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कैश फॉर क्लोजनेस... सिंगापुर की इस अनोखी स्कीम से भारत के महानगर क्या सबक ले सकते हैं?

कामकाज के लिए युवाओं के माइग्रेशन और शहरों में छोटे होते परिवारों ने बुजुर्ग लोगों के सामने अकेलेपन की अजीब सी समस्या खड़ी कर दी है. लोगों के पास परिवार तो हैं लेकिन साथ रहना मुश्किल होता जा रहा है. कहीं महंगाई की मार में लोग बड़े घर ले पाने में खुद को सक्षम नहीं पा रहे तो कहीं रोजी-रोटी लोगों को परिवार से दूर किए हुए है.

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सिंगापुर की सरकार घर खरीदने के लिए सीधे कैश में मदद देती है. (Photo-ITG)
सिंगापुर की सरकार घर खरीदने के लिए सीधे कैश में मदद देती है. (Photo-ITG)

शाम के सात बज रहे हैं. मुंबई के लोअर परेल के एक कंक्रीट टावर की 22वीं मंजिल पर 32 साल की नेहा अपनी दो साल की बेटी को संभालने और ऑफिस की बची हुई फाइलों को समेटने के बीच जूझ रही है. ठीक उसी वक्त, मुंबई के ही दूसरे छोर यानी ठाणे के एक फ्लैट में उसके 65 वर्षीय माता-पिता अकेले चाय पी रहे हैं. नेहा चाहती है कि उसके माता-पिता उसके साथ या पास रहें, ताकि वे नाती-पोतों के साथ वक्त बिता सकें और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की ढाल बन सकें. लेकिन मुंबई के प्रॉपर्टी बाजार के आसमान छूते दाम और भारी-भरकम स्टैंप ड्यूटी ने इस फासले को एक मजबूरी बना दिया है.

यह सिर्फ नेहा की कहानी नहीं है, बल्कि दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और मुंबई जैसे भारत के तमाम महानगरों में रहने वाले लाखों वर्किंग कपल्स की यही कड़वी हकीकत है. शहरीकरण की तेज रफ्तार ने हमारे पारंपरिक संयुक्त परिवारों को तोड़कर न्यूक्लियर फैमिली में बदल दिया है.

इस टूटते सामाजिक ताने-बाने को संभालने का क्या कोई उपाय है? हां है, दुनिया के कई मुल्क इस दिशा में नए तरह के प्रयोग कर रहे हैं. इसी तरह का एक प्रयोग है सिंगापुर का. वहां की सरकार ने एक ऐसी नीति बनाई जो जमीन की महंगी कीमतों के बीच बिखरते रिश्तों को दोबारा एक सुरक्षित छत दे रही है. इस जादुई फॉर्मूले का नाम है- प्रॉक्सिमिटी हाउसिंग ग्रांट जिसे 'कैश फॉर क्लोजनेस' स्कीम भी कहा जाता है.

सिंगापुर के हाउसिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड ने साल 2015 में ये स्कीम शुरू की थी. यह उन लोगों को सीधे कैश में मदद देती है जो घर खरीदते समय अपने परिवार के करीब रहने का फैसला करते हैं. इसमें कई तरह के नियम हैं. यदि कोई शादीशुदा जोड़ा अपने माता-पिता के साथ मिलकर रहने के लिए रीसेल वाला फ्लैट खरीदता है, तो सरकार उन्हें सीधे 30,000 सिंगापुर डॉलर यानी भारतीय रुपये में 21 लाख तक की कैश सब्सिडी देती है.

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अगर वे एक ही घर में नहीं रहना चाहते, लेकिन माता-पिता या बच्चों के घर के 4 किलोमीटर के दायरे में फ्लैट खरीदते हैं, तो भी सरकार उन्हें 20,000 सिंगापुर डॉलर यानी भारतीय रुपये में करीब 15 लाख का अनुदान देती है. इस स्कीम में सिंगल्स के लिए भी प्रावधान है. सिंगापुर सरकार ने 35 वर्ष से अधिक उम्र के सिंगल नागरिकों को भी इसमें शामिल किया है. अगर वे अपने माता-पिता के साथ या उनके 4 किलोमीटर के दायरे में घर लेते हैं, तो उन्हें 10,000 से 15,000 सिंगापुर डॉलर तक की मदद मिलती है.

सबसे खास बात यह है कि इस ग्रांट के लिए कोई इनकम कैप यानी आय सीमा नहीं है. आप अमीर हों या मध्यमवर्गीय, अगर आप परिवार के पास रह रहे हैं, तो आप इस वित्तीय मदद के हकदार हैं. इस योजना की शुरुआत से लेकर अब तक हजारों परिवारों ने इसका सीधा लाभ उठाया है. एचबीडी के आंकड़ों के अनुसार उन्होंने तमाम शहरों में 12 लाख से ऊपर फ्लैट बनाकर दिए हैं ताकि लोग सस्ते में घर ले सकें.

लेकिन, अगर इस सवाल पर गौर किया जाए कि लोगों की जिंदगी पर इसका क्या असर हुआ तो कई फैक्ट सामने आते हैं. चूंकि, सिंगापुर सरकार ने यह कदम सिर्फ एक हाउसिंग पॉलिसी के रूप में नहीं बल्कि एक बड़े सोशल इंजीनियरिंग टूल के रूप में उठाया था. इससे लोगों की लाइफस्टाइल पर तीन बड़े सकारात्मक बदलाव देखने को मिले-

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1. बुजुर्गों के अकेलेपन का अंत: बुजुर्ग होती आबादी और उनका अकेलापन आज दुनिया के अमीर देशों की सबसे बड़ी समस्या है. इस स्कीम की बदौलत अब बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों से दूर किसी ओल्ड-एज होम या सुनसान फ्लैट में रहने को मजबूर नहीं हैं. वे हर दिन अपने नाती-पोतों को अपनी आंखों के सामने बढ़ता देख रहे हैं, जिससे उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है.

2. वर्किंग कपल्स के लिए वरदान: सिंगापुर जैसे महंगे और व्यस्त शहर में पति-पत्नी दोनों का काम करना आम बात है. ऐसे में बच्चों की परवरिश एक बड़ा सिरदर्द बन जाती है. जब दादा-दादी या नाना-नानी सिर्फ चंद मिनटों की दूरी पर होते हैं, तो बच्चों को क्रेच  में छोड़ने का भारी-भरकम खर्च बच जाता है. बच्चों को मेड के भरोसे छोड़ने के बजाय परिवार के साथ उनके संस्कार और सुरक्षा भी मिलती है.

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3. सामाजिक सुरक्षा का वित्तीय बोझ कम: सिंगापुर सरकार की दूरगामी सोच यह है कि जब परिवार एक-दूसरे की देखभाल खुद करते हैं, तो सरकार पर ओल्ड-एज होम, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और सीनियर सिटीजन वेलफेयर स्कीम्स का वित्तीय बोझ कम हो जाता है. नागरिकों को नकद सब्सिडी देना, भविष्य में बनने वाले सरकारी अस्पतालों और केयर-होम्स के खर्च से कहीं ज्यादा प्रभावी और सस्ता सौदा है.

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भारत के महानगरों के लिए क्या सबक हैं?
अक्सर यह माना जाता है कि आर्थिक तरक्की के साथ संयुक्त परिवार टूट ही जाते हैं. लेकिन सिंगापुर ने साबित कर दिया कि अगर सरकारें सही और संवेदनशील नीतियां बनाएं, तो आधुनिकता के बीच भी पारिवारिक मूल्यों को बचाया जा सकता है. भारत के लिए इसमें बहुत बड़े सबक छिपे हैं-

भारत के महानगरों में रहने वाली 30 से 45 साल की पीढ़ी आज 'सैंडविच जनरेशन' बन चुकी है. ये वो लोग हैं जो अपने छोटे बच्चों की परवरिश और दूर रह रहे बूढ़े माता-पिता की सेहत की चिंता के बीच पीस रहे हैं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत के टॉप-7 शहरों में घरों की कीमतें पिछले कुछ सालों में 20-30% तक बढ़ी हैं. ऐसे में एक युवा पेशेवर के लिए अपने माता-पिता के पास दूसरा घर लेना आर्थिक रूप से असंभव हो जाता है.

- भारत सरकार PMAY जैसी बड़ी हाउसिंग स्कीम्स चलाती है लेकिन यह मुख्य रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सिर पर छत देने पर केंद्रित है. यदि भविष्य की शहरी नीतियों में फैमिली की क्लोजनेस को शामिल किया जाए तो उसके क्रांतिकारी परिणाम सामने आ सकते हैं. यदि कोई व्यक्ति अपने बुजुर्ग माता-पिता के 3 या 5 किलोमीटर के दायरे में घर खरीदता है, तो उसे स्टैंप ड्यूटी में 2-3% की छूट दी जाए. ऐसे मामलों में होम लोन के ब्याज दर पर भी अतिरिक्त सब्सिडी दी जा सकती है. कुछ जगहों पर पहले इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जा सकता है और अच्छे नतीजे आने पर बाकी शहरों में लागू किया जा सकता है.

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इससे न केवल लोगों को फायदा होगा बल्कि रियल एस्टेट जैसे सेक्टर्स को भी नया बूस्ट मिलेगा. फिर डेवलपर्स भी ऐसी हाउसिंग सोसाइटीज डिजाइन कर सकेंगे जहां वरिष्ठ नागरिकों और युवा परिवारों की जरूरतों को एक साथ पूरा किया जा सके. क्योंकि सच्चा विकास वह नहीं है जो इंसानों को तरक्की की दौड़ में अकेला कर दे. असली स्मार्ट सिटी वह है जहां तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ परिवार भी पास रहें.

 

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