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भारत-चीन पर यूरोपीय देशों से प्रतिबंध लगवाना चाहता था अमेरिका, ट्रंप के वित्त मंत्री ने ही खोल दी पोल

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. उन्होंने बताया कि अमेरिका ने अपने यूरोपीय साझेदारों से रूसी तेल खरीदने के लिए चीन और भारत पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा था. लेकिन यूरोपीय सहयोगियों इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

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ट्रंप के प्रस्ताव को यूरोपीय देशों ने खारिज कर दिया. (Photo: Reuters)
ट्रंप के प्रस्ताव को यूरोपीय देशों ने खारिज कर दिया. (Photo: Reuters)

रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की अमेरिका की कोशिशों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया है कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश भारत और चीन पर सेकेंडरी सैंक्शन लगाएं. लेकिन यूरोपीय सहयोगियों ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया.

इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने भी इन प्रतिबंधों से छूट देने का फैसला किया. अमेरिकी टीवी चैनल एनबीसी के कार्यक्रम 'मीट द प्रेस' में बातचीत के दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय सहयोगियों की दोहरी नीति पर हमला बोला.

बेसेंट ने खुलासा किया कि अमेरिका ने अपने यूरोपीय साझेदारों से रूसी तेल खरीदने के लिए चीन और भारत पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने इसे खारिज कर दिया.

'अकेला अमेरिका ही ये बोझ क्यों उठाए?'

बेसेंट ने कहा, 'तो फिर अकेला अमेरिका ही ये बोझ क्यों उठाए? राष्ट्रपति ट्रंप शायद हमारे यूरोपीय साझेदारों के संपर्क में रहेंगे, लेकिन अमेरिका अकेला क्यों आगे बढ़े?' उन्होंने ये भी याद दिलाया कि यूरोपीय देशों ने खुद मई में रूसी डीजल और जेट ईंधन की खरीद पर लगा बैन हटा दिया था.

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वित्त मंत्री बेसेंट ने यूरोपीय देशों पर हमला करते हुए कहा कि वो रूसी ऊर्जा खरीदकर असल में यूक्रेन के खिलाफ रूसी युद्ध को बढ़ावा दे रहे हैं. उन्होंने कहा, 'यूरोपियों ने यूक्रेन की तुलना में रूस और व्लादिमीर पुतिन को ज्यादा पैसा दिया है. वो अभी भी रूसी ऊर्जा का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं और रूस की युद्ध मशीन को वित्तपोषित कर रहे हैं. अमेरिका सिर्फ 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें से 1.8 अरब डॉलर का फर्टिलाइजर है, जबकि यूरोपीय देश इससे 10 गुना ज्यादा आयात कर रहे हैं.'

60 दिनों के लिए रोके गए प्रतिबंध

बता दें कि अमेरिका ने रविवार को बताया कि रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत दूसरे देशों पर टैरिफ से दी गई छूट असल में इसका असर देखने के लिए 60 दिनों की एक अस्थायी रोक है.

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' राष्ट्रपति को स्थिति का आकलन करने की छूट देता है. बेसेंट ने कहा कि शुक्रवार को ट्रंप का एक कार्यकारी आदेश सिर्फ ग्राहम एक्ट के तहत 60 दिनों की छूट देता है, कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं हटाए गए हैं.

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विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और उज्बेकिस्तान की छह दिवसीय यात्रा पर रवाना होने से पहले पत्रकारों से बात की. इस दौरान उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि राष्ट्रपति इन 60 दिनों की अवधि का इस्तेमाल ये देखने के लिए करना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ दोनों को लागू करने का वैश्विक अर्थव्यवस्था और यहां तक कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा.'

रुबियो ने ईरान युद्ध के कारण ग्लोबल एनर्जी सप्लाई पर दबाव, सऊदी अरब में हूतियों के हमलों और यूक्रेन-रूस युद्ध का हवाला दिया.

ट्रंप ने बताया था 'अच्छा फैसला'

शुक्रवार को मियामी के पास मार-ए-लागो रिसॉर्ट में ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव किया था. उन्होंने कहा था कि ये अमेरिका और दुनिया दोनों के लिए एक अच्छा फैसला साबित होगा. हालांकि, ट्रंप के इस फैसले का अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के सांसदों ने विरोध किया है.

यह भी पढ़ें: रूसी तेल-गैस खरीद पर भारत को टैरिफ से छूट क्यों? ट्रंप ने बताई ये वजह

भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ट्रंप का ये कदम पुतिन को राहत देने और यूक्रेन को पीछे छोड़ने जैसा है. वहीं, सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी ट्रंप के इस रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि रिपब्लिकन सहयोगियों की ढिलाई की कीमत अब अमेरिका और उसके सहयोगियों को चुकानी पड़ रही है.

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