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कृष‍ि मंत्रालय की र‍िपोर्ट ने खोली पोल, इथेनॉल से क‍िसानों को फायदा या घाटा

भारतीय कृषि नीति में इथेनॉल को एक गेम-चेंजर के रूप में पेश किया गया था. दावा था कि इससे फसलों की मांग बढ़ेगी और किसानों की आमदनी दोगुनी होगी. हालांकि, कृषि मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट और मंडियों के आंकड़े एक बिल्कुल अलग और चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं.

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नुकसान में क्यों हैं किसान (Photo-ITG)
नुकसान में क्यों हैं किसान (Photo-ITG)

देश के राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में इन दिनों इथेनॉल को लेकर हर तरफ चर्चा है. नीतिगत कमरों में बैठे अर्थशास्त्रियों से लेकर सरकार समर्थित किसान संगठनों तक, सभी एक ही सुर में दावा कर रहे हैं कि देश का किसान अब केवल पेट भरने वाला 'अन्नदाता' नहीं, बल्कि गाड़ियों में ईंधन भरने वाला 'ऊर्जादाता' बन चुका है. प्रचार यह है कि इथेनॉल नीति ने किसानों की तकदीर बदल दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सच है? या फिर 'ऊर्जादाता' के इस आकर्षक आवरण के पीछे खेत में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले किसान की कड़वी सच्चाई को ढका जा रहा है? क्या इथेनॉल की यह नीति वाकई किसान की आय बढ़ाने के लिए है, या फिर यह किसानों के नाम पर चीनी मिलों और कॉर्पोरेट कंपनियों के मुनाफे को चमकाने का नया जरिया है?

इन सवालों की हकीकत किसी राजनीतिक बयानबाजी में नहीं, बल्कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय की फाइलों में दर्ज है. मंत्रालय की अपनी रिपोर्ट और 'एगमार्कनेट' के आंकड़े इस तथाकथित 'इथेनॉल क्रांति' के दावों की पोल खोलते हैं. आइए, इस पूरी 'इथेनॉल इकोनॉमी' का सिलसिलेवार विश्लेषण करें और समझें कि धरातल पर किसान के नाम पर असल में क्या चल रहा है. 

मक्का को म‍िले धोखे की कहानी 

इथेनॉल नीति का सबसे बड़ा ढिंढोरा मक्के की फसल को लेकर पीटा गया था. किसानों को ये कहा कि मक्के की खूब पैदावार करो, मुंहमांगा दाम मिलेगा क्योंकि देश को इथेनॉल की जरूरत है. किसानों ने भी सरकार पर भरोसा जताते हुए मक्के का बंपर उत्पादन कर डाला. लेकिन बदले में बाजार से उन्हें क्या मिला.

इथेनॉल नीति का सबसे बड़ा ढिंढोरा मक्के की फसल को लेकर पीटा गया

कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2025 से अगस्त 2026 तक 18 महीनों में एक भी महीना ऐसा नहीं रहा, जब मंडियों में मक्के का औसत भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की रेखा को छू पाया हो. एमएसपी से कम दाम म‍िलने का मतलब है फसलों को घाटे के दाम पर बेचना.

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इथेनॉल पर सवाल

मक्के की खेती करने वाले किसान लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से वंचित रहकर भारी नुकसान उठाने को मजबूर हैं. मार्च 2025 में जब मक्के का MSP ₹2,225 प्रति क्विंटल था, तब मंडियों में किसानों को औसतन ₹2,176.61 का भाव ही मिल सका था. स्थिति तब और चिंताजनक हो गई जब नवंबर 2025 में कृषि नीति की बड़ी विफलता सामने आई. इस दौरान MSP बढ़कर ₹2,400 प्रति क्विंटल तो हुआ, लेकिन मंडियों में मक्के के दाम गिरकर महज ₹1,634.74 प्रति क्विंटल रह गए, जिससे किसानों को प्रति क्विंटल सीधे ₹765 की चपत लगी. मक्का किसानों की यह बदहाली आज अगस्त 2026 में भी बदस्तूर जारी है, जहां मंडियों में मक्का ₹2,008.69 प्रति क्विंटल के आसपास बिक रहा है, जो तय सरकारी दाम से करीब ₹391 कम है.

इथेनॉल पर सवाल 

देश में इथेनॉल की भारी मांग के बावजूद बीते डेढ़ साल से मंडियों में मक्के के भाव लगातार गिरे हुए हैं, जिसका सीधा कारण सरकार की नीतियां हैं. दरअसल, इथेनॉल निर्माताओं की उत्पादन लागत घटाने के लिए सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों से महज ₹23.20 प्रति किलो के बेहद रियायती दर पर कंपनियों को चावल दे दिया जो कि किसानों से खरीदे गए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (₹24.41 प्रति किलो) से भी कम था. जब डिस्टिलरीज़ को बैठे-बिठाए सरकार से इतना सस्ता चावल मिलने लगा, तो उन्होंने मंडियों से किसानों का मक्का खरीदना ही बंद कर दिया. ऊपर से उद्योगपतियों के दबाव में मक्के के आयात में भी छूट दे दी गई. इस पूरी साठगांठ का नतीजा यह निकला कि इथेनॉल कंपनियों की कमाई तो सुरक्षित रही, लेकिन मक्का किसान मंडियों में व्यापारियों के हाथों औने-पौने दामों पर लुटने को मजबूर हो गया.

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गन्ना क‍िसानों को इंतजार 

मक्के के अलावा देश का गन्ना किसान भी इथेनॉल क्रांति का एक ऐसा शिकार है, जिसे उसके वाजिब हक से दूर रखा जा रहा है.  एक तरफ चीनी मिलें गन्ने के रस और 'बी-हैवी मोलासेस' (शीरे) से बड़े पैमाने पर इथेनॉल बनाकर तेल कंपनियों को बेच रही हैं और मोटा मुनाफा कमा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ इस बड़ी कमाई में किसान का हिस्सा शून्य है.  गन्ने का मूल्य तय करने के मौजूदा सरकारी फॉर्मूले में इथेनॉल से होने वाले मुनाफे को शामिल ही नहीं किया गया है. आज भी कीमत तय करने का एकमात्र पैमाना पुराना 'शुगर रिकवरी' (चीनी की मात्रा) ही बना हुआ है. मिलें गन्ने से चीनी बनाएं या सीधे इथेनॉल, किसान को भुगतान केवल गन्ने के वजन और शुगर रिकवरी के पारंपरिक आधार पर ही मिलता है. यही वजह है कि गन्ना किसान अब सरकार और मिल मालिकों से 'इथेनॉल प्रीमियम' या अतिरिक्त बोनस की मांग कर रहे हैं, ताकि उनकी फसल से कमाए जा रहे अतिरिक्त मुनाफे में उन्हें भी बराबरी का हिस्सेदार बनाया जा सके.

गन्ना किसान प्रति लीटर इथेनॉल पर अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी मांग नहीं सुन रही है, उनका तर्क है कि इथेनॉल की वजह से मिलों के पास कैश आता है, जिससे किसानों का भुगतान जल्दी हो जाता है. अब सवाल यह है कि समय पर भुगतान पाना किसान का कानूनी अधिकार है या कोई एहसान. आखिर मुनाफे का पैसा  मिल मालिकों की जेब में क्यों जा रहा है,  क‍िसानों को उनका ह‍िस्सा कब म‍िलेगा? 

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तथाकथित किसान नेताओं से सीधे सवाल

इस पूरी नीतिगत व्यवस्था में सबसे हैरान करने वाला रुख उन 'जेबी' किसान नेताओं और उनके संगठनों का है, जो इथेनॉल नीति को किसानों की किस्मत बदलने वाला 'मास्टरस्ट्रोक' बताकर प्रचारित कर रहे हैं. किसी भी सरकारी नीति के पक्ष या विपक्ष में खड़े होना हर संगठन का अधिकार है, लेकिन इन नेताओं से कुछ बुनियादी सवाल पूछे जाने ज़रूरी हैं. 

क्या किसानों के इन स्वयंभू हमदर्दों की नजर कृषि मंत्रालय के उन आधिकारिक आंकड़ों पर नहीं पड़ती, जो साफ दिखाते हैं कि मक्का किसान पिछले डेढ़ साल से लगातार नुकसान झेल रहा है? अगर इथेनॉल नीति वाकई कोई ऐतिहासिक क्रांति थी, तो नवंबर 2025 में किसानों का मक्का महज ₹1,634 प्रति क्विंटल के भाव पर क्यों बिका? मंडियों में हुई इस खुली लूट पर इन नेताओं की आवाज़ क्यों बंद रही,इन्होंने न तो कोई आंदोलन छेड़ा और न ही सरकार को कोई चेतावनी भरा पत्र लिखा?

किसानों को क्यों नहीं मिलती दाम की गारंटी?

इथेनॉल बनाने वाली डिस्टिलरीज को तेल कंपनियों से 'प्राइस प्रोटेक्शन' यानी तय और गारंटीकृत मुनाफे का लिखित सुरक्षा-कवच मिला हुआ है. सरकार ने उनकी कीमतें इस तरह तय कर रखी हैं ताकि ये कंपनियां किसी भी हालत में घाटे में न रहें. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन कंपनियों को कच्चा माल सप्लाई करने वाले किसान की फसल के लिए किसी कानूनी गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है? उद्योगपतियों के मुनाफे को सुरक्षित करने और किसान को राम भरोसे छोड़ने वाला यह दोहरा मापदंड आखिर क्यों अपनाया जा रहा है?

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इथेनॉल मोहताज नहीं एमएसपी 

फसलों के दाम और एमएसपी तो इथेनॉल आने से पहले भी हर साल बढ़ रहे थे और आज भी बढ़ रहे हैं. धान, मक्का या गन्ना किसी भी फसल पर आज किसानों को इथेनॉल के नाम पर एमएसपी के ऊपर एक रुपये भी एक्स्ट्रा या बोनस नहीं मिल रहा है. जब देश में फसलों की खरीद और दाम में बढ़ोतरी पहले भी हो रही थी और यह इथेनॉल की मोहताज नहीं है, तो फिर इस सामान्य प्रक्रिया का श्रेय इथेनॉल को क्यों दिया जा रहा है?

मुनाफे में हिस्सेदारी से कब? 

अगर यह नीति वाकई किसान-केंद्रित है, तो सरकार 'प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल' यानी मुनाफे में हिस्सेदारी क्यों नहीं लागू करती? डिस्टिलरीज को तेल कंपन‍ियों से मिलने वाले प्रति लीटर इथेनॉल के दाम का एक निश्चित हिस्सा सीधे फसल उगाने वाले किसान के खाते में क्यों नहीं भेजा जाता? अब तक ऐसा कोई इंतजाम नहीं हुआ है, फ‍िर कैसे इथेनॉल को क‍िसानों के ल‍िए क्रांत‍िकारी बताया जा रहा है. 

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से एक बात साफ हो जाती है कि भारत की इथेनॉल नीति पूरी तरह से उद्योग-केंद्रित है. इथेनॉल से म‍िलने वाले लाभ में क‍िसानों की कोई हिस्सेदारी नहीं है. सरकार ने ऐसा चक्रव्यूह रचा है जिसमें रिस्क पूरी तरह से किसान का है और रिटर्न पूरी तरह से इथेनॉल कंपनियों का. किसान ने मक्का का उत्पादन बढ़ाकर अपना फर्ज पूरा किया, लेकिन नीतिगत खामियों, सस्ते चावल की डंपिंग और मक्के के आयात जैसे फैसले ने उसकी कमर तोड़ दी.

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जब तक सरकार मंडियों में मक्के की पूरी फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने की कानूनी गारंटी नहीं देती और गन्ने के दाम तय करने में इथेनॉल से होने वाली कमाई का हिस्सा किसानों को 'बोनस' के रूप में नहीं सौंपती, तब तक 'अन्नदाता से ऊर्जादाता' का यह बहुचर्चित नारा महज़ इथेनॉल कंपनियों के प्रचार का एक ज़रिया बना रहेगा. ज़मीनी हकीकत आज भी यही है कि देश का मक्का किसान अपनी उपज का जायज़ मोल पाने के लिए मंडियों में भटकने को मजबूर है.

किसानों को क्यों नहीं मिल रहा फायदा

सरकार के E20 ब्लेंडिंग प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य इथेनॉल उत्पादन के जरिए मक्के की मांग बढ़ाना, ईंधन का आयात घटाना और किसानों की आमदनी में इजाफा करना था, लेकिन इस नीति का लाभ सभी मक्का किसानों तक समान रूप से नहीं पहुंच सका है. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जहां इथेनॉल प्लांटों के पास स्थित किसानों को इस मांग का फायदा मिल रहा है, वहीं बाजार तक पहुंच की कमी और कमजोर सरकारी खरीद के कारण देश के कई इलाकों में किसान आज भी अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं. संक्षेप में कहें तो, इथेनॉल नीति ने मक्के की मांग तो पैदा की है, लेकिन असमान बाजार व्यवस्था और सुस्त खरीद तंत्र के चलते इसका आर्थिक लाभ हर किसान तक पहुंचने में पूरी तरह नाकाम रहा है.

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