उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मल्लाह समाज सियासी चर्चा के केंद्र में है. आबादी के लिहाज से यह समाज भले ही प्रदेश के सबसे बड़े सामाजिक समूहों में न हो, लेकिन सूबे में यह एक बेहद प्रभावशाली और निर्णायक राजनीतिक ताकत के रूप में उभरा है. पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक में इनकी मौजूदगी सियासी समीकरणों को प्रभावित करती है. इसके चलते बीजेपी से लेकर सपा तक सभी प्रमुख दल इस समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.
ओबीसी के तहत आने वाला मल्लाह-निषाद समुदाय अति-पिछड़ी जाति में आता है. गंगा, यमुना, घाघरा और सरयू जैसी नदियों के किनारे बसे इलाकों में मल्लाह-निषाद समाज की बड़ी संख्या होने के कारण यह वर्ग किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाने की क्षमता रखता है. पिछले एक-डेढ़ दशक में सियासी लामबंदी और निषाद पार्टी जैसी क्षेत्रीय ताकतों के उभार के बाद इस समुदाय की बार्गेनिंग पावर काफी बढ़ी है.
मल्लाह-निषाद समाज अपनी पारंपरिक आजीविका और सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ अब चुनावी राजनीति में अपनी मजबूत हिस्सेदारी तय करने लगा है, जिसके चलते सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए सभी प्रमुख दल इस समाज के वोटों को साधने की कवायद कर रहे हैं. आइए जानते हैं कि यूपी में मल्लाह समाज कितना अहम है और कितना सत्ता में दखल रखता है...
यूपी में मल्लाह समाज की आबादी?
उत्तर प्रदेश में मल्लाह समाज की आबादी 5 से 6 फीसदी के करीब मानी जाती हैच मल्लाह समाज कई उप-जातियों में बंटा हुआ है. ये मल्लाह, केवट, बिंद, बाथम, कश्यप, निषाद, साहनी और मांझी के नाम से जानी जाती हैं नदी-आधारित इन समुदायों को व्यापक समूह के तौर पर जोड़ने पर यह आंकड़ा करीब 9 फीसदी तक पहुंच जाता है.
ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आने वाली निचली उपजातियों और निषाद समूह में धीमर, धीवर, खरवार, खैरवार, गोदिया, गोंड, गरिवा, राजगोंड, मल्लाह, बिंद, मांझी, बाथम, मझवार, झिमर, झीवर, झीर, नोनिया, बिंद, रायकवार, केवट, तुरैहा, कश्यप और कुछ अन्य जातियां शामिल हैं.
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मोटे तौर पर देखें तो निषादों में 150 से ज्यादा उप-जातियां हैं. हालांकि, इन सभी समुदायों की सामाजिक पहचान एक जैसी नहीं है, लेकिन हर उपजाति खुद को निषाद समूह का हिस्सा समझती है. निषादों का दावा है कि वे निषादराज के वंशज हैं, जो एक नाविक थे और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने भगवान राम को उनके वनवास के दौरान गंगा पार करने में मदद की थी. यह समुदाय विशेष रूप से गंगा, यमुना, घाघरा और सरयू नदी के किनारे बसे पूर्वांचल व मध्य यूपी के जिलों में केंद्रित है.
मल्लाह समुदाय का सियासी प्रभाव
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं. निषाद समाज के नेताओं और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुमानों के मुताबिक, करीब 160 सीटों पर इस समुदाय का कुछ न कुछ राजनीतिक प्रभाव है. इनमें करीब 50 से 80 सीटें ऐसी हैं, जहां पर मल्लाह समाज की मौजूदगी बहुत अहम भूमिका निभाती है.
पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के 18 जिलों में इनकी अच्छी-खासी तादाद है. निषाद समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का दावा है कि राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से उनके समाज का 160 सीटों पर ठीक-ठाक प्रभाव है और इन सीटों पर 60 हजार से लेकर एक लाख तक वोट निषाद समाज के हैं.
यूपी के गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीरनगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, प्रयागराज, फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिलों में निषाद वोटरों की संख्या अधिक है. इसके अलावा बांदा और हमीरपुर जैसे इलाकों में भी मल्लाह समाज की मौजूदगी चुनावी समीकरणों में चर्चा का विषय रहती है.
मल्लाह समाज का सत्ता में कितना दखल
मल्लाह समुदाय का प्रभाव केवल उसकी आबादी पर निर्भर नहीं करता. स्थानीय उम्मीदवार, दूसरे पिछड़े वर्गों के साथ सामाजिक समीकरण, पार्टी संगठन और गठबंधन भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं. यूपी की भले ही 50 से ज्यादा सीटों पर मल्लाह जाति की आबादी 60 हजार से ज्यादा हो, लेकिन विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है.
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उत्तर प्रदेश में मल्लाह-निषाद समुदाय के 8 विधायक हैं, जिनमें 6 बीजेपी गठबंधन और 2 सपा से हैं. बीजेपी से पीयूष रंजन निषाद, डॉ. धर्मराज निषाद, जय प्रकाश निषाद, रामकेश निषाद और सरवन निषाद विधायक हैं निषाद पार्टी से डॉ. विनोद कुमार बिंद विधायक बने थे, जो बाद में सांसद चुन लिए गए. सपा से डॉ. मुकेश वर्मा और हाकिम लाल बिंद मल्लाह समुदाय से विधायक हैं, संजय निषाद एमएलसी हैं.
यूपी सरकार में संजय निषाद कैबिनेट मंत्री और बीजेपी कोटे से रामकेश निषाद राज्यमंत्री हैं. यूपी में निषाद समुदाय से तीन लोकसभा सांसद हैं, जिनमें से दो सांसद सपा से तो एक बीजेपी से हैं. सुल्तानपुर के सांसद रामभुआल निषाद और संतकबीरनगर के सांसद लक्ष्मीकांत उर्फ पप्पू निषाद सपा से हैं, तो भदोही से बीजेपी के टिकट पर डॉ. विनोद कुमार बिंद सांसद हैं,
यूपी में निषाद समुदाय के चेहरे
उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय के सबसे बड़े नेता के तौर पर संजय निषाद को जाना जाता है, जिन्होंने निषाद पार्टी भी बना रखी है. यूपी में निषाद राजनीति का प्रमुख चेहरा उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है. बीजेपी नेता साध्वी निरंजन ज्योति मल्लाह समुदाय की बड़ी नेता मानी जाती हैं, जो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्ष हैं, तो विधायक जय प्रकाश निषाद पार्टी के एक बड़े नेता हैं.
सपा के पास भी मल्लाह समुदाय के कई बड़े नेता हैं, जिसमें दिवंगत फूलन देवी की बहन रुक्मणि देवी और डॉ. राजपाल कश्यप, विशंभर प्रसाद निषाद, लौटन राम निषाद, काजल निषाद और रामभुआल निषाद को पार्टी ने आगे किया है. कांग्रेस निषाद चेहरे के तौर पर कुंवर सिंह निषाद को यूपी में आगे बढ़ा रही है. इसके अलावा वीआईपी के प्रमुख मुकेश सहनी भी यूपी में अपना सियासी पैर पसार रहे हैं,
कितना मजबूत है मल्लाह वोटबैंक?
निषाद समाज का राजनीतिक महत्व उसकी कुल आबादी के साथ-साथ अलग-अलग क्षेत्रों में उसके संकेंद्रण से जुड़ा है. समुदाय के नेताओं का दावा रहा है कि कई विधानसभा सीटों पर उनके वोट जीत-हार के अंतर को प्रभावित कर सकते हैं. हालांकि, किसी समुदाय के सभी वोटर्स का एक ही पार्टी को वोट देना तय नहीं है.
यूपी की 150 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर मल्लाह जाति के लोग खुद जीत सकते हैं या फिर किसी को जिता सकते हैं. पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में नदी किनारे के इलाकों में निषाद मतदाताओं की मौजूदगी काफी है. वोटबैंक की ताकत का आकलन केवल आबादी के प्रतिशत या नेताओं के दावों से नहीं किया जा सकता. इसके लिए क्षेत्रवार मतदाता संख्या, पिछले चुनावों के नतीजे और अलग-अलग दलों को मिले वोटों का अध्ययन भी जरूरी है.
मल्लाह समुदाय की एक प्रमुख मांग अब भी अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और आरक्षण से जुड़ी है. निषाद पार्टी लंबे समय से निषाद समुदाय की कुछ उपजातियों को एससी सूची में शामिल करने की मांग उठाती रही है. 2026 में संजय निषाद ने इस मुद्दे पर फिर दबाव बनाया और मांग पूरी न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी.
सियासी चर्चा में निषाद समाज?
2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच बीजेपी, समाजवादी पार्टी और निषाद समाज से जुड़े दूसरे राजनीतिक संगठन अपने-अपने स्तर पर समुदाय तक पहुंच बनाने में जुटे हैं. बीजेपी के लिए यह उसके ओबीसी समर्थन आधार का अहम हिस्सा है, जबकि सपा भी समुदाय से जुड़े नेताओं को संगठन में जगह देकर अपना संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
बिहार के नेता मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) भी निषाद आरक्षण के मुद्दे पर यूपी में सक्रिय है. विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वह निषाद आरक्षण संकल्प यात्रा चला रहे हैं. इससे समुदाय के प्रतिनिधित्व और आरक्षण का सवाल एक बार फिर राजनीतिक बहस में आ गया है. ऐसे में सपा से लेकर बीजेपी तक मल्लाह समुदाय को अपने साथ जोड़कर अपनी सियासी नैया पार लगाना चाहते हैं, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि मल्लाहों की पसंद कौन बनता है.
कुबूल अहमद