मेरठ के सनसनीखेज 'नीला ड्रम हत्याकांड' में अदालत ने दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई है. जिला और सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा-II ने ये फैसला सुनाया. इस फैसले के साथ ही हर तरफ मेरठ कचहरी परिसर में जज साहब के अनोखे अंदाज और अदालत की कार्यवाही की चर्चा हो रही है.
अदालत के फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद दोनों दोषियों को जेल के रिकॉर्ड में कैदी नंबर बांट दिए गए हैं. साहिल को कैदी नंबर 395 और मुस्कान को कैदी नंबर 396 बनाया गया है.
जेल नियमों के तहत अब दोनों को जेल की पोशाक पहननी होगी. साहिल को सफेद पायजामा-कुर्ता और मुस्कान को क्रीम कलर की साड़ी या सूट दिया जाएगा.
मौत की सजा के बाद मुस्कान-साहिल ने छोड़ा खाना
सुनवाई के दौरान दोनों दोषियों को आजीवन कारावास सजा मिलने की उम्मीद थी. लेकिन जैसे ही जज ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई, दोनों के होश उड़ गए और वो वीडियो कॉन्फेंसिंग पर ही फफक-फफककर रोने लगे. फैसले के बाद से दोनों ने जेल में खाना-पीना भी छोड़ दिया है. उनकी मानसिक स्थिति और सुरक्षा को देखते हुए जेल प्रशासन ने उनकी निगरानी बढ़ा दी है.
मुस्कान को महिला बैरक में उसी स्थान पर रखा जाएगा, जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार बच्चों के साथ रहने वाली महिलाएं रहती हैं. सजा मिलने के बाद से दोनों लगातार जेल प्रशासन से उच्च न्यायालय में अपील करने के तौर-तरीकों के बारे में पूछताछ कर रहे हैं.
जज अरविंद कुमार मिश्रा का अनोखा अंदाज
ये फैसला सिर्फ सजा के ऐलान के कारण ही नहीं, बल्कि जिला और सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा के अनूठे और सख्त अंदाज के कारण भी चर्चा में है. बताया जा रहा है कि जज ने अपनी सीट पर बैठते ही महाभारत की दो पंक्तियों से फैसले की शुरुआत की. उन्होंने न्याय को परिभाषित करते हुए कहा कि अपराधी को उसके अपराध की गंभीरता के मुताबिक दंड देना ही न्यायिक धर्म है.
जज ने बाघ और जंगल की मिसाल देते हुए कहा कि अगर बाघ जंगल में है, तो जंगल सुरक्षित है और अगर जंगल बचा है, तो बाघ भी सुरक्षित है. कानून मनुष्य के लिए बनाया गया है, जो इंसानों की सुरक्षा करता है और उनके व्यवहार को कंट्रोल करता है. इसलिए समाज में इसका कड़ा संदेश जाना बहुत जरूरी है. सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि सजा का ये फैसला सुनाने के ठीक बाद जज ने अपने इस्तेमाल किए गए पेन को तुरंत कूड़ेदान में फेंक दिया.
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मेरठ में 23 साल बाद आया मृत्युदंड का फैसला
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में जन्मे और 21 मई 2026 से मेरठ में जिला और सत्र न्यायाधीश के रूप में तैनात अरविंद कुमार मिश्रा अपनी सख्त फैसलों के लिए जाने जाते हैं. वहीं, इस फैसले के साथ ही मेरठ में करीब 23 साल बाद किसी अदालत ने फांसी की सजा सुनाई है. इससे पहले साल 2003 में मेरठ में एक डॉक्टर को फांसी की सजा दी गई थी.