जरा सोचिए, आप सुबह घर से निकलें और अचानक आसमान से पानी की जगह मछलियां गिरने लगें. अमेरिका के लुइसियाना में करीब 79 साल पहले कुछ ऐसा ही अजीब नजारा देखने को मिला था. सड़क, घरों के आंगन और आसपास का इलाका मछलियों से भर गया था. सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि वहां मौजूद एक मछली विशेषज्ञ ने इस पूरी घटना को अपनी आंखों से देखा और मछलियों के नमूने भी इकट्ठे किए.
यह घटना 23 अक्टूबर 1947 को लुइसियाना के मार्क्सविल में हुई थी. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस दोनों ने इस घटना का उल्लेख किया है.
नाश्ता कर रहे थे वैज्ञानिक, तभी मिली अजीब खबर
उस सुबह डॉ. अलेक्जेंडर दिमित्रिविच बाजकोव अपनी पत्नी वर्जीनिया के साथ मार्क्सविल के एक डाइनर में नाश्ता कर रहे थे. तभी वहां काम करने वाली एक वेट्रेस ने उन्हें बताया कि बाहर मछलियां गिर रही हैं.
बाजकोव कोई आम राहगीर नहीं थे. वह मीठे पानी की मछलियों के विशेषज्ञ थे और इलाके में फील्डवर्क के लिए पहुंचे थे. खबर सुनते ही वह अपनी पत्नी के साथ बाहर निकले.बाहर का नजारा देखकर वह भी हैरान रह गए.
मेन स्ट्रीट पर हर तरफ बिखरी थीं मछलियां
बाजकोव ने देखा कि मार्क्सविल की मेन स्ट्रीट और आसपास के इलाके में बड़ी संख्या में मछलियां पड़ी थीं. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के मुताबिक, मछलियां करीब 1,000 फीट लंबे और 80 फीट चौड़े इलाके में बिखरी थीं.
बाजकोव ने अनुमान लगाया कि करीब हर वर्ग गज में एक मछली पड़ी थी. घटना की पुष्टि कई स्थानीय लोगों ने भी की. एक स्थानीय बैंक डायरेक्टर ने अपने घर के आंगन में मछलियां मिलने की बात बताई. वहीं दो दुकानदारों ने कहा कि सड़क पर चलते समय गिरती हुई मछलियां उनसे आकर टकराई थीं.
कौन-कौन सी मछलियां मिलीं?
बाजकोव ने मौके से कई मछलियों के नमूने इकट्ठे किए. इनमें मीठे पानी में पाई जाने वाली कई प्रजातियां शामिल थीं.इनमें बास, सनफिश, मिनोज और हिकॉरी शैड जैसी मछलियां शामिल थीं. सबसे बड़ी मछली लार्जमाउथ बास थी, जिसकी लंबाई करीब 24 सेंटीमीटर थी.
दिलचस्प बात यह है कि बाजकोव ने मछलियों को काफी ताजा बताया था. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के मुताबिक, उन्होंने इन्हें इंसानों के खाने के लिए भी उपयुक्त माना था.
आखिर आसमान से मछलियां आईं कहां से?
अब सबसे बड़ा सवाल- आखिर मछलियां आसमान तक पहुंचीं कैसे? इसका एक संभावित वैज्ञानिक जवाब वॉटरस्पाउट हो सकता है. यह पानी के ऊपर बनने वाला घूमता हुआ तेज हवा का स्तंभ होता है, जो बवंडर जैसा दिखाई दे सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे तेज हवा के प्रवाह उथले पानी से छोटी मछलियों को ऊपर उठा सकते हैं. इसके बाद हवा उन्हें कुछ दूरी तक ले जा सकती है और फिर मछलियां जमीन पर गिर सकती हैं.
क्या मार्क्सविल में भी वॉटरस्पाउट बना था?
यहां कहानी थोड़ी और दिलचस्प हो जाती है.23 अक्टूबर 1947 के आधिकारिक मौसम रिकॉर्ड में उस दिन किसी तूफान या बवंडर का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं था. लेकिन बाजकोव और उनके साथी शोधकर्ता डॉ. जेम्स गोवानलॉच ने घटना से एक दिन पहले आसपास के दलदली इलाके में कई वॉटरस्पाउट और धूल भरे बवंडर देखे थे.
इसी आधार पर बाजकोव ने अनुमान लगाया कि संभव है कि किसी वॉटरस्पाउट ने आसपास के उथले पानी से मछलियों को हवा में उठा लिया हो और फिर उन्हें मार्क्सविल में गिरा दिया हो.हालांकि, यह घटना की संभावित व्याख्या है, अंतिम रूप से साबित कारण नहीं.
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आसमान से सिर्फ मछलियां ही नहीं गिरतीं
ऐसी घटनाएं सिर्फ 1947 के मार्क्सविल तक सीमित नहीं हैं. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इतिहास में आसमान से मछलियां गिरने की दर्जनों घटनाएं सामने आ चुकी हैं.इक्थियोलॉजिस्ट ई. डब्ल्यू. गडगर ने 1946 में ऐसी 78 दर्ज घटनाओं की समीक्षा की थी.
लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस भी बताता है कि इतिहास में मछलियों और मेंढकों के आसमान से गिरने की कई प्रत्यक्षदर्शी रिपोर्ट मौजूद हैं. हालांकि, हर मामले को वैज्ञानिक रूप से साबित मानना उचित नहीं है.
1947 की इस घटना में क्या सच था?
मार्क्सविल की घटना को लेकर सबसे मजबूत बात यह है कि यह सिर्फ किसी सोशल मीडिया पोस्ट की कहानी नहीं है. वहां मौजूद मछली विशेषज्ञ डॉ. बाजकोव ने खुद मछलियां इकट्ठी की थीं और घटना का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार किया था. बाद में लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स जैसे स्रोतों ने भी इस मामले को दर्ज किया.
इसलिए 'आसमान से मछलियां गिरने' की घटना दर्ज और दस्तावेजीकृत है, लेकिन उन्हें वास्तव में हवा में किसने उठाया और किस मौसम संबंधी घटना की वजह से ऐसा हुआ, यह आज भी पूरी तरह निश्चित नहीं है.