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जंग पर ट्रंप की NO और नेतन्याहू की YES... दोनों की मजबूरी एक, फिर सोच अलग क्यों?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच ईरान युद्ध को लेकर मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं. ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं जबकि नेतन्याहू हिज्बुल्लाह के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए हैं. इसके पीछे दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं.

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ट्रंप और नेतन्याहू की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं. (Photo- ITGD)
ट्रंप और नेतन्याहू की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं. (Photo- ITGD)

जो जंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मिलकर शुरू की थी, अब उसे लेकर दोनों नेताओं की राहें अलग होती दिख रही हैं. ट्रंप और नेतन्याहू अब ईरान युद्ध से अलग-अलग चीजें चाहते हैं.

ट्रंप ने इजरायल को चेतावनी दी थी कि वो ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह लड़ाकों के खिलाफ जारी युद्ध में बेरूत पर हमला न करे. लेकिन इजरायल ने रविवार को ट्रंप की इस चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए बेरूत पर बमबारी कर दी. 

इसके जवाब में ईरान ने अप्रैल में हुए सीजफायर (युद्धविराम) के बाद पहली बार इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं. ईरान के इस पलटवार के बाद इजरायल ने भी ईरान पर जवाबी हमला कर दिया. 

अपनी मर्जी करने के मूड में नेतन्याहू

इजरायल का ये कदम ट्रंप के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वो पिछले कई हफ्तों से ईरान के साथ बातचीत कर रहे थे. ट्रंप के मना करने के बावजूद इजरायल ने हमले कर दिए, जिससे साफ है कि नेतन्याहू अपनी मनमर्जी करने के मूड में हैं.

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ट्रंप और नेतन्याहू की अपनी-अपनी मजबूरियां

ट्रंप और नेतन्याहू के बीच इस टकराव की मुख्य वजह उनके अपने-अपने देशों के राजनीतिक समीकरण हैं. ट्रंप इस समय भारी राजनीतिक दबाव में हैं. अमेरिका में इसी साल चुनाव होने वाले हैं और ट्रंप की पार्टी इसका सामना कर रही है. ऐसे में ट्रंप इस युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते हैं. 

इसके अलावा, ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खुलवाना चाहते हैं, ताकि दुनिया भर में गैस और ईंधन की कीमतों को कम किया जा सके. दूसरी तरफ, ईरान का साफ कहना है कि किसी भी समझौते के लिए लेबनान में पूरी तरह से युद्धविराम होना सबसे जरूरी शर्त है.

नेतन्याहू के सामने आन बचाने की चुनौती

नेतन्याहू की मजबूरियां ट्रंप से बिल्कुल अलग हैं. नेतन्याहू को भी इसी साल अपने देश में चुनावों का सामना करना है. उन पर हिज्बुल्लाह के हमलों को पूरी तरह रोकने और जनता के सामने ये साबित करने का भारी दबाव है कि वो ईरान और उसके सहयोगियों के खिलाफ इस युद्ध को जीत रहे हैं. 

यह भी पढ़ें: 'पागल हो चुके हो, मैं न होता तो तुम जेल में होते...' ट्रंप ने नेतन्याहू को सुनाई खूब खरी-खरी

इसके साथ ही, नेतन्याहू के सामने चुनौती ये भी है कि वो इजरायल के सबसे बड़े मददगार और सहयोगी देश (अमेरिका) के साथ अपने रिश्ते भी बचाए रखें और देश की जनता के सामने अमेरिका के आगे झुकते हुए भी नजर न आएं. इन अलग-अलग राजनीतिक मजबूरियों के कारण दोनों नेता अब एक-दूसरे से उलट दिशाओं में आगे बढ़ रहे हैं.

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