कश्मीर में जलवायु परिवर्तन का असर अब पानी की सप्लाई पर भी दिखने लगा है. पीर पंजाल के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं. सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है और बर्फ पहले के मुकाबले जल्दी पिघल रही है. इसका असर दूध गंगा नदी पर पड़ रहा है, जिससे श्रीनगर के 2 लाख से ज्यादा लोगों को पीने का पानी मिलता है. ऐसे में गर्मियों में पानी की कमी और तेज बारिश के दौरान पानी की सप्लाई रुकने की परेशानी बढ़ रही है.
श्रीनगर के बाग-ए-मेहताब में रहने वाली 28 साल की महक (बदला हुआ नाम) के घर में पानी जमा करने के लिए तीन टंकियां हैं. इसके बाद भी उन्हें रोज के कामों के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता. वहीं, पीर बाग की 60 साल की जमरूद ने बताया कि गर्मियों में कई बार लगातार चार दिन तक नलों में पानी नहीं आता. इससे लोगों को नहाने, कपड़े धोने और दूसरे जरूरी काम करने में परेशानी होती है.
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40 साल में 38 फीसदी सिकुड़े ग्लेशियर
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी साइंस एंड टेक्नोलॉजी में 2024 में छपे एक अध्ययन के मुताबिक, पीर पंजाल के 122 ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 1980 में 25.74 वर्ग किलोमीटर था. 2020 तक यह घटकर 15.91 वर्ग किलोमीटर रह गया. यानी 40 साल में इनके क्षेत्रफल में करीब 38 फीसदी की कमी आई. अध्ययन में यह भी पाया गया कि दक्षिण की ओर वाले ग्लेशियर उत्तर की ओर वाले ग्लेशियरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से सिकुड़े. इससे पता चलता है कि कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में बर्फ की स्थिति तेजी से बदल रही है.
सर्दियों में कम बर्फबारी, जल्दी पिघल रही बर्फ
पृथ्वी वैज्ञानिक और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के कुलपति शकील रोमशू के मुताबिक, कश्मीर के ऊपरी इलाकों में पिछले चार-पांच दशकों में बर्फबारी कम हुई है. सर्दियों में तापमान बढ़ने से बर्फ पहले के मुकाबले जल्दी पिघलने लगी है.
पहले सर्दियों में जमा बर्फ अप्रैल से जुलाई के बीच धीरे-धीरे पिघलती थी. इससे गर्मियों में नदियों को पानी मिलता रहता था. अब बर्फ फरवरी और मार्च में ही तेजी से पिघलने लगती है. इससे गर्मियों में नदियों में पानी कम होने का खतरा बढ़ सकता है.
दूध गंगा से 2 लाख से ज्यादा लोगों को पानी
दूध गंगा नदी को चाज़ कुल भी कहा जाता है. यह पीर पंजाल के ग्लेशियरों के पास करीब 4,500 मीटर की ऊंचाई से निकलती है. करीब 45 किलोमीटर का सफर तय करके यह बडगाम और पुलवामा के इलाकों से होते हुए श्रीनगर पहुंचती है. आगे चलकर यह झेलम नदी में मिल जाती है.
जल शक्ति विभाग के मुताबिक, दूध गंगा का पानी साफ करने वाला संयंत्र हर दिन 45.5 मिलियन लीटर पानी साफ कर सकता है. इससे श्रीनगर के 2 लाख से ज्यादा लोगों को पीने का पानी मिलता है. इनमें बाग-ए-मेहताब, क्रालपोरा, पीर बाग, हैदरपोरा और सनत नगर जैसे इलाके शामिल हैं.
विभाग की अधीक्षण अभियंता अनब्रीना अंजुम के मुताबिक, 2024 में कश्मीर में बारिश सामान्य से करीब 80 फीसदी कम रही थी. इसके कारण दूध गंगा में पानी का बहाव काफी कम हो गया और पानी की सप्लाई में रुकावट आई. पानी कम होने पर विभाग को क्रालपोरा के पंपिंग स्टेशन की मदद लेनी पड़ी.
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तेज बारिश से भी रुक सकती है पानी की सप्लाई
दूध गंगा में सिर्फ पानी की कमी ही समस्या नहीं है. तेज बारिश और बादल फटने के दौरान नदी के पानी में मिट्टी और गाद बढ़ जाती है. इससे पानी साफ करने वाले संयंत्र के फिल्टर जाम हो सकते हैं. फिल्टर को नुकसान से बचाने के लिए विभाग को कुछ समय के लिए संयंत्र बंद करना पड़ सकता है.
इस तरह लंबे समय तक बारिश न होना और अचानक बहुत तेज बारिश होना, दोनों ही पानी की सप्लाई में परेशानी पैदा कर सकते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पानी की समस्या कम करने के लिए नदियों और पानी के दूसरे स्रोतों को बचाना जरूरी है. इसके साथ ही पानी का सही इस्तेमाल और इस्तेमाल किए गए पानी को दोबारा काम में लाने पर भी ध्यान देना होगा.
जल शक्ति विभाग अगले 30 से 40 साल की जरूरतों को ध्यान में रखकर पानी की सप्लाई और बचत के उपायों की योजना बना रहा है. ग्लेशियरों के सिकुड़ने और बर्फबारी में बदलाव से कश्मीर में पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में दूध गंगा जैसे जल स्रोतों को बचाना और पानी की बेहतर व्यवस्था करना जरूरी है.
आजतक साइंस डेस्क