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आपकी थाली में कितना कीटनाशक, 70 हजार सैंपल की जांच में सामने आया आंकड़ा

रिपोर्ट में गर्भवती महिलाओं के रसायनों के संपर्क में आने को लेकर भी चिंता जताई गई है. इसमें यह संभावना भी उठाई गई है कि ऐसे रसायन गर्भ में पल रहे बच्चों को प्रभावित कर सकते हैं और उनके विकास पर असर डाल सकते हैं.

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2,223 खाद्य नमूनों में कीटनाशक सुरक्षा सीमा से ऊपर (Photo-PTI)
2,223 खाद्य नमूनों में कीटनाशक सुरक्षा सीमा से ऊपर (Photo-PTI)

कृषि मंत्रालय के निगरानी कार्यक्रम (MPRNL) के तहत 2023 से 2026 के बीच 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बाजारों से 70,652 खाद्य सैंपल की जांच की गई. इस जांच में 2,223 सैंपल ऐसे मिले, जिनमें कीटनाशक अवशेष खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (FSSAI) की तय सुरक्षित सीमा से अधिक पाए गए.

ये सैंपल कृषि मंत्रालय के नेशनल पेस्टिसाइड रेजिड्यू मॉनिटरिंग (MPRNL) कार्यक्रम के तहत अलग-अलग बाजारों से लिए गए थे, इस अवधि में सब्जियों, फलों, मसालों, अनाज, दालों, जड़ी-बूटियों, चाय, दूध और अंडों समेत कुल 70,652 सैंपल की जांच की गई. 

ये सैंपल कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, असम, झारखंड, दिल्ली और छत्तीसगढ़ समेत 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लिए गए.

कर्नाटक में सबसे ज्यादा मामले

जिन राज्यों का डेटा सामने आया है, उनमें कर्नाटक में तय FSSAI सीमा से ज्यादा कीटनाशक अवशेष वाले सैंपल सबसे अधिक पाए गए. कर्नाटक में कुल 9,176 सैंपल की जांच की गई, जिनमें से 334 सैंपल में कीटनाशक का स्तर निर्धारित सीमा से ज्यादा था. इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर रहा. वहां 5,295 सैंपल में से 260 में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक अवशेष मिले. गुजरात में 6,035 सैंपल में से 170 और हरियाणा में 2,371 सैंपल में से 152 सैंपल में यह समस्या सामने आई.

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तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक अवशेष की मौजूदगी खाद्य सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय है, क्योंकि भोजन के जरिए उपभोक्ता इन रसायनों के संपर्क में आ सकते हैं, रिपोर्ट में ऑर्गेनोफॉस्फेट्स और हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायनों यानी एंडोक्राइन-डिसरप्टिंग केमिकल्स को लेकर भी चिंता जताई गई है. इनके संपर्क को कैंसर, ट्यूमर, हार्मोनल गड़बड़ी और विकास संबंधी समस्याओं जैसी चिंताओं से जोड़ा गया है.

कीटनाशकों के राष्ट्रीय औसत का आंकड़ा क्यों मायने रखता है?

रिपोर्ट में इस तर्क की भी पड़ताल की गई है कि भारत में प्रति हेक्टेयर कीटनाशकों का इस्तेमाल कई दूसरे देशों की तुलना में कम है. रिपोर्ट का कहना है कि राष्ट्रीय औसत अलग-अलग क्षेत्रों और फसलों में कीटनाशकों के इस्तेमाल के बड़े अंतर को छिपा सकता है. देश के बड़े कृषि क्षेत्रों में अगर कीटनाशकों का इस्तेमाल कम है तो इससे राष्ट्रीय औसत नीचे आ जाता है. वहीं, सीधे खाने के लिए इस्तेमाल होने वाली फल और सब्जियों जैसी फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल काफी अधिक हो सकता है.

इसलिए सिर्फ राष्ट्रीय औसत को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि भारतीय उपभोक्ताओं का कीटनाशकों से संपर्क कम है, पूरी तस्वीर नहीं बताता.

विदेशों में बैन कीटनाशकों को लेकर भी सवाल

रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है, भारत में ऐसे कीटनाशकों की उपलब्धता, जिन पर कुछ दूसरे देशों में प्रतिबंध लगाया जा चुका है, रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि जिन रसायनों को अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे देशों में मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों के कारण प्रतिबंधित किया गया है, उनका भारत में निर्माण और बिक्री अब भी क्यों जारी है.

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रिपोर्ट में कृषि-रसायन बनाने वाली कंपनियों और नियामक व्यवस्था की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं. यह मुद्दा भी उठाया गया है कि आखिर यह तय करने में किन लोगों और संस्थाओं की भूमिका होती है कि कौन से रसायन भारत में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहें.

जांच की सुविधाओं की कमी भी चिंता

रिपोर्ट में स्थानीय स्तर पर कीटनाशक जांच की सुविधाओं की सीमित उपलब्धता पर भी सवाल उठाया गया है. इसमें कहा गया है कि फिलहाल उपभोक्ताओं के पास अपने स्तर पर खाद्य पदार्थों की जांच कराने के विकल्प सीमित हैं. इसलिए टेस्टिंग लैब का नेटवर्क बढ़ाने की जरूरत है. रिपोर्ट के मुताबिक, मंडियों और स्थानीय स्तर पर उपभोक्ताओं के नजदीक जांच सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि दूषित खाद्य पदार्थों की पहचान घरों तक पहुंचने से पहले की जा सके.

रिपोर्ट ने सुझाए तीन बड़े उपाय

रिपोर्ट में खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेष की समस्या से निपटने के लिए तीन प्रमुख उपाय सुझाए गए हैं. पहला, बड़ी कृषि मंडियों, जिलों और ब्लॉक स्तर पर खाद्य पदार्थों की जांच अनिवार्य की जाए. इसके लिए सरकारी प्रयोगशालाओं का ऐसा नेटवर्क तैयार किया जाए, जो रैंडम टेस्ट कर सके. जिन खाद्य पदार्थों में कीटनाशक अवशेष तय सीमा से ज्यादा पाए जाएं, उनकी खेप जब्त कर नष्ट करने की भी सिफारिश की गई है.

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दूसरा, जिन कीटनाशकों पर दूसरे देशों में मानव स्वास्थ्य को लेकर प्रतिबंध लगाया गया है, उन्हें भारत में भी प्रतिबंधित किया जाए, तीसरा, FSSAI और कीटनाशक नियामक व्यवस्था जैसे संस्थानों में स्वतंत्र वैज्ञानिकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़ाई जाए. रिपोर्ट का सुझाव है कि ऐसे विशेषज्ञों के कीटनाशक कंपनियों के साथ वित्तीय संबंध नहीं होने चाहिए.

बड़ा सवाल: खाने की सुरक्षा कितनी पुख्ता?

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत में खेती के दौरान औसतन कितना कीटनाशक इस्तेमाल किया जाता है. बड़ा सवाल यह है कि उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाले भोजन में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक अवशेष कितनी बार मिल रहे हैं और ऐसे मामलों की पहचान और कार्रवाई के लिए मौजूदा जांच और नियामक व्यवस्था कितनी प्रभावी है.

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