श्राद्धपक्ष की शुरुआत हो गई है. ऐसे में खराब मौसम और बारिश के बावजूद बद्रीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ रहा है. देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालु पितरों की आत्मशांति और मोक्ष की कामना के लिए ब्रह्मकपाल में पिंडदान और तर्पण करते नजर आए हैं. स्थानीय तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, पहले दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने अपने पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण किया. बद्रीनाथ मंदिर से करीब 200 मीटर की दूरी पर अलकनंदा नदी के किनारे स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ को पितृ पूजन के लिए विशेष तीर्थ माना जाता है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसी धार्मिक मान्यता के चलते बद्रीनाथ को मोक्ष धाम भी कहा जाता है. ब्रह्मकपाल को कपाल मोचन तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है.
ब्रह्मकपाल की पौराणिक कथा
ब्रह्मकपाल को लेकर पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव ने क्रोधित होकर भगवान ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था. यह सिर भगवान शिव के त्रिशूल पर चिपक गया और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव तीनों लोकों में विचरण करते रहे. मान्यता है कि जब भगवान शिव बद्रीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल पहुंचे तो ब्रह्मा का वह सिर उनके त्रिशूल से अलग हो गया. इसी कारण इस स्थान को ब्रह्मकपाल और कपाल मोचन तीर्थ के नाम से जाना जाता है. पितरों के मोक्ष से जुड़ी धार्मिक मान्यता के चलते यहां श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है.
देश के कोने-कोने से श्राद्ध करने आ रहे लोग
श्राद्धपक्ष के पहले दिन दिल्ली, दक्षिण भारत, नेपाल, राजस्थान और बंगाल समेत देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालु बद्रीनाथ श्राद्ध पहुंचे. खराब मौसम के बावजूद ब्रह्मकपाल क्षेत्र में पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान का सिलसिला सुबह से ही जारी रहा. श्राद्ध कर्म में पिंडदान के लिए चावल, जौ और काले तिल का प्रयोग किया जाता है. धार्मिक परंपरा के अनुसार, श्राद्धपक्ष में पितरों के निमित्त भोजन अर्पित करने के साथ गाय, कौआ और कुत्ते को भी भोजन कराने की परंपरा है. चावल की खीर को भी श्राद्ध कर्म में विशेष महत्व दिया जाता है.
तीर्थ पुरोहित संजय हटवाल और हरीश सती बताते हैं कि गया और काशी सहित देश के कई तीर्थों में पिंडदान की परंपरा है. लेकिन ब्रह्मकपाल में पिंडदान का अपना विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. श्राद्धपक्ष में यहां देशभर से श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान के लिए पहुंचते हैं.