साल 2024 में आए विनाशकारी भूस्खलन के घाव अभी पूरी तरह भरे भी नहीं थे कि केरल का खूबसूरत पर्वतीय जिला वायनाड एक बार फिर मलबे और चीख-पुकार के नीचे दब गया है. पिछले 24 घंटों में इस इलाके में रिकॉर्ड 265 मिलीमीटर की मूसलाधार बारिश दर्ज की गई है, जिसके बाद मेप्पाडी के पास कल्लाडी में निर्माणाधीन जुड़वां सुरंग परियोजना (अनाक्कमपोयिल-कल्लाडी-मेप्पाडी) पर एक और भीषण भूस्खलन हुआ.
इस आपदा ने न केवल तीन जिंदगियों को लील लिया और कई लोगों को मलबे में दफन कर दिया, बल्कि विकास की अंधी दौड़ और प्रशासनिक अनदेखी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. स्थानीय लोगों के लिए यह हादसा 2024 की मुंडक्कई और चूरलमाला की उस भयावह त्रासदी की यादें ताजा कर गया, जिसने सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. सवाल यह उठता है कि क्या यह महज एक प्राकृतिक आपदा है या फिर इंसान की पुरानी गलतियों और लापरवाही का नतीजा?
यह भी पढ़ें: हर्षिल फिर खतरे में! भागीरथी का बढ़ता जलस्तर, धराली में दोबारा झील बनने की आशंका
'ग्रे राइनो' घटना: चेतावनी को जानबूझकर नजरअंदाज करने का नतीजा
विशेषज्ञों का मानना है कि वायनाड में बार-बार होने वाले ये भूस्खलन अचानक और अप्रत्याशित आने वाली 'ब्लैक स्वान' घटना नहीं हैं, बल्कि ये 'ग्रे राइनो'घटना हैं. 'ग्रे राइनो' उन खतरों को कहा जाता है जो अधिक संभावित होते हैं. साफ दिखाई देते हैं, लेकिन फिर भी लोग और सरकारें उन्हें नजरअंदाज करते हैं.
धराली फ्लैश फ्लड और वायनाड लैंडस्लाइड में अंतर
उत्तराखंड के धराली में आई फ्लैश फ्लड और केरल के वायनाड में हुए लैंडस्लाइड में प्रकृति और कारण दोनों अलग-अलग हैं. दोनों ही आपदाएं भारी बारिश से जुड़ी हैं, लेकिन इनके तबाही लाने का तरीका और असर अलग-अलग है.
फ्लैश फ्लड क्या है?
धराली में हुई फ्लैश फ्लड अचानक और तेज गति से आने वाला पानी का बाढ़ है. यह आमतौर पर छोटी नदियों या नालों में बहुत कम समय में भारी बारिश (जैसे 100-200 मिमी प्रति घंटा) होने से होता है. हिमालय क्षेत्र में फ्लैश फ्लड अक्सर ग्लेशियर झील फटने (GLOF) या बादलों के फटने से होते हैं.
यहां नीचे देखिए पिछले साल धराली में आए फ्लैश फ्लड का Video
भारतीय मौसम विभाग और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की रिपोर्ट्स में कहा गया है कि हिमालय की खड़ी ढलानों और कमजोर मिट्टी के कारण पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है, जिससे अचानक बाढ़ आ जाती है.
यह भी पढ़ें: अमेरिका में पहली बार दिखा खौफ, चीन की JL-3 मिसाइल ने क्यों मचाया हड़कंप?
लैंडस्लाइड क्या है?
वायनाड में हुआ लैंडस्लाइड मिट्टी, चट्टान और मलबे का पहाड़ी ढलान से फिसलकर नीचे गिरना है. यह तब होता है जब भारी बारिश से मिट्टी पूरी तरह भर जाती है. यानी सैचुरेट हो जाती है. इससे उसकी मजबूती कम हो जाती है. वेस्टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल और कस्तुरीरंगन रिपोर्ट ने वायनाड जैसे इलाकों को इकोलॉजिकली सेंसिटिव जोन घोषित किया था. यहां जंगलों की कटाई, प्लांटेशन और अनियोजित निर्माण ने ढलानों को कमजोर कर दिया है.
दोनों घटनाओं में अंतर...
यह भी पढ़ें: समंदर किनारे बसे मुंबई में बारिश का पानी क्यों नहीं निकलता? बाढ़ का असली कारण क्या है?
वैज्ञानिक शोध (Journal of Earth System Science, 2023) बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण दोनों आपदाएं बढ़ रही हैं. वायनाड में पिछले 24 घंटे में 265 मिमी बारिश हुई, जिसने सैचुरेटेड मिट्टी को ढहा दिया. दोनों आपदाएं मानवीय गलतियों और जलवायु परिवर्तन का नतीजा हैं.

इकोसिस्टम से खिलवाड़, विकास ने नाम पर बलि होते जंगल
वायनाड की भौगोलिक बनावट बेहद नाजुक है, जहां की मिट्टी अत्यधिक बारिश होने पर अपनी पकड़ खो देती है. किसी समय वायनाड में 1800 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में घने जंगल थे. लेकिन पिछले कुछ दशकों में, विशेष रूप से 2018 तक, इसके दो-तिहाई हिस्से को कॉफी, चाय और इलायची के बागानों में बदल दिया गया.
पुन्नापुझा नदी के किनारे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की गई, जिससे नदी तटों की प्राकृतिक स्थिरता खत्म हो गई. जब जंगलों को साफ किया जाता है, तो पेड़ों की जड़ें जो मिट्टी को बांधकर रखती हैं, वे खत्म हो जाती हैं. मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बेहद कम हो जाती है. जब भी 265 मिमी जैसी अत्यधिक बारिश होती है, तो पानी जमीन के अंदर जाने के बजाय मिट्टी की ऊपरी परत को अपने साथ बहा ले जाता है, जो एक बड़े भूस्खलन का रूप ले लेता है.
यह भी पढ़ें: पूरा देश सूखा है, मुंबई में इतनी बारिश क्यों हो रही? क्या अल-नीनो ने बिगाड़ा मॉनसून का बैलेंस
बुनियादी ढांचे का बेतरतीब फैलाव और अवैज्ञानिक निर्माण
पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही सड़कें और सुरंगें इस तबाही को कई गुना बढ़ा रही हैं. कल्लाडी में निर्माणाधीन सुरंग परियोजना इसका ताजा उदाहरण है. यह परियोजना कोझिकोड और वायनाड के बीच यात्रा के समय को कम करने के उद्देश्य से बनाई जा रही है, जिसके तहत नाजुक पहाड़ियों के नीचे लगभग 8.11 किलोमीटर लंबी जुड़वां सुरंग खोदी जा रही है. पर्यावरणविदों ने शुरुआत से ही इस परियोजना का विरोध किया था. चेतावनी दी थी कि पश्चिमी घाट की कमजोर चट्टानों में ब्लास्टिंग और ड्रिलिंग करने से ढलानें अस्थिर हो जाएंगी.

इसके अलावा, इन परियोजनाओं के लिए काटी जाने वाली सड़कों में उचित जल निकासी (ड्रैनेज) की व्यवस्था नहीं होती. जब भारी बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से बहने के बजाय सड़कों और निर्माण स्थलों पर जमा होने लगता है, तो यह पहाड़ों के अंदर रिसकर उन्हें खोखला कर देता है. कल्लाडी में भी यही हुआ, जहां मलबे के असंतुलित डंपिंग ने पानी के रास्ते को रोक दिया और पूरी ढलान ढह गई.
क्या 2024 की त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा?
इस आपदा ने केरल सरकार और आपदा प्रबंधन तंत्र की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी है. यह इंसानों की तरफ से बनाई गई आपदा है. अधिकारियों के अनुसार, जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और कलेक्टर ने करीब दो हफ्ते पहले ही सुरंग परियोजना के ठेकेदारों को वहां जमा की गई भारी मात्रा में खोदी गई मिट्टी और मलबे को हटाने का निर्देश दिया था. लेकिन ठेकेदारों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.
यह भी पढ़ें: दिल्ली में मॉनसूनी बारिश के बाद भी फील लाइक टेंपरेंचर 49 डिग्री क्यों?
लापरवाही के मुख्य बिंदु
यदि सरकार ने 2024 के हादसे से सही मायने में सबक सीखा होता, तो संवेदनशील क्षेत्रों में चल रही सभी बड़ी बुनियादी परियोजनाओं की समीक्षा की जाती और मॉनसून से पहले ही मलबे के निपटारे को सुनिश्चित किया जाता.
A landslide at the Kalladi tunnel work site in #Wayanad blocked the road and injured 5 people. They have been taken to the hospital. No deaths have been reported. Work at the site had already been stopped because of heavy rain. The area received 265 mm of rain in the last 24… pic.twitter.com/3LrpPhR0gM
— Ashish (@KP_Aashish) July 7, 2026
पर्यटन का बढ़ता दबाव और अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां
वायनाड केवल निर्माण कार्यों से ही नहीं, बल्कि अनियंत्रित पर्यटन के बोझ से भी कराह रहा है. इन नाजुक पहाड़ियों को एडवेंचर टूरिज्म हब में बदल दिया गया है, जहां बिना किसी उचित पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के जिप लाइन राइड्स, बड़े-बड़े रिसॉर्ट्स और कंक्रीट के होमस्टे खड़े कर दिए गए हैं।
पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानों को समतल किया जा रहा है, जिससे उनकी प्राकृतिक बनावट पूरी तरह बिगड़ चुकी है. पर्यटकों के वाहनों की आवाजाही और भारी निर्माण के कारण होने वाले कंपन से ये पहाड़ियां और भी संवेदनशील हो जाती हैं.
यह भी पढ़ें: एक ब्रह्मोस मिसाइल कितने में बिकती है? इंडोनेशिया से डील क्यों अहम है
जब तक प्रकृति का सम्मान नहीं होगा, तब तक तबाही नहीं रुकेगी
वायनाड की यह दूसरी खौफनाक आपदा एक गंभीर चेतावनी है कि यदि हमने अब भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो परिणाम और भी विनाशकारी होंगे. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है, जिसके कारण कम समय में अत्यधिक बारिश (जैसे 24 घंटे में 265 मिमी) होना अब एक आम बात हो गई है. ऐसे में हमें विकास के मॉडल को बदलना होगा.
पश्चिमी घाट जैसी संवेदनशील पारिस्थितिकी प्रणालियों में बड़े निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगानी होगी. गाडगिल व कस्तूरीरंगन समितियों की सिफारिशों को कड़ाई से लागू करना होगा. जब तक सरकारें अल्पकालिक आर्थिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं देंगी, तब तक वायनाड जैसे खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र मासूमों की कब्रगाह बनते रहेंगे.