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सुनीता नारायण का बड़ा बयान- ‘यमुना मर चुकी है, बस अंतिम संस्कार बाकी है’, नेपाल त्रासदी पर भी चेताया

यमुना की हालत पर सुनीता नारायण की दो टूक बात ने सबका ध्यान खींचा. लेकिन उनका संदेश सिर्फ दिल्ली की नदी तक सीमित नहीं था.उन्होंने विकास के उस मॉडल पर सवाल उठाया, जो प्रकृति की कीमत पर आगे बढ़ रहा है.

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सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की महानिदेशक सुनिता नारायण ने एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण संबंधी कई चेतावनी दी. (Photo: ITG)
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की महानिदेशक सुनिता नारायण ने एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण संबंधी कई चेतावनी दी. (Photo: ITG)

नई दिल्ली, 2 सितंबर. जलवायु संकट अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि हमारे सामने खड़ी हकीकत है. नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ से लेकर भारत में बढ़ती गर्मी, अचानक होने वाली भारी बारिश और दिल्ली की जहरीली हवा तक, पर्यावरण में हो रहे बदलावों का असर साफ दिखाई दे रहा है. ऐसे समय में सिर्फ लोगों को पर्यावरण के बारे में जागरूक करना काफी नहीं है, बल्कि शिक्षा को सीधे कार्रवाई से जोड़ना होगा.

इसी सोच के साथ नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में बुधवार को 8वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन (ICSE) 2026 की शुरुआत हुई. मोबियस फाउंडेशन की ओर से आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन का इस साल का विषय ‘Sustainability Education for Transformative Action’ है. सम्मेलन में पर्यावरण, शिक्षा, जलवायु, उद्योग और युवाओं से जुड़े विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अब पर्यावरण शिक्षा को सिर्फ किताबों और जागरूकता अभियानों तक सीमित रखने का समय नहीं है.

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‘प्रकृति कह रही है अब बहुत हो चुका’

सम्मेलन में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की महानिदेशक और पद्मश्री से सम्मानित सुनीता नारायण ने नेपाल की हालिया त्रासदी का जिक्र करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन से इनकार करना अब वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है उन्होंने हिमालयी इलाकों में लगातार हो रहे निर्माण, सड़क और हाइड्रोपावर परियोजनाओं पर सवाल उठाए. उनका कहना था कि इंसान को यह भ्रम छोड़ना होगा कि वह नदियों और पहाड़ों को अपनी सुविधा के हिसाब से फिर से बना सकता है.

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सुनीता नारायण ने कहा कि भारत में एकस्ट्रीम वेदर की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. उन्होंने दिल्ली की हवा और यमुना की हालत का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, यमुना में दिल्ली में प्रवेश के समय घुली ऑक्सीजन का स्तर करीब 6 है, जो ISBT तक पहुंचते-पहुंचते शून्य हो जाता है. उन्होंने इसे भावनात्मक बयान नहीं, बल्कि विज्ञान का आंकड़ा बताते हुए कहा कि ‘यमुना मर चुकी है, बस उसका अंतिम संस्कार होना बाकी है.’ उन्होंने कहा कि दिल्ली का प्रदूषण केवल इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संख्या बढ़ाने से खत्म नहीं होगा. इसके लिए लोगों को कार पर निर्भर रहने की जरूरत ही न पड़े, ऐसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तैयार करनी होगी.

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‘सस्टेनेबिलिटी सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं’

मोबियस फाउंडेशन की प्रेसिडेंट और सीईओ प्रियंका शर्मा ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी को अब सिर्फ पर्यावरण से जोड़कर देखने का समय बीत चुका है. यह इस बात से जुड़ा सवाल है कि हम कैसे रहते हैं, कैसे सीखते हैं, कैसे काम करते हैं और किस तरह की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली चाहते हैं. इस साल सम्मेलन में ग्रीन जॉब्स, क्रिटिकल मिनरल्स, ई-वेस्ट और बैटरी रीसाइक्लिंग, टिकाऊ कृषि जैसे मुद्दों को भी चर्चा के केंद्र में रखा गया है.

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‘पर्यावरण शिक्षा को जागरूकता से आगे ले जाना होगा’

सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (CEE) के फाउंडर डायरेक्टर और पद्मश्री से सम्मानित कार्तिकेय साराभाई ने कहा कि पर्यावरण शिक्षा का अगला चरण सिर्फ जागरूकता पैदा करना नहीं, बल्कि लोगों को कार्रवाई के लिए तैयार करना है. उन्होंने पर्यावरण, गरीबी, विकास और हमारी जीवनशैली के बीच संबंध को समझने और बच्चों में सवाल पूछने व आलोचनात्मक सोच विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने स्कूलों और संस्थानों को अपने आसपास के क्षेत्र में टिकाऊ विकास के मॉडल तैयार करने से जोड़ने का विचार भी रखा, ताकि पर्यावरण शिक्षा का असर जमीन पर दिखाई दे.

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‘हमारी पीढ़ी ने संसाधनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया’

TERI की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने छात्रों से बात करते हुए कहा कि उनकी पीढ़ी ने प्राकृतिक संसाधनों का जिस तरह इस्तेमाल किया, उसकी कीमत आज की युवा पीढ़ी को चुकानी पड़ रही है. उन्होंने रोजमर्रा की बदलती आदतों का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लोग पानी की बोतल खरीदने के बजाय घर से पानी लेकर चलते थे या रास्ते में अपनी बोतल भर लेते थे, लेकिन अब बोतलबंद पानी सामान्य आदत बन गया है. उन्होंने स्कूलों में महंगी बस फीस और निजी कारों के बढ़ते इस्तेमाल को भी पर्यावरण से जुड़ा बड़ा सवाल बताया.

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‘सस्टेनेबिलिटी की पढ़ाई एक ही विषय से नहीं हो सकती’

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. राधिका खोसला ने कहा कि जलवायु और सस्टेनेबिलिटी से जुड़े सवालों को किसी एक विषय के नजरिए से समझना या हल करना मुमकिन नहीं है. इसके लिए अलग-अलग विषयों को साथ लाने के साथ नेतृत्व, संवाद और व्यावहारिक सोच जैसे कौशल भी जरूरी हैं. उन्होंने कहा कि छात्रों को सिर्फ सफल लोगों की कहानियां सुनाना पर्याप्त नहीं है. अनुभवी लोगों की असफलताओं से सीखना भी उतना ही जरूरी है.

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‘जलवायु संकट बच्चों के भविष्य को बदल रहा है’

UNICEF के  Bo Beiskjaer ने भारत में बच्चों पर जलवायु संकट के असर की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि भारत में 47 करोड़ से ज्यादा बच्चे हैं और UNICEF के अनुमान के मुताबिक इनमें से करीब 55 फीसदी बच्चे गर्मी, पानी की कमी और बाढ़ जैसे कई जलवायु जोखिमों का एक साथ सामना कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों को बदलते मौसम के हिसाब से सुरक्षित स्कूल, पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना अब जरूरी हो गया है.

‘उम्मीद हो, लेकिन झूठी नहीं’

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. भास्कर वीरा ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी की शिक्षा में न तो लोगों को डर से भरना चाहिए और न ही ऐसी झूठी उम्मीद देनी चाहिए कि सिर्फ तकनीक हर समस्या का समाधान कर देगी. उन्होंने कहा कि छात्रों को सिर्फ पर्यावरण के बारे में जानकारी देना काफी नहीं है. उन्हें नागरिक के तौर पर बदलाव लाने और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता भी देनी होगी.

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‘अब पर्यावरण की बात हाशिये पर नहीं’

WWF-India के सेक्रेटरी जनरल और CEO रवि सिंह ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण को लेकर बातचीत काफी बदली है. कभी जो विषय स्कूलों और कुछ पर्यावरण समूहों तक सीमित था, वह अब उद्योग और कॉरपोरेट रणनीति का भी हिस्सा बन चुका है. उन्होंने WWF के पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि इन कार्यक्रमों से जुड़े कई छात्र आज सरकार, कंपनियों और दूसरी संस्थाओं में जिम्मेदार पदों पर हैं.

‘जागरूकता से कार्रवाई तक’

मोबियस फाउंडेशन के चेयरमैन प्रदीप बर्मन ने कहा कि भारत ने गैर-जीवाश्म स्रोतों से बिजली उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है और देश की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 290 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है. लेकिन उन्होंने यह भी माना कि जलवायु से जुड़े वादों और जमीन पर उनके अमल के बीच अभी बड़ा अंतर है. उन्होंने कहा कि ICSE का उद्देश्य ऐसे विचार सामने लाना है जो साझेदारी में बदलें, साझेदारियां ठोस प्रतिबद्धताओं में बदलें और अंत में जमीन पर कार्रवाई दिखाई दे.

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दो दिन चलने वाले ICSE 2026 में जलवायु कार्रवाई, ग्रीन स्किल्स, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन, जैव विविधता, टिकाऊ आजीविका और युवाओं की भूमिका जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी. सम्मेलन में देशभर से छात्र और युवा क्लाइमेट लीडर्स भी हिस्सा ले रहे हैं.

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