सावन में गाजियाबाद स्थित दूधेश्वरनाथ मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे हैं. मंदिर के बाहर करीब एक किलोमीटर लंबी कतार देखने को मिल रही है. इस मंदिर को स्वयंभू शिवलिंग वाला सिद्ध धाम माना जाता है. मान्यता है कि रावण के पिता यहां भगवान शिव की पूजा करते थे और पास के बिसरख गांव से मंदिर तक एक सुरंग भी थी. इसी धार्मिक आस्था के चलते सावन में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.
रावण से जुड़ी दूधेश्वरनाथ मंदिर की कहानी
दूधेश्वरनाथ मंदिर को एक सिद्ध शिव मंदिर माना जाता है. मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के परम भक्त रावण के पिता यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने आते थे. बताया जाता है कि पास के बिसरख गांव से मंदिर तक एक सीधी सुरंग थी, जिसके रास्ते वे रोज भगवान शिव को जल अर्पित करने पहुंचते थे. इसी वजह से इस मंदिर का रावण और उसके परिवार से विशेष संबंध बताया जाता है.
स्वयंभू शिवलिंग होने से बढ़ा महत्व
यहां मंदिर में स्थित स्वयंभू शिवलिंग भक्तों का सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है. मान्यता के अनुसार इस शिवलिंग की स्थापना किसी व्यक्ति ने नहीं की, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुआ था. इसी कारण श्रद्धालु इसे अत्यंत चमत्कारी और सिद्ध स्थान मानते हैं. सावन के महीने में यहां दर्शन और जलाभिषेक के लिए दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं.
सावन में उमड़ रहा जनसैलाब
सावन के पवित्र महीने में दूधेश्वरनाथ मंदिर परिसर और उसके बाहर भक्तों की भारी भीड़ दिखाई दे रही है. खास दिनों में मंदिर के मुख्य द्वार से बाहर तक लगभग एक किलोमीटर लंबी लाइन दिखाई देती है. तेज धूप हो या बारिश और उमस, श्रद्धालु पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं. मौसम की कठिनाइयों के बावजूद भक्तों की आस्था में कोई कमी नजर नहीं आती है. पिछले कुछ समय से इस मंदिर को लेकर मान्यता बहुत ज्यादा बढ़ गई है. देश-दुनिया के कोने-कोने से भक्त यहां दर्शन करने आ रहे हैं.
गाय से जुड़ी मंदिर की आस्था
दूधेश्वर महादेव की गाय से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा बहुत प्रचलित है. कहा जाता है कि पास के ही कैला गांव की गायें चरते हुए एक टीले पर पहुंच जाती थीं और यहां उनके थन से अपने आप दूध टपकने लगता था. इस अद्भुत घटना से हैरान ग्रामीणों ने जब टीले पर खुदाई कराई तो वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ. चूंकि यहां गायों के दूध से महादेव का अभिषेक होता था, इसलिए इसका नाम दूधेश्वर या दुग्धेश्वर महादेव नाम पड़ गया.