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NEET एग्जाम से ठीक पहले AI तैयार करे क्वेश्चन पेपर, नंदन नीलेकणि का ये सुझाव क‍ितने काम का?

NEET में पेपर लीक की समस्या से निपटने के लिए नंदन नीलेकणि कमेटी ने अंतिम समय में AI द्वारा क्वेश्चन पेपर जनरेट करने और कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) का दायरा बढ़ाने का सुझाव दिया है. कमेटी का तर्क है कि फिक्स पेपर न होने से लीक का ब्लैक मार्केट खत्म हो जाएगा. हालांकि, विशाल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना एक बड़ी चुनौती होगी. 

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न खत्म होगा क्वेश्चन पेपर का फिक्स होना, न बिकेगा पर्चा, जानिए नंदन नीलेकणि पैनल की सिफारिशें
न खत्म होगा क्वेश्चन पेपर का फिक्स होना, न बिकेगा पर्चा, जानिए नंदन नीलेकणि पैनल की सिफारिशें

देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET (UG) में 'पेपर लीक' और धांधली को हमेशा के लिए खत्म क‍िया जा सकता है. इन्फोसिस के सह-संस्थापक और टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली हाई-लेवल कमेटी ने एक क्रांतिकारी फॉर्मूला पेश किया है. इस फॉर्मूले में दावा क‍िया गया है कि इससे पेपर लीक को पूरी तरह रोका जा सकता है. 

नीलेकणि कमेटी का कहना है कि जब तक बाजार में परीक्षा से हफ्ते-दस दिन पहले एक तय क्वेश्चन पेपर मौजूद रहेगा, तब तक उसे चुराने और बेचने का 'आर्थिक लालच' बना रहेगा. इस लालच और ब्लैक मार्केट को खत्म करने का एकमात्र तरीका है, वो है क्वेश्चन पेपर के फिक्स कॉन्सेप्ट को ही खत्म कर देना. आइए, समझते हैं कि नंदन नीलेकणि कमेटी के ये नए सुझाव क्या हैं, इन्हें कैसे लागू किया जा सकता है और इसका छात्रों पर क्या फायदा व नुकसान होगा...

कमेटी नए बदलाव क्यों चाहती है?

पारंपरिक परीक्षा प्रणाली में क्वेश्चन पेपर हफ्तों पहले तैयार होता है, उसकी प्रिंटिंग होती है, बैंकों व स्ट्रांग रूम में ट्रांसफर होता है और फिर सेंटर तक पहुंचता है. सप्लाई चेन के इस लंबे नेटवर्क में कहीं न कहीं से पेपर लीक होने की आशंका हमेशा बनी रहती है. नीलेकणि कमेटी का मानना है कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके इस टाइम-गैप को शून्य कर दिया जाए ताकि माफिया के पास लीक करने के लिए कोई एक तय पेपर रहे ही नहीं.   

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क्या हैं मुख्य सुझाव और प्रस्तावित बदलाव?

1. विशाल क्वेश्चन बैंक
2. एजेंसी हजारों-लाखों कठिन और मानक प्रश्नों का एक विशाल 'क्वेश्चन बैंक' तैयार रखेगी.
3. लास्ट-मिनट AI पेपर जेनरेशन
4. परीक्षा शुरू होने से ठीक कुछ समय पहले AI या रैंडम एल्गोरिदम के जरिए उस विशाल डेटाबेस में से प्रश्न चुनकर एक फ्रेश क्वेश्चन पेपर ऑटो-जनरेट किया जाएगा.   
5. सीबीटी (Computer-Based Testing) मोड का विस्तार
6. कमेटी ने पेन-पेपर ओएमआर (OMR) मोड के बजाय देशभर में कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट (CBT) सेंटर्स के नेटवर्क को 1.5 लाख से भी आगे बढ़ाने पर जोर दिया है, ताकि हर छात्र ऑनलाइन परीक्षा दे सके.   

यह व्यवस्था कैसे लागू हो सकती है?   

कमेटी की इस स‍िफार‍िश को लागू करने के ल‍िए देश भर के परीक्षा केंद्रों को पूरी तरह से सुरक्षित कंप्यूटरों, हाई-स्पीड इंटरनेट और पावर बैकअप से लैस करना होगा. फिर परीक्षा शुरू होने से 15-20 मिनट पहले सर्वर से प्रश्नपत्र सीधे छात्र के कंप्यूटर स्क्रीन पर एन्क्रिप्टेड फॉर्म में पहुंचेगा.

छात्रों के लिए इसके क्या फायदे और नुकसान होंगे?

अगर फायदे की बात करें तो पेपर लीक और रद्दी खरीद-फरोख्त पूरी तरह बंद हो जाएगी. लेकिन सेंट्रल डेटाबेस या सॉफ्टवेयर हैक होने का एक नया साइबर रिस्क हो सकता है. अगर ये तरीका सेफली लागू हो सका तो मेहनत करने वाले असली और योग्य छात्रों को पूरा न्याय मिलेगा. लेक‍िन अलग-अलग शिफ्टों/सेटों के कारण 'कठिनाई के स्तर' को लेकर विवाद हो सकता है. इससे OMR शीट भरने में होने वाली मानवीय गलतियां नहीं होंगी, लेकिन ग्रामीण/छोटे कस्बों के छात्रों के लिए कंप्यूटर-स्क्रीन पर 3 घंटे परीक्षा देना थोड़ा असहज हो सकता है.

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लागू करना कितना आसान या मुश्किल है?

- चुनौती भारी है: 23 लाख से अधिक नीट अभ्यर्थियों के लिए एक साथ सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क बनाना एक बड़ा लॉजिस्टिक चैलेंज है.
- तकनीकी बाधाएं: सर्वर क्रैश होना, पावर कट या सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी होने पर री-एग्जाम की नौबत आ सकती है.  उम्मीद की किरण: भारत ने आधार, यूपीआई (UPI) और कोविन (CoWIN) जैसे बड़े पैमाने के डिजिटल प्लेटफॉर्म सफलतापूर्वक बनाए हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) भी इन टेक्नोलॉजी-बेस्ड सुधारों को जल्द से जल्द लागू करने को लेकर गंभीर है.

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