सुबह उठते ही फोन देखना, ऑफिस पहुंचने से पहले ही मेल चेक करना, दिनभर मीटिंग और डेडलाइन में फंसे रहना और घर लौटने के बाद भी काम के मैसेज आते रहना. भारत में नौकरीपेशा लोगों के लिए यह जिंदगी काफी आम लग सकती है. धीरे-धीरे लोग इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा मान लेते हैं और यह सोचकर सब्र करते हैं कि जॉब में तो ऐसा ही होता है.
लेकिन क्या वाकई नौकरी का मतलब यही है? क्या काम और जिंदगी के बीच इतना कम फासला होना जरूरी है? भारत से हजारों किलोमीटर दूर स्विट्जरलैंड का वर्क कल्चर इस सवाल को एक अलग नजरिए से देखने का मौका देता है.
वहां की कामकाजी जिंदगी के बारे में सुनने के बाद कई भारतीयों को लग सकता है कि असली जिंदगी तो शायद ऐसे ही जी जाती है. काम का दबाव सीमित हो, डेडलाइन के बीच भी सांस लेने की जगह हो, जॉब से जुड़ी इन्सिक्योरिटी कम हो और सबसे अहम, नौकरी के बाहर अपनी जिंदगी के लिए समय बचे.
इसी अंतर का अहसास भारतीय निवेश प्रोफेशनल मनुराज गर्ग को तब हुआ, जब वियतनाम में उनकी मुलाकात एक रिटायर्ड स्विस कॉरपोरेट वकील से हुई. यह मुलाकात उनके लिए सिर्फ एक सामान्य बातचीत नहीं रही, बल्कि उन्हें अपनी ही जिंदगी और काम करने के तरीके के बारे में सोचने पर मजबूर कर गई.
स्विस कपल से मुलाकात आंखें खोल दी
गर्ग अपनी पत्नी के साथ वियतनाम के हनोई में थे. होटल की लॉबी में उनकी मुलाकात एक स्विस कपल से हुई. पहली नजर में उन्हें लगा कि दोनों करीब 40-45 साल के होंगे. लेकिन बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि दोनों 60 की उम्र पार कर चुके हैं. इतना ही नहीं, यह एशिया का उनका 15वां या 16वां ट्रिप था.
यात्राओं की यह बात सुनकर बातचीत स्वाभाविक रूप से उनकी जिंदगी और नौकरी तक पहुंची. तब गर्ग को पता चला कि उस स्विस व्यक्ति ने जर्मनी में कॉरपोरेट वकील के तौर पर काम किया था और 55 साल की उम्र में रिटायर हो गया था. अपनी नौकरी के दिनों को याद करते हुए उसने अपनी जिंदगी को 'बहुत हेक्टिक' बताया.
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लेकिन यहीं से गर्ग को सबसे बड़ा झटका लगा. जिस जिंदगी को वह व्यक्ति 'बहुत हेक्टिक' बता रहा था, उसकी दिनचर्या सुनकर गर्ग को लगा कि भारत में शायद बहुत से लोग इसे हेक्टिक नहीं, बल्कि अच्छी वर्क लाइफ बैलेंस वाली नौकरी कहेंगे.
भारत के लोगों के लिए ऐसी लाइफ एक सपना
वह रोज 7 से 9 घंटे काम करता था. कुछ दिनों में शाम 5 बजे के बाद भी काम करना पड़ता था. इसके बावजूद वह हफ्ते में एक बार गोल्फ और तीन बार जिम के लिए समय निकाल लेता था. वह करीब सात घंटे सोता था.
यही वह जगह थी जहां दोनों देशों की कामकाजी जिंदगी का अंतर गर्ग को साफ दिखाई देने लगा. उन्होंने सोचा कि भारत में कितने लोग ऐसी नौकरी को वर्क लाइफ बैलेंस वाली नौकरी मानेंगे, जिसमें रोज 7-9 घंटे काम करने के बाद शाम 5 बजे के आसपास ऑफिस से निकलने की उम्मीद हो?
गर्ग ने लिखा कि वह सामने बैठे व्यक्ति को यह नहीं बता पाए कि भारत में 7-9 घंटे काम करना और शाम 5 बजे के आसपास ऑफिस से निकलना कई लोगों के लिए सपना हो सकता है. खासकर तब, जब ऑफिस का काम खत्म होने के बाद भी फोन, मेल और मैसेज के जरिए काम घर तक पहुंच जाता है.लेकिन बातचीत यहीं खत्म नहीं हुई. असली अंतर उन्हें तब समझ आया, जब बात रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी पर पहुंची.
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रिटायरमेंट के बाद उस व्यक्ति ने गोल्फ और जिम के लिए ज्यादा समय निकालना शुरू किया. वह ज्यादा सोने लगा और गर्ग के मुताबिक, साल में करीब चार महीने यात्रा करता था. यानी काम खत्म होने के बाद उसके पास जिंदगी जीने के लिए सिर्फ कुछ घंटे नहीं, बल्कि लंबा समय था.
इसके बाद उस स्विस व्यक्ति ने गर्ग से पूछा कि वह वियतनाम में कितने दिन रुकेंगे. गर्ग ने जवाब दिया- तीन हफ्ते. लेकिन असल में उनकी छुट्टी सिर्फ चार रातों की थी.
यहीं पर यह बातचीत गर्ग के लिए और व्यक्तिगत हो गई. उन्होंने लिखा कि उन्हें अपनी असली छुट्टी बताने में शर्म महसूस हुई, क्योंकि उन्हें वापस नौकरी पर जाना था. करीब 3,000 किलोमीटर दूर छुट्टी मनाने आए थे, लेकिन सिर्फ चार रात बाद ही वापस लौटना था.
जिंदगी के सबसे अच्छे साल किसके नाम कर रहे हैं?
एक तरफ वह स्विस रिटायर्ड वकील था, जो अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा काम करने के बाद साल में करीब चार महीने यात्रा कर रहा था. दूसरी तरफ गर्ग थे, जो हजारों किलोमीटर दूर छुट्टी मनाने पहुंचे थे, लेकिन कुछ ही दिनों में वापस नौकरी पर लौटना था. इसी अंतर ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि काम और जिंदगी के बीच असली संतुलन आखिर किसे कहते हैं.
इसी अनुभव के बाद गर्ग ने इस अंतर को 'जियोग्राफिकल डिविडेंड' नाम दिया. उनके मुताबिक, कुछ देशों में लोगों को बेहतर कामकाजी व्यवस्था, आराम का समय और ऐसी शामें मिलती हैं, जो सच में काम खत्म होने के बाद खत्म हो जाती हैं.
हालांकि, यह कहानी सिर्फ भारत और स्विट्जरलैंड की तुलना नहीं है. हर नौकरी, हर कंपनी और हर देश की परिस्थितियां अलग होती हैं. किसी एक व्यक्ति के अनुभव से पूरे देश के वर्क कल्चर की तस्वीर तय नहीं की जा सकती. लेकिन गर्ग की कहानी एक ऐसा सवाल जरूर छोड़ती है, जिससे शायद बहुत से नौकरीपेशा लोग खुद को जोड़ पाएंगे.हम अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे साल किसके नाम कर रहे हैं?
हम अक्सर कहते हैं- अभी मेहनत कर लेते हैं, बाद में जिंदगी जी लेंगे. लेकिन वह 'बाद में' कब आएगा? क्या जिंदगी जीने के लिए हमें हमेशा रिटायरमेंट का इंतजार करना चाहिए?
मनुराज गर्ग की कहानी शायद इसी सवाल पर सोचने को मजबूर करती है कि नौकरी से मिलने वाली सैलरी के साथ हमें यह भी देखना चाहिए कि उसके बदले हमारी जिंदगी में कितना समय बच रहा है.
क्योंकि बैंक खाते में जमा पैसे दिखाई देते हैं, लेकिन परिवार के साथ बिताया रविवार, बिना ऑफिस की चिंता के ली गई नींद और अपनी पसंद का काम करने के लिए मिला समय किसी वेतन पर्ची में नहीं दिखता. आखिरकार नौकरी हमारी जिंदगी का हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं.