी. करण इस फिल्म को अपनी धर्मा प्रोडक्शंस कंपनी और Leo Media Collective संग मिलकर बना रहे हैं.
करण ने अपनी फिल्म की अनाउंसमेंट पर लिखा- उन्होंने वो बनाया, जो दिखाई नहीं देता था… लेकिन इतिहास में उसका असर हमेशा याद रखा जाएगा. आज RAW के 58 साल पूरे हो गए हैं और हमें खुशी है कि हम RAW के संस्थापक आर.एन. काव की कहानी पर फिल्म बनाने का ऐलान कर रहे हैं. आर.एन. काव ने पर्दे के पीछे रहकर काम किया और उस संस्था को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे आज हम RAW के नाम से जानते हैं. फिल्म में उनके पहले मिशन की कहानी भी दिखाई जाएगी.
कौन थे आर.एन काव?
फिलहाल इस फिल्म को कौन डायरेक्ट कर रहा है, और कौन-सा एक्टर इसमें आर.एन काव का रोल निभाएगा इसकी कोई जानकारी सामने नहीं आई है. ये कहानी 1955 के दौरान आर.एन काव की जिंदगी के उन पलों को दिखाएगी, जिसमें बताया जाएगा कि किन परिस्थितियों की वजह से RAW की स्थापना हुई और कहानी धीरे-धीरे 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के दौरान एजेंसी के पहले बड़े मिशन तक पहुंचेगी.
वैसे RAW की जिम्मेदारी संभालने से पहले आर.एन. काव इंटेलिजेंस ब्यूरो के एविएशन रिसर्च सेंटर के प्रमुख थे. उन्होंने तब पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ भी करीब से काम किया था. काव कई संवेदनशील खुफिया अभियानों का हिस्सा रहे और 1971 में बांग्लादेश के बनने से जुड़े घटनाक्रम में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.