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प्याज की तरह सारे महाद्वीप परत-दर-परत छीले जा रहे हैं, क्या फटने वाला है बहुत बड़ा ज्वालामुखी?

पृथ्वी अपने महाद्वीपों को नीचे से धीरे-धीरे छील रही है. छीलने से निकला पदार्थ पृथ्वी की दूसरी लेयर में पहुंचकर लाखों साल तक ज्वालामुखी द्वीपों में विस्फोट करती रहती है. क्या सभी महाद्वीप एकदिन प्याज की तरह छिल जाएंगे.

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पृथ्वी जिस तरह से महाद्वीपों को छील रही है, उससे जल्द बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट हो सकता है. (Photo: Pixabay)
पृथ्वी जिस तरह से महाद्वीपों को छील रही है, उससे जल्द बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट हो सकता है. (Photo: Pixabay)

हमारी धरती अंदर की तरफ से महाद्वीपों को छील रही है. यानी निचले हिस्से को प्याज की तरह एक-एक करके परत-दर-परत निकाल रही है. इस प्रोसेस से निकलने वाला पदार्थ समु्द्र के नीचे वाले मैंटल में जा रहा है. यानी पृथ्वी की दूसरी लेयर में. इस सामग्री के कारण समुद्र के बीच बने ज्वालामुखी द्वीपों में बार-बार विस्फोट हो रहे हैं. 

साउथेम्पटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह रिसर्च की है. अध्ययन नेचर जियोसाइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है. शोधकर्ताओं का कहना है कि महाद्वीप सिर्फ ऊपर से नहीं टूटते, बल्कि उनके नीचे का हिस्सा भी छिलकर मैंटल में चला जाता है. यह सामग्री लाखों साल तक ज्वालामुखी गतिविधि को चलाती रहती है.

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समुद्र के बीच बने कई द्वीपों जैसे क्रिसमस आइलैंड में ऐसी रासायनिक चीजें पाई जाती हैं जो आमतौर पर सिर्फ महाद्वीपों में होती हैं. वैज्ञानिकों को यह बात हमेशा हैरान करती थी कि महाद्वीप से इतनी दूर समुद्र के बीच ये चीजें कहां से आ रही हैं. अब इस नई खोज ने इसका जवाब दे दिया है.

Earth peeling continents

कैसे छिल रहे हैं महाद्वीप?

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जब महाद्वीप टूटते हैं तो पृथ्वी के अंदर गहरे में बहुत तनाव पैदा होता है. इससे 150 से 200 किलोमीटर की गहराई पर मेंटल वेव यानी मैंटल लहर बनती है. यह लहर बहुत धीरे-धीरे चलती है- लगभग घोंघे की गति का दस लाखवां हिस्सा. यह लहर महाद्वीप के नीचे की सामग्री को छीलती है. उसे 1000 किलोमीटर तक दूर समुद्री मैंटल में ले जाती है. वहां पहुंचकर यह सामग्री पिघलती है. ज्वालामुखी शुरू कर देती है. यह प्रक्रिया लाखों साल तक चलती रहती है.

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भारतीय महासागर का उदाहरण

वैज्ञानिकों ने गोंडवाना महाद्वीप के टूटने के बाद हिंद महासागर में हुई ज्वालामुखी गतिविधि का अध्ययन किया. जब गोंडवाना टूटा तो महाद्वीप के नीचे से बहुत सारी सामग्री छिलकर समुद्र के अंदर चली गई. इसके कारण भारतीय महासागर के सीमाउंट इलाके में लगातार ज्वालामुखी फटे. समय के साथ यह प्रभाव कम होता गया, लेकिन आज भी उसके रासायनिक निशान मौजूद हैं.

Earth peeling continents

पुरानी धारणाओं को चुनौती

पहले वैज्ञानिक मानते थे कि समुद्री ज्वालामुखी या तो टेक्टॉनिक प्लेट्स के धंसने या गहरे मैंटल प्ल्यूम से बनते हैं. लेकिन नई खोज बताती है कि महाद्वीपों के नीचे से छिलने वाली सामग्री भी इसका बड़ा कारण है. इससे पुरानी थ्योरी को चुनौती मिली है. इस स्टडी के मुख्य लेखक प्रोफेसर थॉमस गर्नन ने कहा कि हम दशकों से जानते थे कि समुद्री मैंटल में महाद्वीपीय सामग्री है, लेकिन अब हमें पता चल गया है कि वह वहां कैसे पहुंच रही है.

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यह खोज सिर्फ ज्वालामुखियों को समझने में मदद नहीं करेगी, बल्कि हीरे के विस्फोट और महाद्वीपों के अंदरूनी बदलावों को भी समझने में उपयोगी साबित होगी. पृथ्वी की अंदरूनी गतिविधियां अब भी सक्रिय हैं. लाखों साल पुरानी घटनाएं आज भी प्रभाव डाल रही हैं. 

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