सुबह का वक्त है. गांव में लोग हैं, खेत हैं, गन्ने की फसल है... लेकिन खेतों की तरफ जाने वाला रास्ता सूना पड़ा है. वजह है एक ऐसा डर, जिसे हर कोई महसूस कर रहा है. हाथों में डंडे लिए ग्रामीण चौपाल पर बैठे हैं. रात में पहरा दे रहे हैं. बच्चों को स्कूल भेजने से डर रहे हैं. महिलाएं अकेले खेत नहीं जा रहीं. मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा में इन दिनों यही जिंदगी है. वजह हैं तेंदुए.
बलिया गांव में चारा लेने खेत गई बुजुर्ग महिला बिरमा देवी पर तेंदुए ने हमला किया. तेंदुए ने उनकी गर्दन पर हमला किया और महिला की मौत हो गई. ग्रामीणों ने शोर मचाकर तेंदुए को भगाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इस घटना के बाद गांव में डर ऐसा बैठा कि खेतों में काम करने से लेकर रात को घर से बाहर निकलने तक पर पहरा लग गया. अब प्रशासन ने भी मोर्चा संभाल लिया है.

गांव में पुलिस, PAC और QRT की टीमें तैनात हैं. वन विभाग ड्रोन से निगरानी कर रहा है. तेंदुओं को पकड़ने के लिए करीब 22 पिंजरे लगाए गए हैं. प्रशासन के मुताबिक, इस पूरे इलाके में करीब 20 से 25 तेंदुओं की मौजूदगी सामने आई है. यानी कहानी सिर्फ एक तेंदुए की नहीं है. कहानी उस पूरे इलाके की है, जहां गन्ने के खेतों में तेंदुओं को छिपने की जगह मिल रही है और उन्हीं खेतों के बीच इंसानों की जिंदगी चल रही है.
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ठाकुरद्वारा थाना क्षेत्र का बलिया गांव... बिरमा देवी खेत में चारा लेने गई थीं. रोज की तरह ही काम था. खेत गांव की जिंदगी का हिस्सा हैं. लेकिन उस दिन खेत में तेंदुआ मौजूद था. दोपहर के समय ग्रामीण समूह बनाकर खेत की तरफ जा रहे थे. इसी दौरान अचानक तेंदुआ सामने आया और बिरमा देवी पर झपट पड़ा. हमला इतना अचानक था कि आसपास मौजूद लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला. तेंदुए ने महिला की गर्दन पर हमला किया.

इसके बाद वहां चीख-पुकार मच गई. ग्रामीणों ने शोर मचाया. लाठी-डंडे और भाले-बल्लम लेकर तेंदुए को खदेड़ने की कोशिश की गई. आखिरकार तेंदुआ वहां से भाग गया. लेकिन महिला गंभीर रूप से घायल हो चुकी थीं. उनकी मौत हो गई. एक पल में खेत, जो रोजी-रोटी का जरिया था, डर की वजह बन गया.
अब खेत जाने से पहले लोग एक-दूसरे को बुलाते हैं
बिरमा देवी की मौत के बाद बलिया गांव में सबसे बड़ा बदलाव यही है कि लोग अब अकेले खेत नहीं जाना चाहते. पहले कोई चारा लेने निकलता था तो अकेले चला जाता था. अब लोग कहते हैं- पहले दो-चार लोगों को बुलाओ, फिर चलेंगे. महिलाएं समूह में निकल रही हैं. ग्रामीण हाथों में डंडे लेकर चौपाल पर बैठ रहे हैं. रात में पहरा दिया जा रहा है. और सबसे बड़ी बात- बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है.
ग्रामीणों के मुताबिक, तेंदुए के डर की वजह से कुछ बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. माता-पिता उन्हें अकेले बाहर भेजने से डर रहे हैं. यानी तेंदुआ सिर्फ खेतों में नहीं है. उसका डर गांव की जिंदगी में घुस चुका है.

जब आजतक की टीम बलिया गांव पहुंची, तो वहां का माहौल देखकर तेंदुए के आतंक का अंदाजा लगाया जा सकता था. ग्रामीण एक जगह जुटे हुए थे. किसी के हाथ में डंडा था, तो कोई आसपास के खेतों की तरफ नजर रख रहा था. बातचीत में बार-बार तेंदुए का जिक्र हो रहा था. किस खेत में देखा गया? किस रास्ते से आया? किधर भागा? रात में आवाज कहां से आई? यही गांव की नई चर्चा है.
ग्रामीणों का कहना है कि रात में घर से बाहर निकलने में डर लगता है. कई लोग रात-रातभर जागकर पहरा दे रहे हैं. डर इस बात का है कि कहीं तेंदुआ खेतों से निकलकर आबादी में न पहुंच जाए.
गन्ने के खेत बने तेंदुओं का ठिकाना?
अब सवाल है कि ठाकुरद्वारा में तेंदुए बार-बार आबादी के आसपास क्यों नजर आ रहे हैं? प्रशासन इसकी एक बड़ी वजह इलाके के गन्ने के खेतों को मान रहा है. एडीएम मुरादाबाद संगीता गौतम के मुताबिक, पूरे इलाके में करीब 20 से 25 तेंदुओं की मौजूदगी सामने आई है. इलाके में बड़ी संख्या में गन्ने के खेत हैं.
गन्ने की घनी फसल तेंदुओं को छिपने के लिए सुरक्षित जगह देती है. इसके अलावा मादा तेंदुए और उनके बच्चे भी मौजूद बताए जा रहे हैं. यानी जंगल और इंसानी बस्ती के बीच की दूरी कई जगहों पर बेहद कम है. तेंदुए खेतों में छिप सकते हैं और इंसान उन्हीं खेतों में काम करने के लिए पहुंचते हैं.
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प्रशासन के मुताबिक तेंदुओं को पकड़ने का अभियान पहले से चल रहा है. पिछले दिनों छह तेंदुए पकड़े जा चुके हैं. लेकिन इसके बाद भी तेंदुओं की गतिविधियां जारी हैं. अब बलिया गांव में महिला की मौत के बाद वन विभाग ने अभियान और तेज कर दिया है. करीब 22 पिंजरे लगाए गए हैं. ये पिंजरे उन इलाकों में लगाए जा रहे हैं जहां तेंदुए की आवाजाही की संभावना है. साथ ही ड्रोन कैमरों से निगरानी की जा रही है.

पुलिस, PAC और QRT की टीमें भी इलाके में तैनात हैं. SP ग्रामीण कुंवर आकाश सिंह के मुताबिक, महिला की मौत के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. ग्रामीणों को सलाह दी जा रही है कि वे अकेले खेतों में न जाएं. किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस या वन विभाग को दी जाए. प्रशासन की कोशिश है कि तेंदुए को सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू किया जाए और इंसानों को उससे दूर रखा जाए.
महिला की मौत के बाद प्रशासन ने पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता देने की कार्रवाई भी पूरी कर ली है. एडीएम संगीता गौतम ने बताया कि परिवार को पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. उन्होंने कहा कि घटना के बाद लोगों में गुस्सा था, लेकिन स्थिति अब सामान्य है. साथ ही प्रशासन की तरफ से लोगों को जागरूक किया जा रहा है. गांव की जमीन पर स्थिति को समझें तो डर अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
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इस पूरे मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर करीब 15 दिनों के भीतर तेंदुए के हमले से मौत का यह दूसरा मामला बताया जा रहा है. बलिया गांव की चौपाल पर बैठे ग्रामीणों की तस्वीर शायद इस पूरे मामले की सबसे बड़ी तस्वीर है. हाथों में डंडे हैं. लोग समूह में बैठे हैं. और नजरें खेतों की तरफ. कभी कोई सरसराहट होती है तो सबकी निगाह उधर चली जाती है.

ये वही गांव है जहां लोग शाम को आराम से खेतों से लौटते थे. बच्चे खेलते थे. महिलाएं अपने रोजमर्रा के काम करती थीं. अब हर गतिविधि के साथ एक सवाल जुड़ गया है- कहीं आसपास तेंदुआ तो नहीं? प्रशासन ने 22 पिंजरे लगाए हैं. ड्रोन से निगरानी हो रही है. छह तेंदुए पहले पकड़े जा चुके हैं. पुलिस, PAC, QRT और वन विभाग की टीमें तैनात हैं. लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है.
प्रशासन के मुताबिक पूरे इलाके में 20 से 25 तेंदुओं की मौजूदगी है. गन्ने के खेत उनके लिए छिपने की जगह हैं. और इन्हीं खेतों में ग्रामीणों की रोजी-रोटी भी जुड़ी है. फिलहाल वन विभाग की टीमें तेंदुओं की तलाश में जुटी हैं. पिंजरे लगाए जा चुके हैं. ड्रोन उड़ रहे हैं. पुलिस गश्त कर रही है. बलिया गांव की रातें फिलहाल ऐसी ही हैं- अंधेरा होते ही दरवाजे बंद, चौपाल पर पहरा और हर सरसराहट पर धड़कन तेज.