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इंसान की बड़ी गलती: पाताल से पानी निकालने के चक्कर में 31.5 इंच झुक गई हमारी धरती

जमीन के अंदर से ज्यादा पानी निकालने की वजह से पृथ्वी पर वजन का संतुलन बिगड़ गया है. इसके चलते पृथ्वी की धुरी करीब 31.5 इंच खिसक गई है, जिससे समुद्र का जलस्तर भी बढ़ा है.

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जमीन से ज्यादा पानी निकालने की वजह से धरती का वजन असंतुलित हो गया है. (Photo: ITG)
जमीन से ज्यादा पानी निकालने की वजह से धरती का वजन असंतुलित हो गया है. (Photo: ITG)

हम सब जानते हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस धरती को हम बिल्कुल स्थिर और मजबूत मानते हैं, वह इंसानी गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष में अपनी जगह से डगमगा गई है? 

इंसानों द्वारा खेतों की सिंचाई, फैक्टरियों और पीने के लिए जमीन के अंदर से बेहिसाब पानी निकालने की वजह से हमारी पृथ्वी का रोटेशनल एक्सिस यानी धुरी  लगभग 31.5 इंच (करीब 80 सेंटीमीटर) खिसक गई है. यह बदलाव साल 1993 से 2010 के बीच हुआ है. 

सुनने में यह मामूली लग सकता है, लेकिन ब्रह्मांड के पैमाने पर एक पूरी सौर प्रणाली के ग्रह का इस तरह डगमगाना वैज्ञानिकों के लिए बेहद चिंता और हैरानी का विषय बन गया है. यह सनसनीखेज खुलासा सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के जियोफिजिसिस्ट की-वियोन सेओ और उनकी टीम ने किया है. यह जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में छपा है.  

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इसके बाद साल 2026 में आए कई अन्य शोधों जैसे जर्नल ऑफ जियोडेसी और नेचर की रिपोर्टों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि पानी का यह बड़े पैमाने पर विस्थापन न केवल धरती की चाल बदल रहा है, बल्कि समुद्र के जलस्तर को बढ़ाकर तटीय इलाकों को डुबाने का काम भी कर रहा है. 

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कैसे बदला पृथ्वी का संतुलन? 

पृथ्वी के घूमने और उसके झुकने के पीछे पूरी तरह से भौतिक विज्ञान का एक सीधा नियम काम करता है. नासा के वैज्ञानिकों ने इसे समझाने के लिए एक घूमते हुए लट्टू का उदाहरण दिया है. यदि आप एक साधारण खिलौना लट्टू को तेजी से नचाएं, तो वह अपनी धुरी पर बिल्कुल सीधा घूमता है. 

Groundwater depletion Earth Polar motion

लेकिन अगर आप उस घूमते हुए लट्टू के किसी एक हिस्से पर छोटा सा पत्थर या थोड़ा सा वजन चिपका दें, तो क्या होगा? लट्टू तुरंत लड़खड़ाने लगेगा और उसका संतुलन थोड़ा बदल जाएगा. हमारी पृथ्वी भी अंतरिक्ष में घूमते हुए एक विशाल लट्टू की तरह ही है. पृथ्वी पर मौजूद हर चीज- चाहे वह महासागर हों, ऊंचे पहाड़ हों, ग्लेशियर हों या जमीन के नीचे छुपा अरबों टन पानी- सबका अपना एक वजन होता है. 

जब तक यह वजन अपनी जगह पर बना रहता है, पृथ्वी एक निश्चित गति और कोण पर घूमती रहती है. लेकिन जब हम इंसान एक जगह से भारी मात्रा में वजन हटाकर उसे दूसरी जगह भेज देते हैं, तो पृथ्वी का मास डिस्ट्रीब्यूशन बिगड़ जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पानी में बहुत वजन होता है और इसी वजन के खिसकने से पैदा हुए लीवरेज ने पृथ्वी के घूमने के ध्रुव को अपनी जगह से हटने पर मजबूर कर दिया है.

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2150 गीगाटन पानी का पाताल से महासागरों तक का सफर

वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल्स और सैटेलाइट डेटा की मदद से यह हिसाब लगाया है कि इंसानों ने 1993 से 2010 के बीच जमीन के भीतर बने प्राकृतिक जलस्रोतों से लगभग 2,150 गीगाटन (यानी 21 लाख 50 हजार करोड़ टन) भूजल पंप करके बाहर निकाल लिया. इतने भारी-भरकम पानी का इस्तेमाल मुख्य रूप से फसलों की सिंचाई करने और शहरों की प्यास बुझाने के लिए किया गया.

अब सवाल उठता है कि जमीन से निकला यह पानी गया कहां? 

खेतों में छिड़का गया और शहरों में इस्तेमाल हुआ यह पानी अंततः नदियों और नालों के जरिए बहकर दुनिया के विशाल महासागरों में जाकर मिल गया. यानी जो पानी पहले जमीन के बहुत नीचे स्थिर जमा था, वह अब पूरी पृथ्वी पर फैलकर समुद्रों का हिस्सा बन गया. वजन के इस इतने बड़े हेरफेर का सीधा असर पृथ्वी की धुरी पर पड़ा. 

Groundwater depletion Earth Polar motion

शोधकर्ताओं ने जब अपने पोलर-मोशन मॉडल में इस भूजल की आवाजाही के आंकड़ों को जोड़ा, तो यह वास्तविक रूप से देखे जा रहे पृथ्वी के झुकाव से पूरी तरह मैच कर गया. जमीन से निकले इसी पानी के कारण दुनिया भर के समुद्रों का जलस्तर लगभग 6.24 मिलीमीटर (0.24 इंच) बढ़ गया.

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भारत और अमेरिका की भूमिका: किन क्षेत्रों का पड़ा सबसे ज्यादा असर?

की-वियोन सेओ ने इस बात को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है. उनका कहना है कि पृथ्वी के ध्रुवों में होने वाले बदलावों के जितने भी जलवायु-संबंधी या प्राकृतिक कारण हैं. उनमें से भूजल के इस बड़े पैमाने पर पुनर्वितरण का असर सबसे ज्यादा और प्रभावशाली देखा गया है.

वैज्ञानिकों ने जब यह जानने की कोशिश की कि आखिर पृथ्वी के किस हिस्से से पानी निकालने पर इस घूमने की गति पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है, तो चौंकाने वाले भौगोलिक तथ्य सामने आए. पृथ्वी के बीच वाले हिस्से में यानी इक्वेटर लाइन से पानी को स्थानांतरित करने का असर ध्रुवों की गति पर सबसे गंभीर होता है. 

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पश्चिमी उत्तरी अमेरिका और उत्तर-पश्चिमी भारत में बड़े पैमाने पर सिंचाई और खेती के लिए किए गए भूजल दोहन को पृथ्वी की धुरी के खिसकने के लिए सबसे मुख्य रूप से जिम्मेदार पाया गया है. भारत के पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाकों में धान और अन्य फसलों के लिए अत्यधिक पंपिंग ने वैश्विक स्तर पर पृथ्वी के संतुलन को हिलाने में बड़ी भूमिका निभाई है. 

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क्या कहते हैं साल 2026 के वैज्ञानिक शोध?

विज्ञान हमेशा नए विश्लेषणों और बेहतर तकनीकों के साथ आगे बढ़ता रहता है. इसी सिलसिले में साल 2026 में 'जर्नल ऑफ जियोडेसी' में एक नया मूल्यांकन प्रकाशित किया गया, जिसमें 'वॉटरगैप' नामक बेहद आधुनिक हाइड्रोलॉजिकल मॉडल का इस्तेमाल किया गया था. 

Groundwater depletion Earth Polar motion

इस अध्ययन में पाया गया कि पृथ्वी पर मौजूद स्थलीय जल भंडारण विभिन्न समय-अंतरालों में पृथ्वी की ध्रुवीय गति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हालांकि, इस नए मॉडल ने एक और पहलू सामने रखा कि लंबी अवधि के रुझानों में केवल भूजल ही नहीं, बल्कि बर्फबारी के बदलते पैटर्न के कारण होने वाले स्नो-वॉटर स्टोरेज में बदलाव और ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों का पिघलना सबसे बड़े कारक हैं. 

इस मॉडल में भूजल और बांधों में जमा पानी के प्रभाव को थोड़ा छोटा लेकिन फिर भी स्पष्ट रूप से पहचाने जाने योग्य माना गया है. साल 2026 में ही वैज्ञानिकों ने 'TWSTORE' और 'ML-TWiX' जैसी दो नई प्रणालियों को पेश किया है, जो पिछले चार दशकों (1980 से 2012) के वाटर स्टोरेज के ऐतिहासिक डेटा का पुनर्निर्माण करती हैं कि सैटेलाइट युग से पहले के दौर के अनसुलझे रहस्यों को भी पूरी सटीकता से समझा जा सके.

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डगमगाती पृथ्वी के इंसानी जीवन पर गंभीर और जमीनी प्रभाव

पृथ्वी के अक्ष का यह डगमगाना भले ही अंतरिक्ष विज्ञान का विषय लगे, लेकिन जमीन से पानी गायब होने के जो नतीजे हम इंसानों को भुगतने पड़ रहे हैं, वे बेहद डरावने हैं. अत्यधिक ग्राउंडवाटर निकालने के कारण दुनिया के कई हिस्सों में जमीन अंदर की ओर धंसने लगी है, जिससे शहरों की इमारतें और बुनियादी ढांचे खतरे में पड़ गए हैं. 

साल 2026 में नेचर जर्नल में दुनिया के 40 प्रमुख नदी डेल्टाओं पर की गई स्टडी में पाया गया कि इन उपजाऊ क्षेत्रों में जमीन का धंसना अब समुद्र के जलस्तर में होने वाली वास्तविक बढ़ोतरी से भी बड़ा खतरा बन चुका है. स्टडी किए गए 40 में से 10 बड़े डेल्टाओं में जमीन के धंसने के पीछे सीधे तौर पर भूजल की कमी को जिम्मेदार पाया गया.

Groundwater depletion Earth Polar motion

इसके अतिरिक्त, तटीय इलाकों के कुओं और एक्विफर्स में पानी का स्तर घटने से समुद्र का खारा पानी तेजी से मीठे पानी के स्रोतों में घुस रहा है, जिससे भविष्य में पीने के पानी और खेती का संकट कई गुना बढ़ने वाला है.

क्या कोई उम्मीद बाकी है? जल संरक्षण और रिकवरी के सफल रास्ते

इन तमाम डरावनी खबरों के बीच विज्ञान और इंसानी सूझबूझ ने उम्मीद की एक नई किरण भी दिखाई है. साल 2026 में ही 'साइंस' जर्नल में एक व्यापक समीक्षा रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें दुनिया भर के ऐसे 67 मामलों का गहराई से अध्ययन किया गया जहां इंसानी हस्तक्षेप और सही नीतियों के कारण दम तोड़ चुके भूजल स्तर में शानदार सुधार और रिकवरी (Groundwater Recovery) देखी गई.

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इस रिपोर्ट से यह साबित हुआ कि अगर सही समय पर ठोस कदम उठाए जाएं, तो जमीन के नीचे के जलस्रोतों को दोबारा जीवित किया जा सकता है. इन सफलताओं के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण थे...

  • वैकल्पिक जल आपूर्ति: शहरों और खेतों के लिए जमीन के पानी पर निर्भरता कम करके नदियों या रीसाइकल किए गए पानी का उपयोग बढ़ाना.
  • आर्टिफिशियल रीचार्जः बारिश के पानी को आधुनिक तकनीकों के जरिए जबरन जमीन के नीचे उतारना और वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाना.
  • सख्त नीतियां और कानून: पानी की बर्बादी रोकने के लिए कड़े नियम लागू करना और पानी के व्यावसायिक दोहन पर शुल्क या पाबंदियां लगाना.

वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी भी दी है कि ये समाधान 'प्लग-एंड-प्ले' जैसे नहीं हैं, यानी जो तरीका किसी एक समृद्ध देश या शहर में काम कर गया, जरूरी नहीं कि वह हर सूखे और गरीब क्षेत्र के लिए भी उतना ही आसान हो. हमें हर इलाके की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से स्थानीय समाधान ढूंढने होंगे, ताकि हम न सिर्फ अपने भविष्य के पानी को सुरक्षित कर सकें, बल्कि अपनी इस खूबसूरत पृथ्वी के लड़खड़ाते कदमों को भी थाम सकें.

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