आज देशभर में दशहरा मनाया जा रहा है. दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था. इस मौके पर देशभर में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है. रामायण की कथा के अनुसार, रावण के साथ युद्ध करते समय श्रीराम को कई बार उसके सिर और भुजाओं पर प्रहार करना पड़ा, लेकिन वह बार-बार जीवित हो उठता था. फिर राम को उसके अमर रहने का रहस्य पता चला. तब जाकर राम ने सही दिशा में बाण चलाया और रावण का संहार हुआ. गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के लंका कांड में इस प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया है.
श्लोक
काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥
काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥
अर्थ
राम और रावण के बीच भीषण युद्ध चल रहा था. श्रीराम के बाणों से रावण के सिर और भुजाएं कट जाते थे, लेकिन कुछ ही समय बाद वे फिर से प्रकट हो जाते थे. इस कारण युद्ध लंबा खिंचता जा रहा था. रावण पर बार-बार प्रहार होते देखकर भी जब उसका अंत नहीं हुआ, तो देवता, सिद्ध और मुनि चिंतित हो उठे. तब प्रभु राम ने विभीषण की ओर देखा.
श्लोक
उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥
सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥
नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥
अर्थ
विभीषण जानते थे कि रावण की नाभि में अमृत कुंड होने के कारण उसका वध करना कठिन हो रहा था. उन्होंने भगवान श्रीराम को इसी रहस्य से अवगत कराया. विभीषण भगवान श्रीराम से कहते हैं कि हे प्रभु, आपकी इच्छा से काल तक का अंत हो सकता है. आप अपने भक्त की परीक्षा ले रहे हैं. आप संपूर्ण चराचर जगत के स्वामी और शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं. रावण की नाभि में अमृत कुंड है और इसी के बल पर वह अब तक जीवित है. विभीषण की बात सुनकर भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर अपने हाथ में विकराल बाण उठा लिया. अब उन्हें रावण का अंत करने का उपाय पता चल चुका था.
श्लोक
खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहां रामु रन हतौं पचारी॥
डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥
अर्थ
श्रीराम के बाणों ने रावण के अमृत कुंड को निष्प्रभावी कर दिया और उसके सिर व भुजाओं को काट दिया. इसके बाद उसका धड़ युद्धभूमि में दौड़ने लगा. उसे रोकने के लिए भगवान श्रीराम ने एक और बाण चलाकर उसके धड़ के दो टुकड़े कर दिए. मृत्यु के समय भी रावण भयंकर गर्जना करते हुए मानो श्रीराम को युद्ध के लिए ललकार रहा था. जब दस सिरों वाला रावण धरती पर गिरा तो भूमि कांप उठी. समुद्र, नदियां, पर्वत और दिशाओं के दिग्गज भी विचलित हो उठे. रावण का विशाल शरीर धरती पर गिरा और उसके दोनों हिस्सों ने युद्धभूमि में मौजूद वानरों व भालुओं के समूह को दबा दिया. इस तरह भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित की.