scorecardresearch
 

बसपा मैच्योरिटी टेस्टिंग लैब... आकाश आनंद की रिपोर्ट बार-बार फेल क्यों हो रही है?

बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा भतीजे आकाश आनंद को बार-बार पदमुक्त करने और अपरिपक्व ठहराने के सियासी फैसले हैरान करने वाले हैं. क्या यह पार्टी का कड़ा अनुशासन है या फिर अति-सुरक्षात्मक रवैया, जिसने कैडर को भ्रमित कर दिया है?

Advertisement
X
आकाश आनंद को बसपा कार्यकर्ता भले चांदी की सिक्कों से तौल रहे हों, लेकिन वो मायावती की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं. (Photo- PTI)
आकाश आनंद को बसपा कार्यकर्ता भले चांदी की सिक्कों से तौल रहे हों, लेकिन वो मायावती की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं. (Photo- PTI)

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इन दिनों किसी राजनीतिक दल से ज्यादा एक ‘क्वालिटी कंट्रोल लैब’ जैसी नजर आती है. इस लैब की एकमात्र चीफ साइंटिस्ट हैं बहन कुमारी मायावती, और उनके हर प्रयोग के एकमात्र सैंपल हैं उनके भतीजे आकाश आनंद.

भारतीय राजनीति में उत्तराधिकार ट्रांसफर करने की प्रक्रिया काफी सरल मानी जाती है, जहां वरिष्ठ नेता हाथ पकड़कर कुर्सी पर बिठा देते हैं और जनता धीरे-धीरे उसकी आदत डाल लेती है. लेकिन बसपा का मामला थोड़ा अलग है. यहां उत्तराधिकारी बनने के लिए एक कठिन राजनीतिक मैच्योरिटी टेस्ट देना पड़ता है. विडंबना यह है कि आकाश आनंद हर कुछ महीनों में यह परीक्षा देते हैं, और हर बार बुआ जी का बयान या ट्वीट आ जाता है कि सैंपल अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुआ है, इसलिए इसे दोबारा लैब में भेजा जा रहा है.

डिमोशन, प्रमोशन और अपरिपक्वता का अनोखा चक्र

आकाश आनंद के राजनीतिक करियर का ग्राफ अगर किसी शेयर बाजार के चार्ट पर देखा जाए, तो अनुभवी निवेशक भी अपना माथा पकड़ लेंगे. मायावती ने उन्हें एक बार नहीं, बल्कि कई बार बड़ी जिम्मेदारी सौंपी और फिर अचानक से उनसे सारे पद वापस ले लिए. 

Advertisement

दिसंबर 2023 में मायावती ने बड़े धूमधाम से आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था. उस वक्त लगा कि बसपा में नई पीढ़ी का दौर शुरू हो गया है. आकाश ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं, आक्रामक भाषण दिए और खुद को दलित युवाओं के नए चेहरा के रूप में पेश किया.
लेकिन मई 2024 में लोकसभा चुनाव के बीच में सीतापुर में दिए गए एक तीखे भाषण के बाद जब पुलिस में मामला दर्ज हुआ, तो मायावती का फरमान आ गया. उन्होंने आकाश को अपरिपक्व बताते हुए नेशनल कोऑर्डिनेटर और उत्तराधिकारी के पद से हटा दिया. 

चुनाव खत्म होने के बाद जून 2024 में उनकी फिर से वापसी हुई. यह सिलसिला यहीं नहीं रुका. मार्च 2025 में एक विवाद के चलते आकाश को फिर पार्टी के सभी पदों से हटाया गया और बाद में पार्टी से निष्कासित तक कर दिया गया.

सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के बाद अप्रैल-मई 2025 में उनकी दोबारा वापसी हुई और उन्हें चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया गया. इसके बाद अब फिर से मायावती ने घोषणा कर दी है कि आकाश में अभी राजनीतिक परिपक्वता की कमी है, इसलिए उनसे संगठन की बड़ी जिम्मेदारियां वापस ली जाती हैं और वे सिर्फ एक कार्यकर्ता के रूप में काम करेंगे. हर बार पद छीनने का कारण एक ही बताया गया- अपरिपक्वता, अनुभवहीनता और विरोधी दलों की चालों से पार्टी को बचाना.

Advertisement

Gen-Z तेवर बनाम पुरानी बसपा: समर्थकों की बढ़ती झुंझलाहट

आकाश आनंद की पढ़ाई लंदन में हुई है. उनका पहनावा, उनकी भाषा और उनका अंदाज पारंपरिक बसपा नेताओं से काफी अलग है. वे सूट-बूट में दिखते हैं, सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं और अपने भाषणों में बेरोजगारी, शिक्षा और युवाओं के मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाते हैं. उनका यह 'Gen-Z' तेवर दलित युवाओं को अपनी ओर खींचता है.

लेकिन जैसे ही यह युवा वर्ग आकाश के पीछे लामबंद होने लगता है, मायावती का ब्रेक लग जाता है. इससे बसपा का नया और युवा समर्थक वर्ग बेहद नाराज और हताश है. उन्हें लगता है कि जिस दौर में अखिलेश यादव और राहुल गांधी आक्रामक राजनीति कर रहे हैं, उस दौर में उनके नेता को घर में ही 'पॉलिटिकल अरेस्ट' करके रखा जा रहा है. जब पार्टी ही अपने युवा नेता को गंभीरता से नहीं ले रही, तो जनता क्यों लेगी?

बुआ के ‘कंट्रोल सिस्टम’ के तीन सियासी मायने

आकाश आनंद को लेकर मायावती के इस इन-एंड-आउट रवैये को तीन अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है.

रिमोट कंट्रोल का मोह: मायावती उस दौर की नेता हैं जहां पार्टी में सिर्फ एक ही आवाज होती थी- उनकी अपनी. वे अपनी आंखों के सामने कोई दूसरा पावर सेंटर बनते नहीं देखना चाहतीं. अगर आकाश बहुत लोकप्रिय हो गए, तो बसपा के पुराने कैडर का झुकाव उनकी तरफ हो सकता है, जो मायावती के पूर्ण नियंत्रण के लिए खतरा बन सकता है.

Advertisement

सरकारी एजेंसियों का डर: विपक्षी खेमे से तंज किया जाता है कि जब भी आकाश केंद्र की सत्ताधारी पार्टी (भाजपा) के खिलाफ बहुत ज्यादा हमलावर होते हैं, तो बसपा पर केंद्रीय एजेंसियों का दबाव बढ़ने का खतरा रहता है. जैसे ही आकाश ने "आतंकवादियों की सरकार" जैसा बयान दिया, मायावती ने उन्हें तुरंत हटाकर एक तरह से सेफ रूट पकड़ लिया.

ओवर-प्रोटेक्टिव बुआ का नजरिया: एक तीसरा वर्ग मानता है कि मायावती सच में चाहती हैं कि आकाश राजनीति के दांव-पेंच सीखें. लेकिन उनका तरीका इतना सख्त है कि वे भतीजे को बिना लाइफ जैकेट के पानी में उतरने ही नहीं देतीं. जैसे ही तैरने की कोशिश में थोड़ा पानी नाक में जाता है, वे खींचकर बाहर निकाल लेती हैं.

हाशिये पर सिमटती बसपा में बुआ-भतीजे के टकराव की कितनी गुंजाइश?

यूपी की राजनीति में कभी 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' का नारा देकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य, 2019 में सपा के साथ गठबंधन करके 10 सीटें, और 2024 में फिर से शून्य. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ 1 सीट पर सिमटकर रह गई थी.

ऐसे में बुआ और भतीजे की यह बिगड़ी हुई केमिस्ट्री पार्टी के कार्यकर्ताओं को भ्रमित कर रही है. एक तरफ पार्टी का कैडर गायब हो रहा है, वोट बैंक खिसक रहा है, और दूसरी तरफ पार्टी का पूरा नेतृत्व इस खेल में उलझा है कि आकाश आनंद आज मैच्योर हैं या कल होंगे. जब सेनापति ही मैदान में बार-बार बदला जाएगा, तो सिपाही किसके भरोसे लड़ाई लड़ेंगे? यह मिसकैमिस्ट्री बसपा को मुख्य मुकाबले से बाहर धकेल रही है. सवाल उठ रहा है कि मायावती के पास फिलहाल खोने के लिए क्या है, जो वे आकाश आनंद को लेकर इतनी आशंकित हो रही हैं?

Advertisement

क्या है बसपा का गेम प्लान? अब तो प्रेशर ग्रुप भी नहीं रही पार्टी

आज बहुजन समाज पार्टी की वास्तविक हैसियत क्या है? यह सवाल अब सिर्फ विरोधियों का नहीं, बल्कि कई दलित चिंतकों का भी है. वो चुनावी रेस से बाहर है. पिछली एक दहाई से चुनावी हाशिये पर पहुंच चुकी बसपा के समर्थक भी मान चुके हैं कि अब बहनजी का असर पहले जैसा नहीं रहा. 

चुनाव जीतने की बात छोड़िए, अब वो वोटकटुआ के रोल में भी सिमटती जा रही है. एक दौर था जब बसपा जिस उम्मीदवार के साथ खड़ी हो जाती थी, उसका जीतना या दूसरे को हराना तय हो जाता था. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि बसपा का कोर जाटव वोट बैंक भी अब खिसककर समाजवादी पार्टी (PDA) और कांग्रेस के गठबंधन की तरफ शिफ्ट हो गया है. यानी अब बसपा 'वोट काटने' के मामले में भी उतनी असरदार नहीं रही.

कांशीराम ने बसपा को एक सामाजिक क्रांति और 'प्रेशर ग्रुप' के रूप में खड़ा किया था, जो सत्ता के केंद्र में न रहकर भी सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकती थी. आज बसपा दलितों के अधिकारों पर होने वाले अत्याचारों पर सड़क पर उतरने के बजाय सिर्फ प्रेस नोट जारी करने और ट्वीट करने तक सीमित हो गई है. 

Advertisement

बसपा का परफॉर्मेंस भले रसातल में चला गया हो, लेकिन बहनजी की ओर से आकाश आनंद के बार-बार परफॉर्मेंस अप्रेजल से लगता है, जैसे सारी समस्या की जड़ वही हों.

कांशीराम की कसौटी पर कैसे खरी उतरीं थीं मायावती

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने मायावती में बहुजन राजनीति के प्रति निष्ठा और तेवर देखे थे, और फिर उन्हें एक के बाद एक लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नेतृत्व सौंपा. मायावती न सिर्फ लोकसभा और विधानसभा में गईं, बल्कि यूपी जैसे सबसे बड़े और जटिल राज्य की मुख्यमंत्री बनीं. ये सब कांशीराम के बसपा सुप्रीमो रहते हुआ. मायावती जब अपनी राजनीति के सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुंच गई थीं, तब जाकर 2001 में कांशीराम ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. लेकिन, आकाश आनंद को तो अपनी राजनीतिक पारी का पहला पड़ाव पार करने में ही पसीने आ रहे हैं. वे कुछेक सभाएं करते हैं, और उन्हें पद से हटा दिया जाता है. बेशक, वे मायावती के भतीजे हैं, इसीलिए उन्हें बार बार मौके भी मिल रहे हैं. लेकिन, इस मोह में कि आकाश आनंद आज नहीं तो कल मैच्योर हो जाएंगे, मायावती उन्हें कमजोर ही कर रही हैं.

क्या आकाश आनंद कभी 'अपरिपक्व' के टैग से उबर पाएंगे?

यह एक ऐतिहासिक सच है कि मायावती का सियासी कद बहुत बड़ा है. भले ही उनकी पार्टी चुनाव हार रही हो, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके नाम का एक अलग ही खौफ और सम्मान रहा है. जब वे बोलती हैं, तो प्रशासनिक अमला और विरोधी दल दोनों ध्यान से सुनते हैं. लेकिन त्रासदी यह है कि मायावती अपनी इसी 'कड़क छवि' का इस्तेमाल जब अपने ही भतीजे पर करती हैं, तो उसका असर उल्टा होता है.

Advertisement

सार्वजनिक मंचों और खासकर अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से जिस तरह वे आकाश आनंद को बार-बार 'अपरिपक्व' ठहराती हैं, पद से हटाती हैं और फिर बहाल करती हैं, वह आकाश के राजनीतिक करियर पर एक बहुत बड़ा निगेटिव टैग लगा देता है. राजनीति में किसी नेता के लिए सबसे घातक होता है उसे 'नॉन-सीरियस' या 'अपरिपक्व' मान लिया जाना. जिस तरह एक समय कांग्रेस में राहुल गांधी के खिलाफ एक सुनियोजित 'पप्पू' ब्रांडिंग की गई थी, ठीक वैसा ही टैग आकाश आनंद पर किसी विरोधी ने नहीं, बल्कि खुद उनकी अपनी बुआ ने से लगा दिया है.

जब बसपा सुप्रीमो खुद दुनिया के सामने यह स्वीकार कर लेती हैं कि उनका उत्तराधिकारी अभी समझदार नहीं हुआ है, तो वे अनजाने में ही सही, आकाश के राजनीतिक भविष्य पर 'अयोग्यता' का ऐसा ठप्पा लगा देती हैं. 

बसपा की मैच्योरिटी टेस्टिंग लैब से आकाश आनंद को कब 'पासिंग सर्टिफिकेट' मिलेगा, यह तो बुआ जी ही जानें. लेकिन इतना तय है कि अगर यह लैब ऐसे ही चलती रही, तो जब तक आकाश 'मैच्योर' होंगे, तब तक शायद टेस्ट देने के लिए पार्टी ही नहीं बचेगी.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement