मध्य प्रदेश के खरगोन में 2022 के रामनवमी दंगा मामले में अदालत ने सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया है. चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ की अदालत ने यह फैसला जुलाई 2026 में सुनाया. अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा. मामले में ठोस साक्ष्यों की कमी के साथ-साथ कई अहम गवाह भी अपने पुराने बयानों से मुकर गए. इसी आधार पर अदालत ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया.
10 अप्रैल 2022 को भड़की थी हिंसा
यह पूरा मामला 10 अप्रैल 2022 को रामनवमी के मौके पर खरगोन के भाटवाड़ी इलाके में हुई साम्प्रदायिक हिंसा से जुड़ा है. रामनवमी जुलूस के दौरान इलाके में पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई थीं. पुलिस ने आरोप लगाया था कि भीड़ में शामिल लोगों ने मकानों और वाहनों को नुकसान पहुंचाया और पेट्रोल बम भी फेंके. मामले में विस्फोटक पदार्थों के इस्तेमाल का भी आरोप लगाया गया था और इसी के तहत केस दर्ज किया गया. हिंसा के बाद खरगोन शहर में करीब 26 दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा था.
11 लोगों पर थे संगीन आरोप
पुलिस ने इबादत अली, सादिक, अब्दुल्ला समेत कुल 11 लोगों को मामले में आरोपी बनाया था. इनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की अलग-अलग धाराओं के साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई थी. अभियोजन का आरोप था कि सभी आरोपी हिंसक भीड़ का हिस्सा थे और उन्होंने दंगे के दौरान अलग-अलग वारदातों को अंजाम दिया. हालांकि, मुकदमे की लंबी सुनवाई के दौरान अभियोजन के सामने गवाहों और साक्ष्यों को लेकर कई मुश्किलें सामने आईं. करीब 1,568 दिन बाद आए फैसले में अदालत ने अभियोजन की कहानी को पर्याप्त प्रमाण के अभाव में अस्वीकार कर दिया.
13 में से 8 चश्मदीद मुकर गए
अभियोजन पक्ष ने इस मामले में कुल 13 गवाह पेश किए थे, जिनमें आठ प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे. सुनवाई के दौरान इन आठ गवाहों में से अधिकांश ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया. कई गवाहों ने अदालत में आरोपियों की पहचान करने से इनकार कर दिया और अपने पहले के बयानों से पीछे हट गए. कुछ गवाहों ने बताया कि दंगाइयों ने अपने चेहरे कपड़े से ढक रखे थे, जिसकी वजह से उनकी पहचान करना मुश्किल था. अभियोजन के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती बनी और इसी वजह से आरोपियों की भूमिका को सीधे तौर पर साबित नहीं किया जा सका.
गवाहों ने कहा- हमलावरों के चेहरे ढंके थे
खरगोन कोतवाली के थाना प्रभारी बीएल मंडलोई के मुताबिक, घटना के समय जिन लोगों को गवाह बनाया गया था, वे बाद में अदालत में आरोपियों की पहचान से मुकर गए. मामले की सुनवाई के दौरान आकाश जैन और दिनेश जैन जैसे महत्वपूर्ण गवाहों के बयानों पर भी अदालत ने गौर किया. इन गवाहों ने स्वीकार किया कि घटना के समय दंगाइयों के चेहरे कपड़े से ढंके हुए थे. ऐसे में भीड़ के बीच मौजूद लोगों की पहचान को लेकर गंभीर संदेह पैदा हुआ. अदालत ने माना कि केवल सामान्य बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति को आपराधिक घटना के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
आरोपियों की पहचाना पर सवाल
मामले की मुख्य गवाह वैष्णवी जैन ने पुलिस के सामने दिए बयान में दावा किया था कि उसने सभी 11 आरोपियों को पहचाना था. हालांकि, उसका यह बयान घटना के 51 दिन बाद दर्ज किया गया था और अभियोजन देरी का ठोस कारण अदालत के सामने नहीं रख सका. वहीं वैष्णवी के पिता और भाई ने अदालत में कहा कि दंगाइयों के चेहरे ढंके हुए थे और मौके पर करीब चार-पांच लोग ही दिखाई दिए थे. इस तरह एक ही परिवार के गवाहों के बयानों में बड़ा अंतर सामने आया. अदालत ने इस विरोधाभास को भी अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर असर डालने वाला माना.
500-600 मीटर दूर से पहचान?
एक अन्य गवाह दिनेश जैन ने अदालत को बताया कि उसने घटना को करीब 500 से 600 मीटर की दूरी से देखा था. अदालत ने माना कि इतनी दूरी से भीड़ के बीच मौजूद किसी व्यक्ति की पहचान करना स्वाभाविक और विश्वसनीय नहीं माना जा सकता. इसके अलावा पुलिस ने जांच के दौरान आरोपियों की पहचान के लिए किसी भी गवाह से शिनाख्त परेड नहीं करवाई थी. अदालत में आरोपियों की पहली बार पहचान किए जाने को भी इसी वजह से संदिग्ध माना गया. इन परिस्थितियों ने अभियोजन के उस दावे को कमजोर कर दिया, जिसमें आरोपियों को घटना में सीधे तौर पर शामिल बताया गया था.
FIR में छह नाम, बाद में बनाए गए 11 आरोपी
अदालत ने यह भी गौर किया कि शुरुआती एफआईआर में केवल छह लोगों के नाम दर्ज थे. बाद की कार्रवाई में कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया गया, लेकिन अतिरिक्त पांच आरोपियों के नाम किस आधार पर जोड़े गए, इसे अभियोजन स्पष्ट नहीं कर पाया. जांच के दौरान इन आरोपियों की पहचान और घटना में उनकी कथित भूमिका को स्थापित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य भी सामने नहीं आए. अदालत ने इसी वजह से आरोपियों की पहचान को लेकर अभियोजन की कहानी पर भरोसा नहीं किया. फैसले में कहा गया कि आपराधिक मामले में दोष साबित करने के लिए केवल संदेह या कमजोर परिस्थितियां पर्याप्त नहीं होतीं.
कोर्ट ने कहा- आरोपियों की भूमिका साबित नहीं
अदालत ने अपने फैसले में माना कि घटना के दौरान नुकसान, आगजनी और हिंसा हुई थी, इसे उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट माना जा सकता है. लेकिन किसी घटना का होना और किसी खास आरोपी की उसमें प्रत्यक्ष भूमिका साबित होना दो अलग बातें हैं. अदालत के मुताबिक अभियोजन पक्ष यह स्थापित करने में विफल रहा कि इन 11 आरोपियों ने ही हिंसा, आगजनी या विस्फोटक पदार्थों के इस्तेमाल में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी. केवल संदेह या सामान्य बयानों के आधार पर आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसी कारण अदालत ने सभी 11 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया.
हाईकोर्ट में अपील करेगा अभियोजन
सरकारी अधिवक्ता युवराज गुजराथी ने कहा कि अदालत के फैसले का अध्ययन किया जा रहा है और अभियोजन पक्ष हाईकोर्ट में अपील करेगा. उन्होंने कहा कि फैसले में अभियोजन की कहानी से जुड़ी कई खामियां सामने आई हैं, जिनका अध्ययन किया जा रहा है. खरगोन के एसपी रविंद्र वर्मा ने भी कहा कि मामले में जो कमियां रही हैं, उन्हें देखा जाएगा और आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी. अभियोजन अब अदालत के फैसले और रिकॉर्ड का अध्ययन कर हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है. इस तरह 2022 के खरगोन रामनवमी दंगा मामले में निचली अदालत की कार्यवाही के बाद कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रहने की संभावना है.