हमीरपुर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में हमीरपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है. कानपुर से लगभग 68 किलोमीटर दक्षिण में स्थित यह नगरपालिका नगर यमुना और बेतवा नदियों के संगम से ठीक ऊपर बसा है. दोनों नदियों का संगम इस नगर की भौगोलिक पहचान का प्रमुख हिस्सा रहा है, जबकि कानपुर-हमीरपुर-सागर मार्ग पर इसकी स्थिति ने इसे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक,
वाणिज्यिक और परिवहन केंद्र बनाया है.
1957 के चुनावों से पहले स्थापित हमीरपुर के नाम पर एक सामान्य, अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र है. यह हमीरपुर लोकसभा सीट के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद हमीरपुर विधानसभा क्षेत्र में हमीरपुर तहसील का पूरा क्षेत्र शामिल है, जिसमें हमीरपुर नगर पालिका बोर्ड और मौदहा नगर पालिका बोर्ड के साथ मौदहा तहसील के खन्ना, इचौली, सिसोलर और मौदहा के कानूनगो सर्किल भी शामिल हैं. हालांकि इस विधानसभा क्षेत्र में गांवों की संख्या अधिक है, लेकिन हमीरपुर और मौदहा की मौजूदगी इसे एक महत्वपूर्ण शहरी क्षेत्र भी बनाती है.
हमीरपुर में विधानसभा क्षेत्र के गठन के बाद से अब तक 19 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2014 और 2019 में हुए उपचुनाव भी शामिल हैं. कांग्रेस ने यह सीट छह बार जीती है, जबकि भाजपा ने पांच बार जीत हासिल की है. इनमें 1967 में उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की एक जीत भी शामिल है. बहुजन समाज पार्टी ने तीन बार और समाजवादी पार्टी ने दो बार यह सीट जीती है. जनता पार्टी, एक निर्दलीय उम्मीदवार और जनता दल ने एक-एक बार इस सीट पर कब्जा किया है. हमीरपुर में ऐसे राजनेता भी रहे हैं, जिन्होंने दल बदलकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर चुनाव लड़ा और कई बार मतदाताओं के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखी.
2012 में निरंजन ज्योति, जिन्हें साध्वी निरंजन ज्योति के नाम से भी जाना जाता है, ने भाजपा के टिकट पर यह सीट जीती. उन्होंने बसपा के फतेह मुहम्मद खान को 7,824 वोटों से हराया. 2014 में उनके लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के कारण इस सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा, जिसमें समाजवादी पार्टी के शिवचरण प्रजापति ने जीत हासिल की. प्रजापति पहले बसपा विधायक रह चुके थे और 1996 तथा 2002 में यह सीट जीत चुके थे. उन्होंने भाजपा के जगदीश प्रसाद व्यास को 68,556 वोटों से हराया.
समाजवादी पार्टी की जीत ज्यादा समय तक कायम नहीं रही. 2017 में भाजपा के अशोक कुमार सिंह चंदेल ने समाजवादी पार्टी के तत्कालीन विधायक शिवचरण प्रजापति के बेटे मनोज कुमार प्रजापति को 48,655 वोटों से हराया. मनोज कुमार प्रजापति समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे. चंदेल इससे पहले 1989 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में और 1993 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में यह सीट जीत चुके थे. 2019 में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण उनकी सदस्यता समाप्त हो गई और एक बार फिर उपचुनाव कराना पड़ा. भाजपा ने युवराज सिंह के जरिए यह सीट बरकरार रखी. उन्होंने मनोज कुमार प्रजापति को 17,867 वोटों से हराया.
इसके बाद भाजपा ने मनोज कुमार प्रजापति को पार्टी में शामिल कर लिया और 2022 में उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया. उन्हें 105,432 वोट मिले, जबकि उनके पूर्व समाजवादी पार्टी सहयोगी राम प्रकाश प्रजापति को 79,947 वोट मिले. इस तरह मनोज कुमार प्रजापति ने 25,485 वोटों से जीत हासिल की.
लोकसभा चुनावों के दौरान हमीरपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला देखने को मिला है. 2009 में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस पर 10,857 वोटों की बढ़त बनाई थी. उस चुनाव में चौथे स्थान पर रही भाजपा ने 2014 में समाजवादी पार्टी पर 58,022 वोटों की बढ़त हासिल कर ली. 2019 में यह बढ़त घटकर 37,250 वोट रह गई. 2024 में भी भाजपा की बढ़त में गिरावट का सिलसिला जारी रहा. हमीरपुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अजेंद्र सिंह लोधी को इस विधानसभा क्षेत्र में 126,708 वोट मिले, जबकि भाजपा के कुंवर पुष्पेंद्र सिंह चंदेल को 105,644 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने 21,064 वोटों की बढ़त हासिल की.
पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2012 में 385,473 से बढ़कर 2017 में 397,024 हो गई और 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह 401,148 थी. 2022 में मतदाताओं की संख्या 413,357 और 2024 में 426,389 हो गई. 2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या में काफी कमी आई है. अनुमान है कि 2024 की तुलना में मतदाताओं की संख्या लगभग 46,603 कम हुई है.
इस विधानसभा क्षेत्र में आमतौर पर मतदान प्रतिशत अधिक रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 59.97 रहा, जो 2017 में बढ़कर 63.63 प्रतिशत हो गया. इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 60.52 प्रतिशत रह गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 63.82 हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 60.98 प्रतिशत रह गया.
हमीरपुर हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है. यहां मुस्लिम आबादी का अनुमान लगभग 11 प्रतिशत और अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 20.97 प्रतिशत है. अन्य समुदायों में लोधी, यादव, कुर्मी, कुशवाहा, ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य शामिल हैं. इनके अलावा कई कारीगर और सेवा क्षेत्र से जुड़े समुदाय भी यहां रहते हैं. अनुमान के अनुसार, इस विधानसभा क्षेत्र की लगभग 78.02 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जबकि हमीरपुर और मौदहा मिलकर इसकी अधिकांश शहरी आबादी का हिस्सा हैं, जो कुल आबादी का 21.98 प्रतिशत है.
परंपरा के अनुसार, इस नगर की स्थापना 11वीं शताब्दी में कलचुरी राजपूत शासक हमीर देव ने की थी, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने यहां एक किले का निर्माण कराया था. अकबर के शासनकाल में हमीरपुर का उल्लेख आइन-ए-अकबरी में कालपी सरकार के अंतर्गत एक महल के रूप में मिलता है. 1823 में अंग्रेजों ने उत्तरी बुंदेलखंड के कलेक्टर कार्यालय का मुख्यालय कालपी से हमीरपुर स्थानांतरित कर दिया, जिससे यह नगर एक प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ. मुख्य बाजार सुफीगंज की स्थापना लगभग 1830 में एक ब्रिटिश अधिकारी ने कराई थी.
हमीरपुर के आसपास का ग्रामीण क्षेत्र बुंदेलखंड के पठारी इलाके का हिस्सा है, जहां कृषि स्थानीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है. इस क्षेत्र में गेहूं, चना, दालें और तिलहन की खेती की जाती है. बेतवा नदी की मोटी रेत भी एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक संसाधन रही है, जिसकी आपूर्ति उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में निर्माण कार्यों के लिए की जाती है. हमीरपुर और मौदहा में व्यापार, परिवहन, सरकारी सेवाएं और छोटे व्यवसाय रोजगार के प्रमुख साधन हैं.
हमीरपुर सड़क मार्ग से कानपुर, उरई, बांदा और महोबा से जुड़ा हुआ है. कानपुर लगभग 68 किलोमीटर दूर है, जबकि उरई और महोबा की दूरी करीब 85-85 किलोमीटर और बांदा की दूरी लगभग 95 किलोमीटर है. लखनऊ लगभग 140 किलोमीटर दूर है, जबकि प्रयागराज करीब 180 किलोमीटर और वाराणसी लगभग 300 किलोमीटर दूर है. अयोध्या की दूरी करीब 260 किलोमीटर है. निकटतम रेलवे स्टेशन हमीरपुर रोड है, जो नगर से लगभग 10 से 12 किलोमीटर दूर है. भरुआ सुमेरपुर रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है.
2009 के बाद हुए नौ प्रमुख चुनावों में भाजपा ने चार विधानसभा चुनाव जीते हैं और दो लोकसभा चुनावों में इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त हासिल की है. इसके मुकाबले समाजवादी पार्टी ने एक विधानसभा चुनाव जीता है और दो लोकसभा चुनावों में बढ़त बनाई है. यदि 2024 में समाजवादी पार्टी ने 8.10 प्रतिशत अंकों की बढ़त हासिल नहीं की होती, तो भाजपा हमीरपुर में अपनी संभावनाओं को लेकर अधिक आश्वस्त हो सकती थी. 2027 में विधानसभा सीट बरकरार रखने के लिए भाजपा को इस अंतर को कम करने का रास्ता तलाशना होगा. समाजवादी पार्टी के सामने विपक्षी वोटों के बंटवारे को रोकने और लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त को विधानसभा चुनाव की जीत में बदलने की चुनौती होगी. बसपा भी इस मुकाबले में एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है, जबकि विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाताओं की संख्या में आई कमी ने चुनावी मुकाबले में एक नया पहलू जोड़ दिया है.
(अजय झा)