चांद इस शुक्रवार सबसे दूर चला जाएगा, जानिए पृथ्वी पर क्या असर पड़ेगा?

इस शुक्रवार चांद पृथ्वी से सबसे दूर, करीब 403,945 किलोमीटर दूरी पर होगा. ज्वार-भाटा थोड़ा कमजोर पड़ेगा और चांद थोड़ा छोटा दिखेगा. अगर हमेशा के लिए दूर चला जाए तो ज्वार कम होंगे. दिन लंबे हो सकते हैं.

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ये तस्वीर नासा ने दी है, जिसमें चंद्रमा की सतह के पीछे धरती दिख रही है. (Photo: Getty) ये तस्वीर नासा ने दी है, जिसमें चंद्रमा की सतह के पीछे धरती दिख रही है. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:38 AM IST

आसमान में चमकता चंद्रमा हर महीने थोड़ा-थोड़ा नजदीक और दूर होता रहता है. इसकी कक्षा बिल्कुल गोल नहीं है, बल्कि अंडाकार है. इसलिए कभी-कभी चांद पृथ्वी के सबसे करीब आता है, जिसे पेरिजी कहते हैं. कभी सबसे दूर चला जाता है, जिसे एपोजी कहते हैं. इस शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को चांद पृथ्वी से अपनी सबसे दूर दूरी पर पहुंचने वाला है. 

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यह दूरी लगभग 403,945 किलोमीटर होगी. औसत दूरी करीब 384,400 किलोमीटर होती है. अब सवाल ये है कि जब चांद इतना दूर चला जाएगा तो पृथ्वी पर क्या असर पड़ेगा? आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलेगा?  

चांद दूर जाने पर ज्वार-भाटा पर असर

चांद का सबसे बड़ा असर समुद्र के पानी पर पड़ता है. चांद अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से समुद्र के पानी को खींचता है. इससे समुद्र में ज्वार-भाटा यानी हाई टाइड और लो टाइड आते हैं. जब चांद नजदीक होता है तो यह खिंचाव थोड़ा ज्यादा होता है. ज्वार ऊंचे होते हैं. जब चांद दूर होता है तो खिंचाव कमजोर पड़ जाता है. 

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इस शुक्रवार चांद दूर होने की वजह से ज्वार-भाटा थोड़े कमजोर पड़ेंगे. ऊंचे ज्वार और निचले ज्वार के बीच का फर्क कुछ सेंटीमीटर कम हो सकता है. समुद्र किनारे रहने वाले लोगों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि यह बदलाव बहुत छोटा है. मौसम और हवा का असर इससे कहीं ज्यादा होता है. मछुआरे या नाविकों को भी सामान्य दिन की तरह ही काम करना पड़ेगा.  

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चांद जब दूर होता है तो वह आसमान में थोड़ा छोटा और थोड़ा कम चमकदार दिखता है. अगर उस दिन पूर्णिमा होती तो इसे माइक्रो मून कहा जाता, लेकिन हर एपोजी पर पूर्णिमा नहीं होती. आम आदमी को नंगी आंखों से ज्यादा फर्क महसूस नहीं होगा क्योंकि बदलाव 10-14 प्रतिशत तक का ही होता है. तस्वीर में या टेलिस्कोप से देखने पर थोड़ा सा अंतर साफ दिख सकता है. रातें थोड़ी कम रोशन लगेंगी लेकिन रोशनी इतनी कम नहीं होगी कि अंधेरा छा जाए.

अगर चांद हमेशा के लिए दूर चला जाए तो क्या होगा?

अभी तो चंद्रमा सिर्फ कुछ दिनों के लिए दूर जा रहा है. फिर वापस आ जाएगा. लेकिन सवाल ये भी है कि अगर चांद धीरे-धीरे हमेशा के लिए बहुत दूर चला जाए तो पृथ्वी पर क्या बड़े बदलाव आ सकते हैं. वैज्ञानिक बताते हैं कि चांद हर साल करीब 4 सेंटीमीटर दूर जा रहा है. यह बहुत धीमी प्रक्रिया है. लाखों-करोड़ों साल बाद असर दिखेगा.

ज्वार-भाटा काफी कमजोर हो जाएंगे. इससे समुद्र में पोषक तत्वों का मिलना कम हो सकता है, जिससे मछलियों और समुद्री जीवों पर असर पड़ सकता है. कई जीव चांद की रोशनी और ज्वार के हिसाब से अपना जीवन चक्र चलाते हैं, जैसे कुछ मछलियां अंडे देती हैं या पक्षी रास्ता तय करते हैं. उन पर असर पड़ सकता है.

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चांद पृथ्वी की धुरी को स्थिर रखने में मदद करता है. अगर चांद बहुत दूर चला जाए तो पृथ्वी की धुरी ज्यादा डगमगाने लगेगी. इससे मौसम बदल सकते हैं. कभी बहुत गर्मी, कभी बहुत ठंड पड़ सकती है. मौसम अनियमित हो सकते हैं. दिन की लंबाई भी धीरे-धीरे बढ़ सकती है क्योंकि चांद पृथ्वी के घूमने की गति को धीमा करता है. अभी दिन 24 घंटे का है, दूर जाने पर दिन लंबे हो सकते हैं.

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सूर्य ग्रहण भी कम हो जाएंगे या खत्म हो सकते हैं क्योंकि चांद छोटा दिखने लगेगा और सूरज को पूरी तरह ढक नहीं पाएगा. रातें थोड़ी अंधेरी होंगी. लेकिन ये सब करोड़ों साल बाद की बात है. अभी के लिए कोई चिंता की बात नहीं.

आम आदमी को क्या करना चाहिए?

इस शुक्रवार आसमान साफ हो तो चांद को देखिए. वह थोड़ा छोटा लगेगा लेकिन सुंदर तो लगेगा ही. समुद्र किनारे रहने वालों को सामान्य सावधानी बरतनी चाहिए जैसी हर रोज बरतते हैं. वैज्ञानिक लगातार चांद की दूरी नापते रहते हैं लेजर और सैटेलाइट से. यह घटना पूरी तरह प्राकृतिक और सामान्य है. हर महीने ऐसा होता रहता है.

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चांद हमारी पृथ्वी का साथी है. वह न सिर्फ रात को रोशनी देता है बल्कि ज्वार-भाटा, मौसम और जीवन को प्रभावित करता है. इस बार दूर जा रहा है तो सिर्फ थोड़ा कमजोर खिंचाव और छोटा आकार. बाकी सब सामान्य रहेगा. प्रकृति के इन छोटे-छोटे बदलावों को समझना हमें साइंस से जोड़ता है.  

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