scorecardresearch
 

55 सीसीटीवी फुटेज और ब्लैक SUV बताएंगे, कहां से आए पांच ओरंगुटान?

ओडिशा के बालासोर जिले में पांच शिशु ओरंगुटान बरामद होने के रहस्यमय मामले में STF और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो जांच तेज कर रहे हैं. काली एसयूवी और 55 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज पर फोकस है.

Advertisement
X
ओडिशा के बालासोर जिले के बिछित्रपुर जंगल में मिले थे पांच ओरंगुटान. (File Photo: PTI)
ओडिशा के बालासोर जिले के बिछित्रपुर जंगल में मिले थे पांच ओरंगुटान. (File Photo: PTI)

ओडिशा के बालासोर जिले के बिछित्रपुर जंगल में मंगलवार सुबह पांच शिशु ओरंगुटान बरामद होने की घटना ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है. ये जानवर भारत के मूल निवासी नहीं हैं. यहां कानूनी रूप से पाले या पैदा भी नहीं किए जा सकते. इसलिए उनकी अचानक मौजूदगी ने वन विभाग, पुलिस की विशेष टास्क फोर्स (STF) और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) को चौंका दिया है. जांच एजेंसियां अब इस रहस्य को सुलझाने में जुटी हुई हैं कि ये ओरंगुटान यहां कैसे पहुंचे और उन्हें किसने जंगल में छोड़ दिया.

काली एसयूवी पर केंद्रित जांच

जांच का सबसे महत्वपूर्ण सुराग एक काली एसयूवी से जुड़ा है. ग्रामीणों ने बताया कि सोमवार रात बादापाही गांव के आसपास एक काली एसयूवी देखी गई थी. वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश राम सिंह खुंटिया ने भी इसकी पुष्टि की. सीसीटीवी फुटेज में रात करीब 11:25 बजे इस वाहन का ऊपरी हिस्सा कैद हुआ है, लेकिन नंबर प्लेट साफ नजर नहीं आई. 

यह भी पढ़ें: भारत में नहीं मिलते ओरंगुटान, फिर ओडिशा के जंगल में कैसे पहुंचे 5 बच्चे? 4000 KM दूर है इनका असली घर

एसटीएफ ने भोगराई और पश्चिम बंगाल के दीघा इलाके में लगे 55 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की है. अभी तक कोई ठोस सफलता नहीं मिली है, लेकिन अधिकारी मानते हैं कि इस एसयूवी की पहचान हो गई तो पूरा मामला खुल सकता है.

Advertisement

जांचकर्ता यह भी देख रहे हैं कि वाहन किस रास्ते से आया और कहां गया. वन विभाग ने बिछित्रपुर जंगल में आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी है ताकि कोई सबूत नष्ट न हो. पुलिस को जंगल के पास एक काली पॉलीथीन थैली में फेस मास्क भी मिले हैं. 

Odisha orangutan rescue

अधिकारियों को शक है कि इन मास्क का इस्तेमाल उन लोगों ने किया होगा जिन्होंने ओरंगुटान को जंगल में छोड़ा. स्थानीय लोगों ने इन मास्क से अपना कोई संबंध होने से इनकार किया है.

तस्करी का संभावित रास्ता और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन

सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व के निदेशक और क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक प्रकाश चंद्र गोगिनेनी ने कहा कि सबूत बताते हैं कि ये जानवर पश्चिम बंगाल की तरफ से दीघा-चांदनेश्वर और भोगराई रूट से लाए गए होंगे. तस्करों ने नेशनल हाईवे की बजाय अंदरूनी गांव की सड़कों का इस्तेमाल किया ताकि पकड़े जाने का खतरा कम रहे. एसटीएफ ने पश्चिम बंगाल के कालाघाट टोल प्लाजा सहित ग्रामीण सड़कों के सीसीटीवी भी चेक किए हैं.

ओरंगुटान इंडोनेशिया या म्यांमार जैसे देशों से आते हैं. गोगिनेनी के अनुसार, इन्हें म्यांमार से पूर्वोत्तर भारत होकर पूर्वी भारत में लाया गया हो सकता है. अगर ये इंडोनेशिया से आए हैं तो अंतरराष्ट्रीय गिरोह जरूर शामिल होगा. स्थानीय स्तर पर पश्चिम बंगाल या ओडिशा में उनके एजेंट भी होंगे. 

Advertisement

यह भी पढ़ें: भारत ने बना लिए 30 नए परमाणु हथियार, बढ़ा रहा अपना न्यूक्लियर शील्ड!

अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक ओरंगुटान की कीमत 20 से 25 लाख रुपये बताई जाती है. यही वजह है कि इतने महंगे जानवरों को भारत लाकर छोड़ने के पीछे बड़ा नेटवर्क होने का अनुमान है. एसटीएफ ने मरीन पुलिस स्टेशन का भी दौरा किया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या जानवर पानी के रास्ते जहाज या मछली पकड़ने वाले ट्रॉलर से लाए गए थे. भोपाल और कोलकाता से डब्ल्यूसीसीबी की दो टीमें भी जांच में शामिल हो चुकी हैं.

मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने वन और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि तस्करी नेटवर्क को तोड़कर ओडिशा को वन्यजीव तस्करी का ट्रांजिट रूट न बनने दिया जाए. वन मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार केंद्र के साथ मिलकर सख्त कार्रवाई करेगी. भोगराई विधायक और बीजेडी नेता गौतम बुद्ध दास ने मांग की है कि सरकार इंटरपोल की मदद ले क्योंकि मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो सकता है.

Odisha orangutan rescue

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला

यह घटना सिर्फ पांच जानवरों की बरामदगी नहीं है. यह भारत में वन्यजीव तस्करी के बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करती है. ओरंगुटान जैसे दुर्लभ जानवरों की तस्करी आमतौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया से होती है. भारत का पूर्वोत्तर तथा पूर्वी तटीय इलाका ट्रांजिट पॉइंट बन जाता है. 

Advertisement

काली एसयूवी, फेस मास्क, अंदरूनी सड़कों का इस्तेमाल और पानी के रास्ते की संभावना- ये सब पेशेवर तस्करों के काम करने के तरीके को दर्शाते हैं. अगर एसयूवी की पहचान हो गई और उसके मालिक या यात्रियों का पता चल गया तो स्थानीय सहयोगियों तक पहुंच बन सकती है. इससे पूरे नेटवर्क को तोड़ने में मदद मिलेगी.

यह भी पढ़ें: एक बाढ़ ने बदल दिया नेपाल! 15 दिन बाद दिखी तबाही की असली तस्वीर

जांच एजेंसियों के लिए चुनौती यह है कि सीसीटीवी में नंबर प्लेट साफ नहीं दिखी और वाहन की पूरी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है. ग्रामीण इलाकों में सीमित निगरानी और अंतरराज्यीय सीमाएं जांच को और जटिल बनाती हैं. फिर भी 55 कैमरों की फुटेज जांच और डब्ल्यूसीसीबी की भागीदारी से उम्मीद जगी है कि जल्द कोई बड़ा खुलासा हो सकता है.

यह मामला याद दिलाता है कि वन्यजीव संरक्षण सिर्फ जंगलों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. सीमा पार तस्करी, स्थानीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय मांग- इन सब पर नकेल कसनी होगी. ओडिशा सरकार और केंद्र को मिलकर सख्त निगरानी व्यवस्था बनानी होगी ताकि ऐसे जानवर दोबारा न लाए जा सकें. फिलहाल पूरा ध्यान काली एसयूवी और उसके पीछे के लोगों पर है. अगर यह सुराग मिल गया तो रहस्यमयी ओरंगुटान कांड का पर्दाफाश हो सकता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement