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ईरान को घुटनों पर लाने का ट्रंप कार्ड? क्यों इतना अहम है खार्ग आइलैंड, जहां अमेरिका ने बरसाए बम

फारस की खाड़ी में स्थित छोटा सा खार्ग आइलैंड आज दुनिया की राजनीति और ऊर्जा बाजार के केंद्र में आ गया है. यह द्वीप ईरान के अधिकांश तेल निर्यात का मुख्य केंद्र है. अमेरिका के हालिया हमले के बाद यह जगह सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और भू-राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन गई है. जानें इस आईलैंड के बारे में सबकुछ.

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खार्ग आईलैंड के बारे में ट्रंप 40 साल पहले भी चर्चा कर चुके हैं. (Photo- ITG)
खार्ग आईलैंड के बारे में ट्रंप 40 साल पहले भी चर्चा कर चुके हैं. (Photo- ITG)

फारस की खाड़ी के शांत दिखने वाले नीले पानी के बीच एक छोटा सा लेकिन ईरान के लिए सबसे ज्यादा अहम - खार्ग आइलैंड स्थित है. आकार में यह इतना छोटा है कि पहली नजर में इसे मैप पर ढूंढना भी मुश्किल लगता है. लेकिन आज यही छोटा सा द्वीप वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और सैन्य रणनीति के केंद्र में आ गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऐलान किया कि अमेरिकी सेना ने खार्ग आइलैंड पर बड़ा सैन्य हमला किया है. ट्रंप के मुताबिक यह हमला "मध्य पूर्व के इतिहास की सबसे शक्तिशाली बमबारी में से एक" था, जिसमें द्वीप पर मौजूद लगभग सभी सैन्य ठिकानों को नष्ट कर दिया गया.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस द्वीप को ईरानी शासन का "क्राउन ज्वेल" यानी सबसे कीमती संपत्ति बताया. उन्होंने यह भी कहा कि हमले के दौरान जानबूझकर तेल से जुड़ी सुविधाओं को निशाना नहीं बनाया गया. यह हमला ऐसे समय हुआ है जब ईरान पर होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को बाधित करने के आरोप लग रहे हैं. यही वजह है कि अचानक खार्ग आइलैंड अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है.

छोटा सा द्वीप, लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम

खार्ग आइलैंड आकार में सिर्फ 20 वर्ग किलोमीटर का है. इसकी चौड़ाई करीब 3 मील और लंबाई लगभग 7 मील है. यह ईरान के बुशेहर प्रांत के तट से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित है. द्वीप की आबादी बहुत बड़ी नहीं है. यहां लगभग 3,000 से 5,000 लोग रहते हैं. इनमें स्थानीय मछुआरों के परिवार, ईरान की राष्ट्रीय तेल कंपनी के कर्मचारी और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC के सैनिक शामिल हैं.

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यह द्वीप प्राकृतिक रूप से चूना पत्थर से बना है. इसके आसपास समुद्र की गहराई करीब 70 मीटर तक है. रणनीतिक रूप से ईरान के लिए यह द्वीप काफी अहम हो जाता है. यहां समुद्र की गहराई ज्यादा होने की वजह से दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर यहां आसानी से आ सकते हैं और सीधे तेल लोड कर सकते हैं.

ईरान का तेल एक्सपोर्ट टर्मिनल

खार्ग आइलैंड को ईरान का सबसे बड़ा तेल टर्मिनल कहा जाता है. यहां विशाल टैंक फार्म भी बने हुए हैं, जिनमें करीब 2.4 करोड़ बैरल कच्चा तेल जमा किया जा सकता है. समुद्र के नीचे बिछी पाइपलाइनें ईरान के बड़े तेल क्षेत्रों - जैसे गचसारान और अहवाज - को सीधे इस द्वीप से जोड़ती हैं. इन पाइपलाइनों के जरिए तेल खार्ग आइलैंड तक पहुंचता है और फिर यहां से बड़े टैंकरों में भरकर दुनिया के अलग-अलग देशों तक भेजा जाता है. इसी वजह से यह द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है.

ईरान की आर्थिक जीवनरेखा

अनुमान है कि ईरान के कुल तेल निर्यात का 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा खार्ग आइलैंड से ही होता है. प्रतिबंधों से पहले यहां से रोजाना 15 से 20 लाख बैरल तक तेल निर्यात किया जाता था. मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों के हिसाब से यह हर साल 40 से 60 अरब डॉलर की कमाई करा सकता है.

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यही पैसा ईरान की सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. इसी से सरकारी खर्च, सैन्य बजट, क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों और कई रणनीतिक कार्यक्रमों को वित्तीय मदद मिलती है. अगर किसी कारण से यह द्वीप काम करना बंद कर दे, तो ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लग सकता है. खार्ग आइलैंड सिर्फ ईरान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी महत्वपूर्ण है. यहां से निकलने वाला तेल दुनिया की कुल आपूर्ति का लगभग 2 से 3 फीसदी हिस्सा है. 

अगर यहां से तेल की आपूर्ति रुक जाए तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. इसका असर खासतौर पर एशिया और यूरोप के देशों पर पड़ेगा. भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति गंभीर हो सकती है.

ट्रंप का सपना और आज की रणनीति

दिलचस्प बात यह है कि खार्ग आइलैंड को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नजरिया नया नहीं है. 1988 में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि अगर ईरान अमेरिकी जहाजों पर हमला करता है तो अमेरिका को खार्ग आइलैंड पर कब्जा कर लेना चाहिए. करीब चार दशक बाद भी उनकी सोच में ज्यादा बदलाव नहीं दिखता. हालिया बयान में उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो अमेरिका अपनी रणनीति बदल सकता है.

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सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका चाहे तो इस द्वीप पर कब्जा करना बहुत मुश्किल नहीं होगा. अनुमान है कि करीब 5,000 सैनिक, हेलीकॉप्टर और नौसैनिक जहाजों की मदद से कुछ ही दिनों में इस द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है. लेकिन ऐसा होने पर इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

इस बीच अमेरिका ने पहले ही मरीन यूनिट को मिडिल ईस्ट में तैनात करने का ऐलान कर दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक इस यूनिट में आमतौर पर करीब 2,500 मरीन और नौसैनिक शामिल होते हैं. फिलहाल यह साफ नहीं है कि इस यूनिट को किस मिशन के लिए भेजा जा रहा है या इसे मध्य पूर्व के किस इलाके में तैनात किया जाएगा.

आमतौर पर इस तरह की यूनिट का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर लोगों की निकासी, समुद्र से जमीन पर सैन्य अभियान और छापेमारी जैसे ऑपरेशनों में किया जाता है. इसमें जमीनी और हवाई दोनों तरह की लड़ाकू क्षमताएं होती हैं और कुछ यूनिट स्पेशल ऑपरेशंस के लिए भी ट्रेंड होती हैं. अधिकारियों का कहना है कि इससे कमांडरों को अलग-अलग आपात स्थितियों में कार्रवाई के लिए ज्यादा विकल्प मिल जाते हैं.

खार्ग आईलैंड पर अमेरिका ने कार्रवाई की तो क्या होगा?

ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अगर उसके खिलाफ खार्ग आईलैंड को कब्जे जैसी किसी तरह की कार्रवाई होती है तो वह क्षेत्र के अन्य तेल ठिकानों को निशाना बना सकता है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के तेल फैसिलिटी भी खतरे में आ सकते हैं.

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इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बंद करने की कोशिश भी की जा सकती है. अगर ऐसा हुआ तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है और दुनिया की अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लग सकता है.

आज खार्ग आइलैंड सिर्फ एक छोटा सा द्वीप नहीं रह गया है. यह ईरान की आर्थिक ताकत, अमेरिका की सैन्य रणनीति और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के बीच खड़े एक बड़े संघर्ष का प्रतीक बन चुका है. फिलहाल दुनिया की नजरें इसी पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह संकट किस दिशा में जाता है.

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