एक तरफ पुलिस का दावा है कि आरोपी ने 23 पुलिसकर्मियों से घिरे होने के बावजूद फायरिंग की. दूसरी तरफ हाई कोर्ट का सवाल है कि अगर इतनी बड़ी पुलिस टीम मौके पर मौजूद थी तो आरोपी की गोली से एक भी पुलिसकर्मी घायल क्यों नहीं हुआ? और जब पुलिस ने जवाबी फायरिंग की तो करीब 15 मीटर की दूरी से चली गोली सीधे आरोपी के दोनों पैरों में कैसे लगी?
श्रावस्ती के इकौना में मई 2025 में हुए हाफ एनकाउंटर की कहानी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने ऐसे ही कई सवाल उठाए हैं. इनमें सबसे दिलचस्प सवाल पुलिस टीम की गाड़ी को लेकर है. कोर्ट ने पूछा कि इंस्पेक्टर समेत 13 पुलिसकर्मी आखिर एक ही जीप में कैसे बैठे थे? अदालत ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है. साथ ही तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी और शूटिंग क्षमता की जांच करने का भी निर्देश दिया है. सीबीआई को तीन महीने के भीतर अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी.
एक जीप में 13 लोग... कोर्ट ने यहीं पकड़ ली कहानी
पुलिस की एफआईआर में बताए गए घटनाक्रम के मुताबिक, एनकाउंटर के दौरान तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे की टीम में कुल 13 पुलिसकर्मी थे. इनमें इंस्पेक्टर, पांच सब इंस्पेक्टर, एक हेड कांस्टेबल और छह कांस्टेबल शामिल थे. कुल संख्या 13 हुई. यहीं हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर ये सभी पुलिसकर्मी एक ही जीप में कैसे बैठे? अदालत ने कहा कि सामान्य जीप में इतने पुलिसकर्मियों के बैठने की क्षमता नहीं होती. यहां तक कि पुलिस द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली SUV और MUV में भी 13 लोगों के बैठने की जगह नहीं होती. इतने लोगों के एक साथ बैठने के लिए वाहन का आकार मिनी बस जैसा होना चाहिए. अब यही सवाल जांच का हिस्सा है कि पुलिस टीम के 13 सदस्य मौके पर किस वाहन से पहुंचे थे. अगर एक ही जीप थी तो उसमें सभी कैसे बैठे और अगर एक से ज्यादा वाहन थे तो उनका जिक्र पुलिस के रिकॉर्ड में कहां है?
23 पुलिसकर्मी घेरे थे, फिर भी एक को गोली नहीं लगी
मामले में दूसरा बड़ा सवाल फायरिंग को लेकर है. पुलिस की कहानी के मुताबिक आरोपी अलाउद्दीन को घेरने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद थे. पुलिस ने दावा किया कि कुल 23 पुलिसकर्मी मौके पर थे. आरोपी ने पुलिस पार्टी को देखकर फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस का कहना था कि उसे आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया, लेकिन उसने कथित तौर पर हथियार दोबारा लोड किया और पुलिसकर्मियों को जान से मारने की धमकी दी. इसके बाद पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की. लेकिन हाई कोर्ट ने इस घटनाक्रम में एक अहम सवाल देखा कि 23 पुलिसकर्मियों से घिरे आरोपी ने फायरिंग की, लेकिन एक भी पुलिसकर्मी को गोली नहीं लगी. अदालत ने इसी विरोधाभास को जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना है. अब सीबीआई को यह पता लगाना होगा कि मौके पर पुलिसकर्मी वास्तव में किस स्थिति में थे, आरोपी और पुलिस टीम के बीच कितनी दूरी थी और फायरिंग किस दिशा में हुई.
रात 11 बजे, 15 मीटर की दूरी और दोनों पैरों में गोली
एनकाउंटर की कहानी का तीसरा महत्वपूर्ण हिस्सा एसएचओ की गोली है. पुलिस के मुताबिक घटना रात करीब 11 बजे एक सुनसान इलाके में हुई. तत्कालीन एसएचओ आरोपी से करीब 15 मीटर की दूरी पर थे. पुलिस की एफआईआर में दावा किया गया कि एसएचओ ने आरोपी के हथियार को दोबारा लोड करने की आवाज सुनी. इसके बाद उन्होंने गोली चलाई. गोली आरोपी के दोनों पैरों में लगी. हाई कोर्ट ने अब सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग और निशानेबाजी की क्षमता का भी परीक्षण करे. यानी जांच में यह सवाल भी देखा जाएगा कि रात के अंधेरे में 15 मीटर की दूरी से केवल असलहा लोड करने की आवाज के आधार पर निशाना कैसे साधा गया और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में ही कैसे लगीं.
'असलहा लोड करने की आवाज' से निशाना कैसे तय हुआ?
पुलिस की कहानी में असलहा लोड किए जाने की आवाज महत्वपूर्ण कड़ी है. दावा है कि एसएचओ ने अंधेरे में यह आवाज सुनी और खतरा महसूस होने पर गोली चलाई. लेकिन हाई कोर्ट ने इसी दावे को भी परखने की जरूरत समझी है.
सीबीआई अब यह देख सकती है कि घटनास्थल की वास्तविक परिस्थितियां कैसी थीं. रात के समय वहां कितनी रोशनी थी? आरोपी और एसएचओ के बीच वास्तविक दूरी कितनी थी? गोली किस दिशा से चली? आरोपी किस स्थिति में था? और क्या ऐसी परिस्थितियों में निशाना लगाना संभव था? मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी.