भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में सबसे लंबी और भौगोलिक रूप से सबसे जटिल सीमा बांग्लादेश के साथ लगती है. 1947 में विभाजन के समय सर सिरिल रेडक्लिफ द्वारा खींची गई यह रेडक्लिफ लाइन आज देश की आंतरिक सुरक्षा, डेमोग्राफी और कूटनीति के लिहाज से बेहद संवेदनशील बन चुकी है.
4,000 किलोमीटर से भी लंबी इस सीमा पर घुसपैठ, मवेशी तस्करी और सीमा पार अपराध हमेशा से सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती रहे हैं. हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय और सीमावर्ती राज्यों के बीच सीमा सुरक्षा को और पुख्ता करने के लिए कई उच्च स्तरीय बैठकें हुई हैं, जिसमें घुसपैठ के रास्तों को पूरी तरह बंद करने का मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है. आइए समझते हैं कि बांग्लादेश के साथ भारत के कौन से राज्य कितनी सीमा साझा करते हैं. घुसपैठ का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट कौन सा क्षेत्र है.
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भारत-बांग्लादेश सीमा का भौगोलिक ढांचा
गृह मंत्रालय (MHA) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 4096.7 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है. यह दुनिया की पांचवीं सबसे लंबी भूमि सीमा है. भारत के पांच राज्य बांग्लादेश के साथ अपनी सीमाएं साझा करते हैं. इस सीमा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से मैदानी या सूखी जमीन नहीं है; इसमें घने जंगल, पहाड़, दलदली इलाके और कई नदी क्षेत्र शामिल हैं, जो इसकी सुरक्षा को अत्यधिक चुनौतीपूर्ण बना देते हैं.

यदि हम राज्यों के अनुसार इस सीमा की लंबाई का वर्गीकरण करें, तो आंकड़े कुछ इस प्रकार हैं...
सबसे बड़ा सवाल: सबसे ज्यादा घुसपैठ कहां होती है?
सीमा सुरक्षा बल (BSF) और खुफिया एजेंसियों के इनपुट्स के मुताबिक, भारत-बांग्लादेश सीमा पर सबसे ज्यादा घुसपैठ पश्चिम बंगाल के रास्ते होती है. इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं- पहला, पश्चिम बंगाल का बांग्लादेश के साथ सबसे लंबा (2,216.7 किमी) बॉर्डर होना. दूसरा, यहां की सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदी क्षेत्र और घने रिहायशी इलाकों के बीच से गुजरना.
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पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिबाद, मालदा और कूचबिहार ऐसे जिले हैं, जिन्हें घुसपैठ और तस्करी का मुख्य केंद्र माना जाता है. उत्तर 24 परगना का पेट्रापोल-बेनापोल इलाका और स्वरूपनगर, बशीरहाट जैसे क्षेत्र भौगोलिक रूप से इतने घुले-मिले हैं कि कई जगहों पर भारत और बांग्लादेश के घर एक-दूसरे से सटे हुए हैं. मालदा और मुर्शिदाबाद में गंगा और उसकी सहायक नदियों का बहाव हर साल अपनी दिशा बदलता है, जिससे सीमा पर लगाई गई कटीली तारें बह जाती हैं. इन खुले नदी के रास्तों का फायदा उठाकर घुसपैठिये और मानव तस्कर भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं.

त्रिपुरा और असम भी हैं संवेदनशील हॉटस्पॉट
पश्चिम बंगाल के बाद घुसपैठ का दूसरा बड़ा हॉटस्पॉट त्रिपुरा और असम का सीमावर्ती इलाका है. त्रिपुरा तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है. हालांकि त्रिपुरा में बड़े पैमाने पर फेंसिंग का काम पूरा हो चुका है, लेकिन कुछ दुर्गम पहाड़ी और नदी घाटियों वाले हिस्सों में अभी भी पैच खुले हुए हैं. हाल के दिनों में बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद त्रिपुरा और असम सीमाओं पर हाई अलर्ट जारी किया गया है.
असम की बात करें तो धुबरी और मनकाचार का इलाका, जहां से ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है, घुसपैठ का एक पारंपरिक रूट रहा है. रात के अंधेरे में नावों और तैरने वाले उपकरणों के सहारे घुसपैठिये असम की सीमा लांघने की कोशिश करते हैं, जिसे रोकने के लिए असम पुलिस और BSF लगातार संयुक्त ऑपरेशन चला रहे हैं.
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डेमोग्राफिक बदलाव और सुरक्षा
घुसपैठ सिर्फ सुरक्षा की समस्या नहीं है. यह डेमोग्राफिक, संस्कृति, संसाधनों और कानून व्यवस्था पर असर डालती है. असम और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों में स्थानीय लोगों का कहना है कि अवैध प्रवासियों की वजह से उनकी संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो रहा है.
यह समस्या असम आंदोलन के समय से चली आ रही है. NRC और CAA जैसे मुद्दे इसी चिंता से जुड़े हैं. सरकार का कहना है कि अवैध घुसपैठ को रोका जाएगा और जनसांख्यिकीय बदलाव नहीं होने दिया जाएगा. हाल के वर्षों में त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में इस दिशा में कड़े कदम उठाए जा रहे हैं.

फेंसिंग में बाधाएं: क्यों पूरी तरह सील नहीं हो पाई सीमा?
सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद, भारत-बांग्लादेश सीमा का लगभग 80-85% हिस्सा ही कटीली तारों से घेरा जा सका है. गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भी कई सौ किलोमीटर की सीमा अनफेंस्ड है. इसे पूरी तरह सील न कर पाने के पीछे निम्नलिखित बड़ी चुनौतियां हैं...
कठिन भौगोलिक भूभाग: मेघालय की खड़ी पहाड़ियां, मिजोरम के घने जंगल और असम-बंगाल के दलदली व नदी क्षेत्र ऐसे हैं जहां पर कटीली तारें लगाना या उन्हें टिकाए रखना व्यावहारिक रूप से असंभव है.
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जमीन अधिग्रहण की समस्या: सीमा सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचा और फेंसिंग बनाने के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत होती है. पश्चिम बंगाल जैसे घनी आबादी वाले राज्य में राज्य सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया धीमी होने के कारण कई किलोमीटर का काम सालों से लंबित है.
मानवीय बस्तियां: अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, जीरो लाइन (बॉर्डर) से 150 गज की दूरी पर फेंसिंग लगाई जाती है. लेकिन कई गांवों में भारतीय नागरिकों के घर और खेती की जमीन इस 150 गज के दायरे के अंदर या बॉर्डर के ठीक ऊपर स्थित है, जिससे फेंसिंग लगाने में सामाजिक और प्रशासनिक दिक्कतें आती हैं.

सुरक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव: तकनीक और 'मास्टर प्लान' का सहारा
घुसपैठ की इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार और सुरक्षा बल अब केवल पारंपरिक कटीली तारों पर निर्भर नहीं हैं. अब सीमा प्रबंधन के लिए व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) का उपयोग किया जा रहा है. इसके तहत बिना फेंसिंग वाले नदी क्षेत्रों में अत्याधुनिक तकनीकों का जाल बिछाया जा रहा है...
स्मार्ट फेंसिंग और थर्मल सेंसर: नदी और दलदली इलाकों में जमीन के अंदर और पानी के नीचे सेंसर लगाए गए हैं, जो किसी भी हलचल पर तुरंत BSF के कंट्रोल रूम को अलर्ट भेज देते हैं.
अंडरवाटर सोनार और ड्रोन निगरानी: रात के समय या भारी कोहरे के दौरान सीमा पार से होने वाली गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए हाई-टेक ड्रोन और थर्मल इमेजर कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
केंद्र और राज्य का साझा ब्लूप्रिंट: हालिया प्रशासनिक सुधारों के तहत, केंद्रीय गृह मंत्रालय, BSF और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलाधिकारियों ने मिलकर एक नया 'मास्टर प्लान' तैयार किया है. इसके तहत खुफिया जानकारी को तुरंत साझा करने और स्थानीय पुलिस की मदद से सीमावर्ती गांवों में अवैध रूप से रह रहे संदिग्धों की पहचान करने पर जोर दिया जा रहा है.