scorecardresearch
 

ममता को अधीर रंजन का चैलेंज? पुरानी अदावत से बंगाल में कांग्रेस का नया खेला

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की रणनीति जो भी हो, भूमिका क्या होगी, सवाल उठ रहे हैं. बंगाल में मुख्य मुकाबला टीएमसी और बीजेपी के बीच है, जबकि कांग्रेस सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है - पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की रणनीति दिल्ली और बिहार चुनाव से कितना अलग होगी?

Advertisement
X
पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी का व्यवहार ममता बनर्जी के साथ अरविंद केजरीवाल और तेजस्वी यादव जैसा ही होगा या अलग. (Photo: PTI)
पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी का व्यवहार ममता बनर्जी के साथ अरविंद केजरीवाल और तेजस्वी यादव जैसा ही होगा या अलग. (Photo: PTI)

ठीक एक महीने बाद पश्चिम बंगाल में पहले चरण के लिए मतदान होंगे. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग दो चरणों में हो रही है. पहला 23 अप्रैल को, और दूसरा 29 अप्रैल को. वोटों की गिनती 4 मई, 2026 को होनी है. 

पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला तो तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में है, लेकिन कांग्रेस भी विधानसभा की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी तो 291 सीटों पर ही लड़ रही है, कांग्रेस के उम्मीदवार टीएमसी से भी तीन ज्यादा होंगे. टीएमसी ने तीन सीटें सहयोगी भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा के लिए छोड़ी है. 

चुनाव मैदान में ममता बनर्जी को चैलेंज करने के लिए सस्पेंड किए जाने से पहले तक उनके ही विधायक रहे हुमायूं कबीर ने AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी के साथ चुनावी गठबंधन किया है - सवाल ये है कि कांग्रेस वास्तव में विधानसभा के चुनाव ही लड़ रही है, या राहुल गांधी अपनी लड़ाई ममता बनर्जी से मानकर चल रहे हैं?

पांच साल में बदल चुकी है बंगाल की लड़ाई 

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को छोड़कर तकरीबन सभी का एजेंडा सामने आ चुका है. जैसे हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी अपना मैसेज तो दे ही चुके हैं. वे दोनों मुस्लिम वोट बैंक ही वजह से मैदान में हैं. हुमायूं कबीर तो अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखने के लिए बाबरी मस्जिद ही बनवा रहे हैं - आज तक रेडियो के रिपोर्टर्स ऑफ एयर पश्चिम बंगाल चुनाव पर हुई चर्चा में कई महत्वपूर्ण बातें मालूम हुई हैं. 

Advertisement

1. बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति इस बार पूरी तरह बदल दी है. पहले की तरह वो केंद्रीय नेताओं के भरोसे नहीं है. बल्कि स्थानीय नेताओं को तरजीह देते हुए पहले ही उनको जिम्मेदारी दे दी गई है - और यही वजह है कि ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने भी उसी हिसाब से बीजेपी को काउंटर करने की कोशिश कर रही है. 

2. बीजेपी का कैंपेन इस बार केंद्रीय कमान की जगह स्थानीय नेताओं के हाथ में दिया गया है. बेशक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बीजेपी के स्टार प्रचारक हैं, और रहेंगे. लेकिन, अमित शाह कोई डेरा नहीं डालने जा रहे हैं. चाहे वो रानाघाट की जिम्मेदारी हो, चाहे मेदिनीपुर की. हर जगह की जिम्मेदारी नेताओं को अलग अलग सुपुर्द कर दी गई है - क्या कांग्रेस में भी ऐसी कोई रणनीति अपनाई गई है.

3. शुभेंदु अधिकारी से लेकर जगन्नाथ सरकार तक अपने अपने हिस्से की सीटें देख रहे हैं. रानाघाट की 7-8 सीटें तो पूरी तरह जगन्नाथ सरकार के हवाले हैं. शुभेंदु अधिकारी को तो ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर के मैदान में उतार दिया गया है. पिछली बार तो करीब 2 हजार वोटों से शिकस्त भी दे डाली थी, इस बार मुकाबला ममता बनर्जी के गृह मैदान पर है - लेकिन, मैदान में कांग्रेस कहां या किस स्थिति में है?

Advertisement

4. पिछली बार बीजेपी के खिलाफ ममता बनर्जी ने बंगाली अस्मिता को ढाल बनाया, और कामयाब रहीं. बांग्ला भाषा, बंगाली समुदाय और पश्चिम बंगाल का मुद्दा ममता बनर्जी इस बार भी उठा रही हैं, लेकिन बीजेपी स्थानीय मुद्दों के बीच उनको उलझाने की कोशिश कर रही है - कांग्रेस भी क्या ऐसी कोई रणनीति अपना रही है?

5. बीजेपी इस बार स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और लोगों का गुस्सा भुनाने की कोशिश कर रही है. कहीं साइक्लोन आया और पैसे नहीं मिले, लोगों को गुस्सा तो स्वाभाविक रूप से आएगा ही. बीजेपी हर हाल में उसे ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है - क्या कांग्रेस की तरफ से भी ऐसी कोई कोशिश हो रही है?

लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद अधीर रंजन चौधरी को हटाकर शुभंकर सरकार को बंगाल कांग्रेस की कमान दी गई थी. अब मोर्चे पर आगे तो शुभंकर सरकार ही हैं, सुना है अधीर रंजन चौधरी भी बहरामपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं. जब से ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी हैं, अधीर रंजन चौधरी आगे बढ़कर तृणमूल कांग्रेस नेता को चैलेंज करते रहे हैं. 2019 में उनको सांसद बनाकर दिल्ली लाया गया. लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया. 2021 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन, 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के साथ ही उनसे बंगाल कांग्रेस की कमान भी छीन ली गई. 

Advertisement

क्या है ममता बनाम अधीर की पुरानी अदावत

ममता बनर्जी और कांग्रेस के कद्दावर नेता अधीर रंजन चौधरी के बीच अदावत बहुत पुरानी है. दोनों ने बंगाल की राजनीति की लेकिन साउथ बंगाल में मजबूत पकड़ रखने वाली टीएमसी ने कभी अधीर को उनके गढ़ मुर्शिदाबाद में नहीं हरा पाई. हालांकि, 2024 में ये रिकॉर्ड टूट गया. अधीर को इसका दुख भी बहुत हुआ. उन्होंने एक बयान में कहा था- दीदी मुझे हराने के लिए गुजरात से एक बाहरी मुस्लिम को ले आई. अच्छा होता वो अगर किसी लोकल को मेरे खिलाफ चुनाव लड़ाती. बता दें कि बहरामपुर से टीएमसी ने पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को उम्मीदावर बनाया था और वो जीत गए. इसी तरह 25 साल बाद अपने ही गढ़ में अधीर को हार मिली थी. इसके बाद से ही उन्होंने ममता बनर्जी के खिलाफ जुबानी हमले तेज कर दिए थे. वो इस बार विधानसभा चुनाव में अपनी इस हार का बदला जरूर लेना चाहेंगे.

कांग्रेस का प्रभाव मालदा और मुर्शिदाबाद में माना जाता है. मालदा और मुर्शिदाबाद में 40 विधानसभा सीटें हैं, और कांग्रेस इलाके की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश में है - वो भी तब जबकि पिछले चुनाव में खाता जीरो बैलेंस हो गया था. 

Advertisement

बंगाल के चुनाव मैदान में, या ममता बनर्जी के विरोध में

कांग्रेस की दलील है कि पश्चिम बंगाल में संगठन और कार्यकर्ता लंबे समय से अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ चुनाव मैदान में उतरने की मांग कर रहे थे. और, स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने अकेले चुनाव लड़ने के फैसले को मंजूरी दी. 

2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की क्या भूमिका होने जा रही है, अंदाजा कैसे लगाया जाए? 

क्या राहुल गांधी दिल्ली और बिहार की तरह बंगाल में भी कांग्रेस को चुनाव लड़ाने वाले हैं, या 2021 की ही तरह रस्मअदायगी निभाने की तैयारी है? 

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ही ममता बनर्जी ने घोषणा कर डाली थी कि वो अकेले चुनाव लड़ेंगी. और, विधानसभा चुनाव से पहले भी ममता बनर्जी ने ठीक वैसा ही रास्ता अख्तियार किया है. ममता बनर्जी चाहती थीं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग कांग्रेस लाए, और तृणमूल कांग्रेस का सपोर्ट करे - लेकिन, पश्चिम बंगाल चुनाव से दूर रहे. 

लोकसभा चुनाव 2024 में तो ममता बनर्जी कांग्रेस को दो सीटें देने को तैयार भी थीं, लेकिन बाद में उससे भी मुकर गईं. और, राहुल गांधी के भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ पश्चिम बंगाल में प्रवेश की पूर्व संध्या पर ही 'एकला चलो रे' घोषणा कर दी थी. 

Advertisement

2021 में राहुल गांधी एक दिन के लिए चुनाव कैंपेन करने गए थे. तभी कोविड-19 का प्रकोप बढ़ा, और कांग्रेस सहित सभी दलों ने अपना कैंपेन रोक दिया था. हालांकि, कांग्रेस की रैली में राहुल गांधी तब ममता बनर्जी को भी वैसा ही बता रहे थे, जैसी राय वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में रखते हैं. 

2025 के दिल्ली और बिहार चुनावों में राहुल गांधी के तेवर को देखें तो अंदाज काफी अलग था. दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के खिलाफ उतने ही आक्रामक नजर आते थे, जितने बीजेपी के नेता. भ्रष्टाचार के एक एक आरोप गिनाकर राहुल गांधी ने अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर दिया था. 

अरविंद केजरीवाल के हमलों को देखें तो कांग्रेस के प्रति ममता बनर्जी जैसा ही रवैया था. ममता बनर्जी ने तो विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक में रहते हुए भी दिल्ली चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ अरविंद केजरीवाल का समर्थन किया था. बिहार चुनाव में राहुल गांधी के तेवर दिल्ली जैसे तो नहीं थे, लेकिन कोई कमी भी नहीं छोड़ी थी. तेजस्वी यादव के साथ खड़े होकर भी कभी ऐसा नहीं लगा कि राहुल गांधी वास्तव में सपोर्ट कर रहे हैं. 

अब तो बंगाल के मैदान में देखना होगा कि पांच साल में कुछ बदला है भी या नहीं? राहुल गांधी कांग्रेस को पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ा रहे हैं, या ममता के खिलाफ वैसी ही लड़ाई लड़ रहे हैं जैसी अरविंद केजरीवाल या तेजस्वी यादव के खिलाफ लड़ चुके हैं?

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement