शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं. उनका स्वरूप शांति, करुणा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है. देवी के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल होता है. वह वृषभ यानी बैल पर सवार रहती हैं. इसलिए उन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है. आइए जानते हैं कि नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजन विधि क्या है.
मां शैलपुत्री की पूजा विधि
नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें. पूजा स्थल पर लकड़ी की चौकी रखकर लाल कपड़ा बिछाएं और मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें. इसके बाद दीपक जलाएं और देवी को फूल, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करें. मां को सफेद रंग प्रिय माना जाता है. इसलिए सफेद फूल, दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगा सकते हैं. मान्यता है कि देवी की पूजा से सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त होती है.
कलश स्थापना का मुहूर्त
नवरात्र के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना करने का विधान है. हिंदू पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय बताया जा रहा है. इस तरह घटस्थापना के लिए करीब 3 घंटे 53 मिनट का समय मिलेगा. श्रद्धालु इस दौरान कलश स्थापना कर सकते हैं.
स्तोत्र पाठ करने से मिलेगा सौभाग्य का वरदान
शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जय कार॥
शिव-शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने न जानी॥
पार्वती तू उमा कहलावें।
जो तुझे सुमिरे सो सुख पावें॥
रिद्धि सिद्धि प्रदान करे तू।
दया करें धनवान करें तू॥
सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती जिसने तेरी उतारी॥
उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुःख तकलीफ मिटा दो॥
घी का सुन्दर दीप जला के।
गोला गरी का भोग लगा के॥
श्रद्धा भाव से मन्त्र जपायें।
प्रेम सहित फिर शीश झुकायें॥
जय गिरराज किशोरी अम्बे।
शिव मुख चन्द्र चकोरी अम्बे॥
मनोकामना पूर्ण कर दो।
चमन सदा सुख सम्पत्ति भर दो॥