कल्पना कीजिए आप किसी ऐसे शहर के बाजार में निकलते हैं और आप जिस दुकान पर रुकते हैं, वहां एक जैसी शक्ल, एक जैसी मुस्कान और एक जैसी कद-काठी के दो दुकानदार आपका स्वागत करते हैं. आप थोड़ा चौंकते हैं और आगे बढ़ते हैं, तो स्कूल यूनिफॉर्म पहने दो एक जैसी बच्चियां एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलती हुई दिखाई देती हैं. थोड़ा और आगे जाने पर सड़क पर टहल रहे या खेलते हुए दो हमशक्ल युवक आपका ध्यान खींचते हैं. कुछ पलों के लिए आपको लगेगा कि शायद आपकी आंखों में कोई खराबी आ गई है या फिर आप किसी साइंस-फिक्शन फिल्म के मैट्रिक्स में फंस गए हैं, जहां एक ही दृश्य बार-बार रीबूट हो रहा है.
लेकिन नाइजीरिया के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में बसे एक अनोखे शहर के लोगों के लिए यह कोई भ्रम, सपना या जादुई फिल्म नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. लगभग दो लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में प्रकृति सालों से इंसानी चेहरों की जेरॉक्स कॉपियां तैयार कर रही है. ये जगह है अफ्रीका में नाइजीरिया का एक शहर- इग्बो-ओरा. जिसे पूरी दुनिया ट्विन कैपिटल ऑफ वर्ल्ड यानी जुड़वां बच्चों की राजधानी कहती है.
इस शहर के केंद्र में एक खास पत्थर का स्मारक बना हुआ है, जिसमें एक मां अपने जुड़वां बच्चों को गोद में थामे नजर आती है, जो यहां की सामूहिक पहचान का एक खूबसूरत प्रतीक है. जहां पूरी दुनिया में जुड़वां बच्चों के जन्म को एक दुर्लभ प्राकृतिक घटना के रूप में देखा जाता है, वहीं इग्बो-ओरा में यह एक आम सामाजिक नियम बन चुका है.

एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार, पूरी दुनिया में औसतन हर 1,000 प्रसव में से केवल 12 बच्चे ही जुड़वां पैदा होते हैं. लेकिन इग्बो-ओरा की कहानी वैज्ञानिक रूप से बेहद चौंकाने वाली है. यहां प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर लगभग 45 से 50 जुड़वां जोड़े पैदा होते हैं. इसका कनेक्शन लोग यहां के रोज के भोजन से जोड़ते हैं. कुछ चिकित्सा शोधकर्ताओं का मानना है कि इग्बो-ओरा में खाए जाने वाले रतालू की कंद में 'फाइटोएस्ट्रोजन' नामक एक रासायनिक यौगिक प्रचुर मात्रा में होता है. यह तत्व महिला के शरीर में जाकर अंडाशय को उत्तेजित करता है, जिससे मासिक धर्म चक्र के दौरान एक के बजाय दो या उससे अधिक अंडे रिलीज होने की संभावना बढ़ जाती है. इस प्रक्रिया को चिकित्सा विज्ञान में 'मल्टीपल ओव्यूलेशन' कहा जाता है.
हालांकि, वैज्ञानिक यह भी जोड़ते हैं कि केवल भोजन ही एकमात्र कारण नहीं हो सकता, सदियों से एक ही क्षेत्र में शादियां होने के कारण यहां का जीन पूल भी इसके लिए अनुकूल हो चुका है.
यहां के लोग इसे इबेजी संस्कृति और उत्सव से जोड़कर देखते हैं. जुड़वां बच्चों को साक्षात ईश्वर का उपहार तथा सौभाग्य व सुरक्षा लाने वाला माना जाता है. परंपरा के अनुसार, जब भी किसी परिवार में जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं, तो खुशी में बीन्स पकाकर पूरे मोहल्ले में प्रसाद या भेंट के रूप में बांटी जाती हैं. इसी अनूठी पहचान का जश्न वैश्विक स्तर पर मनाने के लिए साल 2018 से हर साल 11 अक्टूबर को यहां 'वर्ल्ड ट्विन्स फेस्टिवल' मनाया जाता है. इस दिन दुनियाभर से यहां जुड़वां लोग जुटते हैं.

जब बात दुनिया के ट्विन कैपिटल की हो रही है तो ऐसे में भारत की ट्विन कैपिटल का जिक्र करना भी जरूरी हो जाता है. भारत में भी एक जगह है जो जुड़वां लोगों की जन्मदर को लेकर चर्चा में रहता है. ये जगह है केरल के मलप्पुरम का कोडिंग्ही गांव. ठीक इग्बो-ओरा की ही तरह, ये जगह भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है. लगभग 2,000 परिवारों की कुल आबादी वाले इस छोटे से गांव में 450 से भी अधिक जुड़वां जोड़े यानी 900 से अधिक हमशक्ल लोग एक साथ रहते हैं.
जहां पूरे भारत में जुड़वां बच्चों की जन्म दर दुनिया में सबसे कम है, वहीं कोडिंग्ही में यह दर वैश्विक औसत से भी कई गुना अधिक है. हालांकि वैज्ञानिकों ने ब्राजील के कैंडिडो गोडोई और भारत के कोडिंग्ही पर भी काफी शोध किए हैं, लेकिन इग्बो-ओरा जैसी निरंतरता पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलती.
विज्ञान चाहे जेनेटिक्स की कितनी भी परतें खोल ले, लेकिन इग्बो-ओरा के लोगों के लिए यह किसी वैज्ञानिक लैब की रिपोर्ट का विषय नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों का आशीर्वाद और प्रकृति का अनमोल उपहार है. यह अनोखा शहर हमें याद दिलाता है कि इंसान भले ही विज्ञान के दम पर कितनी भी तरक्की क्यों न कर ले, लेकिन धरती पर आज भी ऐसी कई रहस्यमयी तिजोरियां मौजूद हैं जिनकी असली चाबी सिर्फ और सिर्फ कुदरत के पास सुरक्षित है. इग्बो-ओरा आज भी हर मोड़ पर एक जैसे मुस्कुराते चेहरों के साथ दुनिया को यही संदेश दे रहा है कि जिंदगी जब भी यहां आती है, हमेशा दोगुनी खुशियां लेकर आती है.