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तकिए से होना था काम तमाम, फिर चाकू से गोदकर किया मर्डर... दहला देगी विनीत मिनोचा हत्याकांड के आरोपी की करतूत

कानपुर के दवा कारोबारी विनीत मनोचा हत्याकांड में पुलिस ने बहू शालू को 16 दिन जेल में रखने के बाद बेगुनाह मान लिया है. पुलिस के इस यूटर्न की हर तरफ चर्चा हो रही है. अब कारोबारी के बेटे सुब्रत पर ही पिता की हत्या की साजिश रचने का आरोप है. पढ़ें ये सनसनीखेज कहानी.

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इस मामले में कानपुर पुलिस भी सवालों के घेरे में आ गई है (फोटो-ITG)
इस मामले में कानपुर पुलिस भी सवालों के घेरे में आ गई है (फोटो-ITG)

कानपुर के दवा कारोबारी विनीत मिनोचा की हत्या के मामले में कानपुर पुलिस ने गजब का यूटर्न लिया. कारोबारी की जिस बहू शालू को पुलिस ने कातिल बताकर जेल भेज दिया था, असल में वो बेगुनाह निकली. जबकि असली कातिल कोई और नहीं बल्कि विनीत मिनोचा का अपना बेटा सुब्रत मिनोचा निकला. पुलिस के मुताबिक सुब्रत ने अपने पिता की हत्या की साजिश अपने पुराने नौकर विशाल और राजकिशोर के साथ मिलकर रची थी. इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल पुलिस की शुरुआती जांच को लेकर है.

दरअसल,अब सच सामने आ जाने के बाद कानपुर के पुलिस कमिश्नर ने कहा कि उस वक्त उन्हें ऐसा लगा था. उन्होंने ऐसा सोचा था. उन्हें बस ऐसा लगा और शालू को गिरफ्तार कर लिया गया था. कानपुर के पुलिस कमिश्नर को ना जाने क्या-क्या लगा और उन्होंने लगने और विशाल के कहने भर से शालू को गिरफ्तार कर लिया था और जेल भेज दिया था. उस वक्त विशाल ने ऐसा बोला था. उस वक्त सबूत ऐसे दिख रहे थे. सो, इसीलिए उस वक्त बाकी दोनों कातिलों के साथ शालू को भी एक भी कातिल मान कर जेल भेज दिया था. क्या करें तब उस वक्त यही लग रहा था कि शालू ही अपने ससुर की कातिल है. कमिश्नर साहब के इस लगने भर की वजह से क्या क्या हो गया, क्या उन्हें खुद इस बात का अंदाजा है? 

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क्या उन्हें अंदाजा है कि सिर्फ उनके लगने के चक्कर में पूरी मीडिया और सोशल मीडिया जिसमें हम भी शामिल हैं एक महिला, एक पत्नी, एक बहू, एक मां के बारे में पिछले 16 दिनों से क्या-क्या कहा गया. सिर्फ कमिश्नर साहब और उनकी कानपुर पुलिस के इसी लगने की वजह से शालू बेगुनाह होते हुए भी पूरे 16 दिन जेल में रही. कमिश्नर साहब के इसी लगने ने बेकसूर शालू को इतना बदनाम कर दिया कि बेगुनाह होते हुए भी मुजरिमों की तरह दुपट्टे से उसे अपना मुंह छुपाना पड़ा. 

एक आईपीएस अफसर को कमिश्नर की कुर्सी तक पहुंचने में आराम से 15 साल तो लग ही जाते हैं. अब अगर इतने तजुर्बेकार कमिश्नर साहब भी सिर्फ कुछ लगने की वजह से आधी अधूरी जांच और एक कातिल के नाम भर लेने से किसी को कातिल करार दे कर जेल भेज दे, तो इसे आप क्या कहेंगे? वाकई कमाल है कमिश्नर साहब के. 

5 सितंबर की रात कानपुर के दवा कारोबारी विनीत मिनोचा का उन्हीं के घर में कत्ल होता है. कत्ल के 72 घंटे के अंदर-अंदर कानपुर पुलिस विनीत मिनोचा की बहू शालू को कातिल करार देते हुए गिरफ्तार कर लेती है. शालू की गिरफ्तारी पर बाकायदा कानपुर के आला पुलिस अफसर मीडिया को बयान देते हैं. दो में से एक सुपारी किलर विशाल बाकायदा पुलिस हिरासत में मीडिया के कैमरे पर ये कहता सुनाई देता है कि उसे कत्ल के लिए उसकी भाभी यानी शालू ने कहा था. ऊपर कमिश्नर साहब जिस बयान का जिक्र कर रहे हैं, वो यही बयान था.

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अब कानपुर पुलिस खुद कह रही है कि शालू बेकसूर है. असली कातिल खुद विनीत मिनोचा का बेटा सुब्रत है. तो फिर सवाल तो बनता है कमिश्नर साहब. बगैर ठोस तहकीकात के सिर्फ एक कातिल के नाम लेने भर से, दो-चार कॉल डिटेल से या घर में एंट्री के लिए गेट पर गार्ड को इजाजत दे देने से अगर आपकी जांच पूरी हो जाती है और आप 72 घंटे के अंदर अंदर शालू को कातिल घोषित कर देते हैं, तो फिर उसी विनीत मिनोचा मर्डर केस में उसके बेटे सुब्रत से कत्ल के आठ दिन बाद तक आपकी पुलिस पूछताछ क्यों नहीं करती? 

जितनी जल्दबाजी आपने बेकसूर शालू को कातिल करार देने में दिखाई उतनी जल्दबाजी सुब्रत से पूछताछ करने या उसे गिरफ्तार करने में क्यों नहीं नजर आई? और अब आप कह रहे हैं कि विनीत मिनोचा मर्डर केस का असली मास्टरमाइंड सिर्फ और सिर्फ सुब्रत है. शालू को फंसाया गया. आपकी पुलिस से कहीं ज्यादा अच्छी तो वो शालू है, जिसे आपने बेवजह 16 दिनों तक जेल में डाल कर रखा. कम से कम सच्चाई आने के बाद इतनी हिम्मत तो दिखा रही है कि खुद आपसे कह रही है कि मुझे बेशक आप जाने दीजिए पर मेरे पति को भी छोड़ दीजिए, उसे फंसाइये मत.

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वैसे आप और आपकी पुलिस की तमाम गलतियों के बावजूद एक चीज के लिए आपकी तारीफ भी बनती है. आप चाहते तो आगे की जांच के नाम पर शालू को क्लीन चिट देने की बजाय उसे कानूनी दांव-पेच में फंसा कर रख सकते थे. लेकिन आपने कम से कम ये कहा तो सही कि शालू बेकसूर है. असली गुनहगार उसका पति सुब्रत है, जिसने अपने पुराने नौकर विशाल के साथ मिल कर अपने पिता के कत्ल की साजिश रची थी. 

24 सितंबर की दोपहर कानपुर में पुलिस कमिश्नर ने एक प्रेस कान्फ्रेंस रखी थी. उस पूरी प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान पुलिस अफसरों के पीछे सिर्फ एक आरोपी खड़ा था- सुब्रत. सुब्रत अपने पिता का कातिल. आधे घंटे से ज्यादा चली प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान सुब्रत इसी तरह बूत बन कर खड़ा था. चेहरे पर कोई भाव नहीं. जबकि ठीक उसके आगे बैठे पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल लगातार इसी सुब्रत के बारे में बोल रहे थे. उन्होंने विनीत मिनोचा मर्डर केस की साजिश के बारे में तफ्सील से बताया. साथ ही बीच में सुब्रत की पुलिस कस्टडी में रिकॉर्ड बयान को भी मीडिया को दिखाया और सुनाया. 

अब साजिश की पूरी कहानी जान लेते हैं, क्योंकि अब कहानी पूरी तरह से बदल चुकी है. 24 सितंबर की देर रात करीब ढाई बजे पुलिस पूछताछ के बाद जैसे ही सुब्रत को उसकी गिरफ्तारी की खबर दी जाती है, तब पहली बार सुब्रत अपने पापा के कत्ल की कहानी सुनाता है. उसका पूरा बयान पुलिस वाले रिकॉर्ड कर रहे थे. जिसे प्रेस कांफ्रेंस में भी पुलिस वालों ने सुनाया. जिसमें सुब्रत उसके पापा यानी विनीत मिनोचा के कत्ल, कत्ल की वजह और साजिश की कहानी सुनाता है, जिसके आखिर में वो खुद कहता है कि इस साजिश के बारे में शालू को कुछ पता नहीं था.

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तो विनीत मिनोचा के कत्ल, कत्ल की साजिश और कत्ल की वजह की पूरी कहानी खुद आरोपी कातिल सुब्रत ने सुनाई. असल में सुब्रत को ये अंदाजा ही नहीं था कि उसने अपने पापा के कत्ल की जो असली साजिश रची थी, वो ऐन वक्त पर नाकाम हो जाएगी. कत्ल तकिये से मुंह दबा कर करना था. ताकि उसे नैचुरल मौत दिखाया जा सके. लेकिन विनीत मिनोचा ने विशाल और राजकिशोर को घर के अंदर देख लिया और फिर जैसे ही उन्होंने शोर मचाना शुरू किया, दोनों कातिल घबरा गए और चाकू से हमला कर दिया. यहीं सारा खेल बिगड़ गया.

खुद सुब्रत ये बता चुका है कि उसने अपने पापा को क्यों मारने का प्लान बनाया था. 40 हजार रुपये उसे खर्च के लिए मिलते थे. 40 लाख का कर्जा था. ऊपर से उसे एक डर था. डर ये कि कहीं किसी दिन विनीत मिनोचा किसी महिला को घर ना ले आएं और फिर सारी जायदाद उसी के नाम कर दें. सुब्रत का इल्जाम है कि उसके पिता कि कई महिलाओं के साथ संबंध थे.

लेकिन इस पूरी साजिश के दौरान कभी भी किसी भी मोड़ पर सुब्रत की पत्नी शालू इस साजिश का हिस्सा नहीं रही. वजह ये कि सुब्रत ने कभी उसे ये बताया ही नहीं था. जबकि सुब्रत पिछले चार पांच महीनों से अपने पिता को मारने की साजिश रच रहा था. तकिये से मुंह दबाने की बजाय जब घबरा कर विशाल और राजकिशोर ने चाकू से विनीत मिनोचा पर हमला किया, तो जाहिर था अब ये केस पुलिस केस बनने वाला था. इसी के बाद सुब्रत ने सबसे पहले अपने पिता के मर्डर केस में चाचा को फंसाने की सोची.

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लेकिन विशाल चाचा की बजाय गिरफ्तारी के बाद शालू का नाम ले बैठा. इस पर खुद सुब्रत हैरान था. लेकिन फिर उसे लगा कि अगर शालू फंस रही है, तो वो बच जाएगा. इसीलिए उसने भी पुलिस पूछताछ के दौरान शुरुआत में हमेशा शालू का ही नाम लिया. हालांकि अब सच्चाई सामने आने के बाद सुब्रत को इस बात का मलाल है कि उसने शालू को फंसा दिया था. पर उसे अपने पिता की मौत का मलाल नहीं है. हां, इतना जरूर कह रहा है कि वो नहीं चाहता था कि उसके पिता चाकू से मारे जाएं.

सुब्रत के बिछाए जाल में शालू फंस तो चुकी थी, लेकिन कहीं ना कहीं सुब्रत को इसका मलाल भी था. विनीत मिनोचा के मर्डर के बाद से वो ठीक से सो नहीं पा रहा था. इसी मलाल के चलते उसने ये भी सोच रखा था कि वो नींद की गोलियां खा कर अपनी जान दे देगा. 

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