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निहंग

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निहंग (Nihang), जिन्हें अकाली या दल खालसा के नाम से भी जाना जाता है, सिख धर्म का एक पारंपरिक योद्धा समुदाय है. इनकी शुरुआत भारतीय उपमहाद्वीप में हुई थी. इतिहास में निहंगों का नाम खासतौर पर मुगल काल के दौरान उनकी युद्ध शैली और सैन्य भूमिका के लिए दर्ज है. उस समय वे सिखों की लड़ाकू टुकड़ियों का महत्वपूर्ण हिस्सा थे और कई युद्धों में शामिल रहे.

सिख साम्राज्य के दौर में निहंग अनियमित गुरिल्ला दस्तों के रूप में भी कार्य करते थे. बाद में ब्रिटिश शासन के समय पंजाब में उनका प्रभाव कम होने लगा. 1901 की जनगणना के अनुसार, उस समय निहंगों की संख्या एक हजार से भी कम दर्ज की गई थी. हालांकि, हाल के वर्षों में निहंग समुदाय की संख्या और सक्रियता में फिर से वृद्धि देखने को मिली है.

निहंगों की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग मत हैं. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इसकी शुरुआत फतेह सिंह और उनकी पारंपरिक वेशभूषा से हुई, जबकि कुछ के अनुसार इसकी जड़ें गुरु हरगोबिंद द्वारा स्थापित अकाल सेना से जुड़ी हैं. वहीं, निहंग स्वयं को गुरु गोबिंद सिंह की खालसा परंपरा का प्रतिनिधि मानते हैं.

'निहंग' शब्द की उत्पत्ति को लेकर भी अलग-अलग राय है. एक मत के अनुसार यह फारसी भाषा के उस शब्द से निकला है, जिसका अर्थ एक पौराणिक समुद्री जीव या मगरमच्छ माना जाता है. वहीं, कुछ सिख इतिहासकारों का कहना है कि इसका अर्थ निर्भीक और निडर व्यक्ति है. गुरबाणी में भी 'निहंग' शब्द का प्रयोग बेफिक्र और निर्भय व्यक्ति के अर्थ में मिलता है.

'अकाली' शब्द का अर्थ है अकाल (ईश्वर) से जुड़ा हुआ या काल से परे. यह शब्द गुरु नानक देव द्वारा प्रयुक्त "अकाल मूरत" से जुड़ा माना जाता है. गुरु गोबिंद सिंह के समय से इसका उपयोग अधिक प्रचलित हुआ और बाद में यह सिख इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.

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