दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच स्मार्ट ग्लासेज की रील्स और फोटोज वायरल हो रही हैं. सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी स्मार्ट ग्लास पहनकर प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग करते दिखाई दिए. CJP और स्टूडेंट प्रोटेस्ट हर दिन बड़ा होता जा रहा है और देश भर के कई राज्यों में ये आंदोलन शुरू हो गया है.
इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या दिल्ली पुलिस अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वाले स्मार्ट ग्लासेज और फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है. इसी को लेकर प्राइवेसी और निगरानी पर नई बहस शुरू हो गई है.
दिल्ली हाई कोर्ट में भी इस मामले को लेकर एक याचिका दायर की गई है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की लगातार फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग की जा रही है.
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इसमें यह भी कहा गया कि प्रदर्शन खत्म होने के बाद भी लोगों की ऐक्टिविटीज पर नजर रखी जा रही थी. हालांकि दिल्ली पुलिस ने अदालत में कहा कि विरोध प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए की जाती है और इसे निगरानी कहना सही नहीं है. अदालत ने इस मामले में पुलिस से प्रक्रिया और नियमों को लेकर सवाल पूछे हैं.
सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों में कुछ पुलिसकर्मी Meta Ray-Ban स्मार्ट ग्लासेज पहने हुए दिख रहे हैं. इससे पहले जनवरी 2026 में दिल्ली पुलिस ने गणतंत्र दिवस की सुरक्षा के लिए AI बेस्ड स्मार्ट ग्लास इस्तेमाल करने की जानकारी दी थी.
हालांकि उस समय बताया गया था कि ये डिवाइस भारतीय कंपनी AjnaLens ने तैयार किए हैं. इनमें फेस रिकॉग्निशन, वीडियो एनालिटिक्स और थर्मल इमेजिंग जैसी सुविधाएं हैं.
इन स्मार्ट ग्लास का काम आसपास मौजूद लोगों के चेहरे स्कैन करना है. अगर किसी चेहरे का मिलान पुलिस के डेटाबेस में मौजूद रिकॉर्ड से होता है, तो पुलिसकर्मी के फोन पर तुरंत अलर्ट आ सकता है. इस तरह पुलिस भीड़ में चलते हुए भी संदिग्ध लोगों की पहचान करने की कोशिश कर सकती है.
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दिल्ली पुलिस पिछले कुछ समय से AI बेस्ड सर्विलांस सिस्टम को तेजी से बढ़ा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली में हजारों CCTV कैमरे एक बड़े नेटवर्क से जुड़े हैं.
इनमें कई AI फीचर भी हैं, जैसे फेस डिटेक्शन, नंबर प्लेट पहचानना और भीड़ का विश्लेषण करना. हाल ही में प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा की जांच में भी पुलिस ने AI कैमरों की रिकॉर्डिंग और फेस रिकॉग्निशन तकनीक का इस्तेमाल कर संदिग्धों की पहचान करने की बात कही है.
यहीं से प्राइवेसी पर सवाल उठ रहे हैं. डिजिटल अधिकारों से जुड़े कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत में अभी ऐसा कोई अलग कानून नहीं है, जो सार्वजनिक जगहों पर फेस रिकॉग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को साफ तौर पर कंट्रोल करता हो.
उनका कहना है कि लोगों को यह भी पता नहीं चलता कि उनका डेटा कैसे इस्तेमाल हो रहा है और कितने समय तक रखा जाएगा. दूसरी तरफ पुलिस का कहना है कि ऐसी टेक्नोलॉजी अपराध रोकने और जांच को तेज करने में मदद करती है.