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योगी सरकार की योजनाओं ने बदली मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री की किस्मत, देश-विदेश में बज रहा डंका

यूपी के मेरठ में खेल सामान उद्योग अब सिर्फ क्रिकेट बैट तक सीमित नहीं है. यहां हॉकी स्टिक, फुटबॉल, वॉलीबॉल और अन्य खेल उपकरण भी बनते हैं. ओडीओपी योजना और सरकारी सब्सिडी से छोटे कारोबारियों को मदद मिली है, जिससे लगभग 5 से 7 हजार स्पोर्ट्स यूनिट्स सक्रिय हैं. मेरठ से हर साल करीब 975 करोड़ रुपये के खेल सामान का निर्यात ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, अमेरिका समेत कई देशों में होता है.

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मेरठ में खेल सामान बनाने का इतिहास करीब 90 साल पुराना है. अब हर साल 975 करोड़ रुपए का निर्यात हो रहा है. (Photo-ITG)
मेरठ में खेल सामान बनाने का इतिहास करीब 90 साल पुराना है. अब हर साल 975 करोड़ रुपए का निर्यात हो रहा है. (Photo-ITG)

मेरठ की पहचान अब सिर्फ क्रिकेट बैट बनाने वाले शहर की नहीं रह गई है. यहां बनने वाला खेल का सामान देश के साथ विदेशों में भी पहुंच रहा है. ओडीओपी यानी एक जिला, एक उत्पाद योजना ने इस कारोबार को नई रफ्तार दी है. 
सरकारी योजनाओं से छोटे कारोबारियों को मदद मिली है. मशीनों पर सब्सिडी और ब्याज मुक्त लोन ने भी कारोबार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. आज मेरठ में करीब 5 से 7 हजार छोटी-बड़ी स्पोर्ट्स यूनिट काम कर रही हैं. जिले से हर साल करीब 975 करोड़ रुपये के खेल सामान का निर्यात होता है.

मेरठ में खेल सामान बनाने का इतिहास करीब 90 साल पुराना है. उद्योग विभाग के मुताबिक, 1935 से 1940 के बीच कुछ परिवारों ने फुटबॉल बनाने का काम शुरू किया था. इसके बाद 1947 में देश के बंटवारे के बाद स्यालकोट और पेशावर से आए लोगों ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया. धीरे-धीरे मेरठ खेल सामान बनाने का बड़ा केंद्र बन गया.

शुरुआत में यहां क्रिकेट बैट और फुटबॉल बनाए जाते थे. समय के साथ कारोबार बढ़ता गया. अब यहां क्रिकेट बैट, बॉल और स्टंप के साथ हॉकी स्टिक, फुटबॉल और वॉलीबॉल भी बनते हैं. टेनिस रैकेट, कैरम बोर्ड और खेलों के नेट भी तैयार होते हैं. इसके अलावा जिम उपकरण, बॉक्सिंग ग्लव्स, स्पोर्ट्स वियर और किट बैग भी बनाए जा रहे हैं.

आज मेरठ में करीब 5 से 7 हजार छोटी-बड़ी स्पोर्ट्स यूनिट काम कर रही हैं

ओडीओपी से छोटे कारोबारियों को मिली ताकत

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बुची स्पोर्ट्स के मालिक चरणजीत भाटिया ने बताया कि ओडीओपी योजना से छोटे कारोबारियों को काफी फायदा हुआ है. उनका कहना है कि पहले मेरठ में केवल चार-पांच स्पोर्ट्स यूनिट थीं. अब इनकी संख्या करीब 5 से 7 हजार तक पहुंच गई है.

ओडीओपी के तहत कारोबारियों को लोन लेने में मदद मिलती है. नई मशीनें लगाने पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी भी मिलती है. इससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली है. भाटिया ने भी सरकारी योजना का फायदा उठाकर फाइबर-प्लास्टिक क्रिकेट बैट बनाने की मशीनें लगाई हैं.

कई देशों तक पहुंच रहा है मेरठ का सामान

बीडीएम स्पोर्ट्स के मालिक आदित्य महाजन के मुताबिक, खेलो इंडिया जैसी योजनाओं से भी मेरठ के खेल उद्योग को फायदा मिला है. पहले शहर की पहचान मुख्य रूप से क्रिकेट बैट के लिए थी. अब कई तरह के खेल सामान का उत्पादन हो रहा है.

मेरठ में बना खेल सामान ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और अमेरिका तक पहुंच रहा है. इसके अलावा वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड, जर्मनी, फ्रांस, श्रीलंका, रूस और बांग्लादेश समेत कई देशों में भी इसका निर्यात होता है.

मेरठ में बना स्पोर्टस गुड विदेशों में भी सप्लाई हो रही है. (Photo-ITG)

स्पोर्ट्स इंडस्ट्री से सिर्फ बड़े कारोबारी ही नहीं जुड़े हैं. उत्पादन, पैकिंग, पॉलिश, सिलाई और फिटिंग जैसे कामों में भी बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं. किट तैयार करने से लेकर सप्लाई और परिवहन तक कई लोगों को रोजगार मिल रहा है.

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मेरठ के कारोबारी अब पारंपरिक हुनर के साथ आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे सामान की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ी हैं. कारोबारियों का मानना है कि बेहतर डिजाइन, गुणवत्ता, तकनीक और ब्रांडिंग पर ध्यान दिया जाए तो मेरठ का खेल उद्योग दुनिया के बाजार में और बड़ी जगह बना सकता है. आज मेरठ एक बहुआयामी स्पोर्ट्स गुड्स हब बन चुका है.


 

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