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साइंस न्यूज़

नेपाल में ऐसी तबाही पहले नहीं देखी! ग्लेशियर और पहाड़ टूटा, कैसे आया ये जलप्रलय?

Nepal Flood 2026
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नेपाल में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी. इसकी शुरुआत नेपाल-चीन सीमा के पास ऊंचे हिमालयी इलाके में हुई. इसके बाद पानी के साथ मिट्टी, बर्फ, चट्टान और मलबा तेजी से नीचे आया और भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के रास्ते आगे बढ़ता गया. इसका असर रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहूं, नवलपरासी ईस्ट, नवलपरासी वेस्ट और चितवन समेत 8 जिलों में देखा गया. Photo: AP

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1 सितंबर तक नेपाल में 1,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी थी और करीब 3,900 लोग लापता थे. बचाव टीमों ने 11,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला है. लापता लोगों में विदेशी नागरिक, सुरक्षाकर्मी और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं. Photo: AFP

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यह सामान्य बारिश के बाद आने वाली बाढ़ नहीं थी. शुरुआती वैज्ञानिक जांच के मुताबिक ऊंचे हिमालयी इलाके में ग्लेशियर और चट्टानों से जुड़ा बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया. यह मलबा नदी में पहुंचा तो पानी का बहाव अचानक बहुत तेज हो गया. इसी वजह से बाढ़ कुछ ही समय में बेहद खतरनाक बन गई. Photo: AFP

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26 अगस्त की सुबह रसुवा जिले में ल्हेंदे खोला के आसपास अचानक पानी और मलबे का बहाव बढ़ा. ल्हेंदे खोला आगे चलकर भोटेकोशी नदी से जुड़ता है. इसके बाद तेज पानी और मलबा नदी के रास्ते नीचे की ओर बढ़ता गया. इस बहाव में सिर्फ पानी नहीं था. मिट्टी, बड़ी चट्टानें, पेड़, बर्फ और पहाड़ से आया मलबा भी इसमें शामिल था. इसलिए इसका असर सामान्य बाढ़ से काफी ज्यादा रहा. Photo: AP

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रास्ते में आने वाले घर, सड़कें और पुल बह गए. कई जगह बिजली और दूसरी जरूरी सुविधाओं को भी नुकसान हुआ. पहाड़ी इलाकों में सड़कें टूटने के कारण राहत टीमों के लिए प्रभावित जगहों तक पहुंचना मुश्किल हो गया. शुरुआती जानकारी में यह भी सामने आया कि घटना के दौरान जमीन में ऐसी हलचल रिकॉर्ड हुई जिसे भूकंप मापने वाले उपकरणों ने दर्ज किया. बाद की जांच में संकेत मिला कि यह हलचल बड़े पैमाने पर मलबा खिसकने से पैदा हुई थी, न कि किसी बड़े भूकंप से. Photo: AP

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इस घटना को समझने के लिए फ्लैश फ्लड को समझना जरूरी है. फ्लैश फ्लड यानी ऐसी बाढ़ जिसमें पानी बहुत कम समय में अचानक बढ़ जाता है. नेपाल की इस घटना में खतरा इसलिए और बढ़ गया क्योंकि पानी के साथ भारी मलबा भी बह रहा था. चट्टान और मिट्टी के इस मलबे ने बहाव को और ताकत दी. Photo: AP

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शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक त्रिशूली नदी का जलस्तर करीब 30 मिनट में 9 मीटर तक बढ़ गया था. इतनी तेजी से नदी का पानी बढ़ने पर आसपास रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगह जाने का बहुत कम समय मिलता है. यही वजह है कि कई लोगों को अचानक आई इस बाढ़ से संभलने का मौका नहीं मिला. Photo: AP

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इस बाढ़ का असर नेपाल के कम से कम 8 जिलों में हुआ. इनमें रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहूं, नवलपरासी ईस्ट, नवलपरासी वेस्ट और चितवन शामिल हैं. रसुवा और नुवाकोट जैसे पहाड़ी इलाकों में बाढ़ और मलबे ने सड़क और पुलों को नुकसान पहुंचाया. वहीं नीचे की तरफ बहता पानी और मलबा चितवन तथा नवलपरासी के इलाकों तक पहुंचा. Photo: AP

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कई जगहों पर नदी किनारे बने घर और दूसरी इमारतें भी इसकी चपेट में आईं. कुछ जगहों पर पूरे के पूरे हिस्से मलबे से भर गए. आपदा के बाद आंकड़े लगातार बदल रहे हैं क्योंकि बचाव टीमों को अलग-अलग इलाकों से शव मिल रहे हैं और लापता लोगों की जानकारी भी अपडेट हो रही है. Photo: AP

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31 अगस्त को नेपाल की आपदा प्राधिकरण ने 903 शव मिलने की जानकारी दी थी और 4,200 से ज्यादा लोगों के लापता होने की बात कही थी. इसके बाद 1 सितंबर को मौतों का आंकड़ा 1,000 के पार पहुंच गया. लापता लोगों में विदेशी नागरिकों की संख्या भी काफी है. इसके अलावा नेपाल पुलिस, सेना, सशस्त्र पुलिस, कस्टम और इमिग्रेशन विभाग के कर्मचारी भी लापता बताए गए हैं. Photo: AP

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सबसे ज्यादा चिंता उन लोगों को लेकर है जिनका संपर्क अब तक अपने परिवार से नहीं हो पाया है. पहाड़ी इलाकों में मोबाइल नेटवर्क और सड़कें खराब होने के कारण किसी व्यक्ति का कुछ समय तक संपर्क से बाहर रहना भी संभव है. इसलिए लापता लोगों का आंकड़ा आगे बदल सकता है. Photo: AP

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नेपाल में बिजली बनाने के लिए बड़ी संख्या में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पहाड़ी नदियों के आसपास बनाए गए हैं. इस बाढ़ में कई ऐसे प्रोजेक्ट भी प्रभावित हुए. कई जगह कर्मचारी और मजदूर बाढ़ के बीच फंस गए. कुछ लोग सुरंगों में भी फंसे हुए हैं. मलबे और खराब रास्तों के कारण इन जगहों तक पहुंचना बचाव टीमों के लिए बड़ी चुनौती बन गया. Photo: AP

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वहीं करीब 639 हाइड्रोपावर कर्मचारियों के लापता होने की जानकारी सामने आई है. उन्हें खोजने के लिए भारी मशीनों और खास बचाव टीमों की मदद ली जा रही है. हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को हुआ नुकसान आगे नेपाल की बिजली व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल सकता है. Photo: AP

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नेपाल सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल ने बड़े स्तर पर रेस्क्यू अभियान चलाया. जहां सड़क से पहुंचना संभव नहीं था, वहां हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया. 31 अगस्त तक ही 10,451 लोगों को बचाया जा चुका था और 411 हेलिकॉप्टर उड़ानें रेस्क्यू अभियान में इस्तेमाल हुई थीं. Photo: AP

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इसके बाद 1 सितंबर तक बचाए गए लोगों की संख्या 11,000 से ऊपर पहुंच गई. नेपाल के अलावा चीन और भारत की टीमों ने भी राहत और बचाव में मदद की है. चीन ने ड्रोन और DNA जांच से जुड़े उपकरण भी भेजे हैं, ताकि लापता लोगों और बरामद शवों की पहचान में मदद मिल सके. Photo: AP

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बाढ़ के बाद लोगों के सामने एक और बड़ी समस्या साफ पानी और स्वास्थ्य की है. घरों के साथ पानी और सफाई की व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा है. कई परिवारों को खाने, पीने के पानी, दवाइयों और रहने की सुरक्षित जगह की जरूरत है. ऐसे हालात में गंदा पानी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. Photo: AP

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इसलिए राहत अभियान में सिर्फ लोगों को बचाना ही नहीं, बल्कि उन्हें खाना, पानी, दवाइयां और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाना भी जरूरी है. इस घटना को सीधे सिर्फ जलवायु परिवर्तन की वजह बताना अभी जल्दबाजी होगी. इसके लिए वैज्ञानिकों को घटना के सभी कारणों की जांच करनी होगी. Photo: AP

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लेकिन हिमालय तेजी से बदल रहा है. बढ़ते तापमान का असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है. ग्लेशियरों के पिघलने और उनके आसपास की जमीन में बदलाव से कुछ जगहें ज्यादा कमजोर हो सकती हैं. अगर किसी कमजोर हिस्से में बर्फ, चट्टान या मिट्टी का बड़ा हिस्सा टूटकर नदी में गिरता है तो अचानक पानी और मलबे का तेज बहाव पैदा हो सकता है. Photo: AP

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नेपाल की इस घटना में भी ग्लेशियर से जुड़ी बर्फ और चट्टानों के टूटने को बाढ़ की मुख्य वजह माना जा रहा है. जलवायु परिवर्तन ने इस घटना को कितना प्रभावित किया, इसका जवाब आगे होने वाली वैज्ञानिक जांच से ज्यादा साफ होगा. Photo: PTI

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पानी का स्तर कम होने के बाद भी खतरा खत्म नहीं हुआ है. बाढ़ के बाद कई जगह मिट्टी और चट्टानों का मलबा जमा है. पहाड़ी जमीन कमजोर हो चुकी है. ऐसे में लैंडस्लाइड यानी पहाड़ से मिट्टी और चट्टान खिसकने का खतरा बना हुआ है. अगर मलबा नदी में गिरता है तो पानी का रास्ता भी बदल सकता है और फिर अचानक बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है. Photo: PTI

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टूटे हुए पुल और सड़कें भी राहत अभियान में परेशानी पैदा कर रही हैं. इसलिए प्रभावित इलाकों में बचाव टीमों को काफी सावधानी से काम करना पड़ रहा है. ऐसी प्राकृतिक घटनाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन इनके नुकसान को कम किया जा सकता है. इसके लिए सबसे जरूरी है कि हिमालयी इलाकों में ग्लेशियर और पहाड़ी ढलानों पर लगातार नजर रखी जाए. नदियों के पानी का स्तर भी रियल टाइम में देखा जाए. Photo: PTI

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अगर किसी इलाके में पानी तेजी से बढ़ता है या पहाड़ में कोई बड़ा बदलाव दिखाई देता है तो वहां रहने वाले लोगों को तुरंत अलर्ट किया जा सकता है. इसके अलावा सड़क, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बनाते समय यह देखना जरूरी होगा कि वे बाढ़ और मलबे के रास्ते में तो नहीं हैं. Photo: PTI

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सबसे अहम चीज है अर्ली वार्निंग सिस्टम. अगर लोगों को बाढ़ आने से कुछ मिनट पहले भी सही चेतावनी मिल जाए तो वे ऊंची और सुरक्षित जगह पर पहुंच सकते हैं. फिलहाल सबसे जरूरी काम लापता लोगों की तलाश है. इसके साथ बरामद शवों की पहचान करना और उनके परिवारों तक जानकारी पहुंचाना भी जरूरी है. Photo: PTI

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इसके बाद टूटे हुए पुल, सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क को दोबारा शुरू करना होगा. जिन लोगों के घर और रोजी-रोटी का साधन खत्म हो गया है, उनके लिए लंबे समय तक मदद की जरूरत होगी. नेपाल की यह आपदा सिर्फ एक बड़ी बाढ़ की कहानी नहीं है. यह हिमालयी इलाकों में तेजी से बदलते खतरे की चेतावनी भी है. Photo: PTI

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ग्लेशियर, पहाड़ और नदियां एक-दूसरे से जुड़े हैं. इनमें से किसी एक में बड़ा बदलाव होने पर उसका असर बहुत दूर तक जा सकता है. इसलिए भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए सिर्फ बाढ़ आने के बाद रेस्क्यू करना काफी नहीं होगा. पहाड़ों में होने वाले बदलाव को पहले पहचानना, समय पर चेतावनी देना और लोगों को सुरक्षित जगह तक पहुंचाना ज्यादा जरूरी होगा. Photo: Reuters

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