केरल के पूर्वी पहाड़ी इलाकों में बसा पीरुमाडे विधानसभा क्षेत्र राजनीति के शोर-शराबे से दूर, सावधानी के साथ अपनी दिशा तय करता है. यहां की राजनीति किसी बड़े शहर, उद्योग या व्यापारिक केंद्र से नहीं, बल्कि चाय और इलायची के बागानों, घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी रास्तों से जुड़ी हुई है. इस क्षेत्र में मतदान आकांक्षाओं से अधिक सुरक्षा और स्थिरता की भावना से प्रेरित होता है.
पीरुमाडे, इडुक्की लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और इसका विस्तार बागानों, जंगलों और छोटे-छोटे पहाड़ी गांवों तक फैला हुआ है. यहां की आबादी भौगोलिक रूप से बिखरी हुई है और आर्थिक रूप से मुख्य रूप से बागान मजदूरी, सरकारी कल्याण योजनाओं और आपदा राहत पर निर्भर है. इसलिए यहां राज्य सरकार कोई दूर की सत्ता नहीं, बल्कि राशन की दुकान, अस्पताल, राहत शिविर और मुआवजे की फाइलों के रूप में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है.
इस क्षेत्र का जीवन कठिन भूगोल से जुड़ा है. मानसून के दौरान भूस्खलन और सड़कों के टूटने से कई गांव कट जाते हैं. पीढ़ियों से बागानों में रहने वाले मजदूर आज भी लाइन हाउसों में रहते हैं, जिनके पास जमीन का मालिकाना हक या वैकल्पिक आजीविका के साधन सीमित हैं. जलवायु परिवर्तन, वैश्विक बाजार में दामों का उतार-चढ़ाव और पुराने हो चुके बागान उनकी असुरक्षा को और बढ़ाते हैं. जंगलों के किनारे बसे इलाकों में हाथियों जैसे जंगली जानवरों से टकराव रोजमर्रा की चिंता है, जो बच्चों की पढ़ाई से लेकर खेती और आवाजाही तक को प्रभावित करता है.
सामाजिक दृष्टि से यहां कोई एक समुदाय निर्णायक प्रभुत्व में नहीं है. विभिन्न समुदायों से आए बागान मजदूर सबसे बड़ा वर्ग हैं, लेकिन उनकी एकता जाति से अधिक श्रम और रोजगार की स्थितियों पर आधारित है. छोटे-छोटे आदिवासी समूह जंगलों के बीच रहते हैं और भूमि अधिकार, आजीविका तथा सरकारी मदद की समय पर उपलब्धता उनके लिए बड़े मुद्दे हैं. ईसाई, एझवा और अन्य हिंदू समुदाय भी कुछ क्षेत्रों में बसे हैं, जबकि मुस्लिम आबादी सीमित और बिखरी हुई है. इसलिए यहां राजनीति पहचान से ज्यादा भरोसे और कामकाज पर टिकी रहती है.
पीरुमाडे की राजनीति मूल रूप से कल्याण योजनाओं और संकट प्रबंधन के इर्द-गिर्द घूमती है. बाढ़, भूस्खलन, स्वास्थ्य आपात स्थितियां और वन्यजीव हमले यहां असाधारण नहीं, बल्कि बार-बार आने वाली चुनौतियां हैं. जनता अपने प्रतिनिधियों को इसी आधार पर परखती है कि वे संकट के समय कितने सक्रिय हैं और प्रशासन से मदद दिलाने में कितने सक्षम हैं. ऐतिहासिक रूप से वामपंथी दलों को यहां बढ़त मिलती रही है क्योंकि उनका संबंध बागान मजदूरों और कल्याणकारी नीतियों से जुड़ा रहा है. 2021 के विधानसभा चुनाव में भी वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) के उम्मीदवार वझूर सोमन ने जीत दर्ज की, जो महामारी और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में कल्याण आधारित राजनीति के प्रति भरोसे को दर्शाता है.
कुल मिलाकर पीरुमाडे का मतदान व्यवहार विचारधारा से कम और जमीनी जरूरतों से अधिक संचालित होता है. यहां के मतदाता उन नेताओं को महत्व देते हैं जो दुर्गम इलाकों में पहुंचते हैं, संकट के समय साथ खड़े होते हैं और सरकारी सहायता को जमीन तक पहुंचाते हैं. यह केरल की उस राजनीति का प्रतीक है जो सुर्खियों में कम दिखती है, लेकिन जहां लोकतंत्र का अर्थ नारों से नहीं, बल्कि राहत, सुरक्षा और थोड़ी-सी बेहतर होती जिंदगी से तय होता है.
(K. A. Shaji)
Adv.syriac Thomas
INC
Sreenagari Rajan
BJP
Biju Mattappally
BSP
Nota
NOTA
P.k Gopalakrishnan
IND
Soman
IND
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