गुवाहाटी में बुधवार को क्रिकेट हुआ या बल्लेबाजों का खुला दरबार लगा, यह बहस मैच खत्म होने के बाद भी चलती रहेगी. वेस्टइंडीज ने 405 रन ठोके तो लगा कि उसने पहाड़ खड़ा कर दिया है, लेकिन भारत ने उस पहाड़ को ऐसे ढहा दिया, जैसे सामने कोई लक्ष्य नहीं, नेट्स का स्कोर हो.
406 रनों का ऐतिहासिक रन चेज भारत ने दादागीरी वाले अंदाज में सिर्फ 43.3 ओवरों में पूरा कर लिया, 39 गेंद बाकी रहते 8 विकेट से जीत दर्ज की. मगर 811 रनों के इस रन-महोत्सव के बीच एक सवाल दबना नहीं चाहिए- क्या यह बल्लेबाजों की महानता थी या गेंदबाजों के खिलाफ पिच की खुली बगावत?
वेस्टइंडीज का 405/7 उसका वनडे इतिहास का सबसे बड़ा स्कोर था. लेकिन जिस स्कोर को किसी दौर में मैच जिताने की गारंटी माना जाता, वह गुवाहाटी में बचाव के लिए नाकाफी साबित हुआ. इससे बड़ा सवाल शायद कोई नहीं हो सकता- अगर 405 रन भी सुरक्षित नहीं हैं, तो गेंदबाज के पास आखिर बचता क्या है?
शुभमन गिल और रोहित शर्मा ने इसका जवाब बल्ले से दिया. गिल ने 133 गेंदों में नाबाद 233 रन ठोके- 26 चौके, 8 छक्के और वनडे का सबसे तेज दोहरा शतक. रोहित ने 75 गेंदों में 101 रन उड़ाए, जिसमें 10 चौके और 6 छक्के शामिल रहे. दोनों ने पहले विकेट के लिए 255 रन जोड़कर वेस्टइंडीज के गेंदबाजी आक्रमण की कमर तोड़ दी.
गिल और रोहित की बल्लेबाजी की चमक पर सवाल नहीं है. 233 और 101 रन किसी भी पिच पर बड़ी पारियां हैं. लेकिन इस मुकाबले की तस्वीर सिर्फ बल्लेबाजों के कौशल से पूरी नहीं होती. उसके फ्रेम में पिच को भी रखना होगा.
गुवाहाटी में गेंद को हवा से खास मदद नहीं मिली. पिच से सीम गायब थी और बल्लेबाज को असहज करने वाला उछाल भी नहीं था. गेंद बल्ले तक आती रही और बल्लेबाज उसे अपनी मर्जी से खेलते रहे. ऐसे में गेंदबाज की गलती की कीमत बढ़ जाती है और बल्लेबाज के लिए आक्रमण के रास्ते खुल जाते हैं.
नतीजा- एक टीम ने 405 बनाए और दूसरी ने 406. दोनों पारियों के बीच मुकाबले की जगह मानो एक ही सवाल था कि कौन ज्यादा तेजी से रन बनाएगा.
गंभीर ने चमक के पीछे छिपी समस्या पकड़ी
811 रन के इस आंकड़े को आसानी से वनडे क्रिकेट का उत्सव बताकर आगे बढ़ा जा सकता था. लेकिन भारत के हेड कोच गौतम गंभीर ने इसी चमकदार तस्वीर में गेंदबाजों की बेबसी देखी.
सीरीज जीतने के बाद ब्रॉडकास्टर से बात करते हुए गंभीर ने कहा कि बल्ले और गेंद के बीच ज्यादा मुकाबला होना चाहिए. उनका कहना था, 'यह क्रिकेट नहीं है, यह सिर्फ बल्लेबाजी है.'
गंभीर ने युवा गेंदबाजों की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी पिच पर कोई युवा गेंदबाज क्या कर सकता है, जहां विपक्षी टीम 400 रन बना दे और फिर उसकी अपनी टीम भी 400 का पीछा कर ले. रिकॉर्ड, दर्शकों और ब्रॉडकास्टर के नजरिए से ऐसा मैच शानदार हो सकता है, लेकिन एक क्रिकेट फैन और कोच के तौर पर गेंदबाजों के प्रति भी सहानुभूति होनी चाहिए.
यही बात इस पूरे मुकाबले को महज रन-महोत्सव से आगे ले जाती है.
बल्लेबाजों के लिए यह स्वर्ग हो सकता है, लेकिन क्रिकेट में गेंदबाज सिर्फ संख्या पूरी करने के लिए नहीं होता. उसे हवा से कुछ मिले, पिच से कुछ मिले, उछाल में थोड़ा धोखा मिले या बल्लेबाज को अपनी तकनीक पर दोबारा सोचने की मजबूरी आए- यही तो बल्ले और गेंद की टक्कर है.
जब ये सारे सवाल पिच से गायब हो जाएं, तो जवाब देना बल्लेबाज का काम रह जाता है. गिल और रोहित ने वही किया. और ऐसी परिस्थितियों में दुनिया का कोई भी शीर्ष बल्लेबाज कुछ समय के लिए ब्रैडमैन का अवतार नजर आ सकता है.
यहां ब्रैडमैन का जिक्र किसी की महानता तय करने के लिए नहीं, बल्कि उस असंतुलन को समझाने के लिए है जिसमें बल्लेबाज के पास विकल्पों की भरमार हो और गेंदबाज के पास हथियार सीमित.
400 का आंकड़ा, जो अब डराता नहीं
वनडे क्रिकेट में 400 का आंकड़ा कभी असाधारण माना जाता था. गुवाहाटी में वही आंकड़ा दोनों टीमों ने पार कर दिया. फर्क सिर्फ इतना रहा कि वेस्टइंडीज 405 तक पहुंचकर रुका और भारत 406 तक जाकर भी 39 गेंद बचा गया.
इसका मतलब यह नहीं कि हर 400 पार का स्कोर पिच की वजह से है या हर बड़ी बल्लेबाजी पारी को सिर्फ विकेट का उपहार मान लिया जाए. गिल की 233 और रोहित की 101 में उनका कौशल, आक्रामकता और शॉट चयन भी शामिल है. लेकिन जब एक ही मैच में दोनों टीमें 400 पार कर जाएं, तो पिच की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
गंभीर ने वही सवाल उठाया है- रिकॉर्ड चाहिए, लेकिन मुकाबले की कीमत पर नहीं.
भारत ने सीरीज 2-0 से अपने नाम कर ली. गिल ने रिकॉर्ड बुक में अपना नाम लिख दिया, रोहित ने शतक के साथ अपनी छाप छोड़ी और 406 का रन चेज इतिहास में दर्ज हो गया.
लेकिन गुवाहाटी की असली बहस स्कोरबोर्ड से बाहर है. क्रिकेट में बल्लेबाज को रन बनाने का मौका मिलना चाहिए, लेकिन गेंदबाज को विकेट लेने का मौका भी मिलना चाहिए. वरना 400 रन का पहाड़ भी पाटा पिच पर रेत की दीवार साबित होगा.
गिल की 233 रनों की पारी शानदार थी, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन सवाल यह भी है कि उन्हें रोकने के लिए गेंदबाजों के पास कितना मौका था. जब पिच से गेंदबाजों को स्विंग, सीम या उछाल की मदद ही न मिले, तो बल्लेबाज के लिए रन बनाना काफी आसान हो जाता है. ऐसे में गिल की पारी के साथ पिच और गेंदबाजों की मजबूरी पर बात करना भी जरूरी है.