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यूजीसी नियम, कौन बैकफुट पर 

यूजीसी के 2026 इक्विटी नियमों पर विवाद के बीच केंद्र सरकार ने समीक्षा के लिए समिति बनाने के संकेत दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद सरकार के इस रुख से नियमों में बदलाव की संभावना बढ़ी है. अब चुनौती ऐसा प्रावधान तैयार करने की है, जो जातिगत भेदभाव रोकने के साथ सभी वर्गों के छात्रों को समान शिकायत का अधिकार दे.

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यूजीसी नियमों पर बढ़ा विवाद. (Photo: ITG)
यूजीसी नियमों पर बढ़ा विवाद. (Photo: ITG)

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए बयान ने यूजीसी के 2026 इक्विटी रेगुलेशंस पर चल रहे विवाद को नया मोड़ दे दिया है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि सरकार इन नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने पर विचार कर रही है, ताकि हर छात्र का ख्याल रखा जा सके और किसी भी वर्ग में असंतोष या आशंका न रहे. यह कदम उस समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में ही इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी और उन्हें प्रथम दृष्टया अस्पष्ट तथा दुरुपयोग की संभावना वाला बताया था.

यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2026, 13 जनवरी को अधिसूचित हुए थे. इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकना था. संस्थानों को इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर और इक्विटी कमेटी बनाने की बात थी. विवाद का केंद्र विनियमन 3(सी) बना, जिसमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा मुख्य रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव तक सीमित थी. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायत निवारण तंत्र से बाहर रखा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे अस्पष्ट भाषा कहा और चेतावनी दी कि व्यापक परिणाम हो सकते हैं तथा समाज विभाजित हो सकता है. तब से 2012 के पुराने नियम लागू हैं.

सरकार का गुरुवार का रुख यह संकेत देता है कि वह नियमों के मौजूदा स्वरूप पर अडिग नहीं रहना चाहती. हर छात्र का ख्याल और किसी को असंतुष्ट नहीं महसूस करना चाहिए जैसे वाक्य न्यायालय के समक्ष कहे गए. यह स्वीकारोक्ति है कि नियमों में असंतुलन की आशंका मौजूद है. साथ ही यह भी दर्शाता है कि सरकार पर कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक दबाव दोनों काम कर रहे हैं. एक ओर दलित-ओबीसी संगठनों की मांग है कि भेदभाव के खिलाफ मजबूत प्रावधान बने रहें, दूसरी ओर सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने इन्हें एकतरफा और दुरुपयोग योग्य बताया. सड़कों पर प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर बहस दोनों जारी रहे. ऐसे माहौल में सरकार का समिति बनाने का प्रस्ताव व्यावहारिक लगता है.

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यह कदम नेक दिशा में है. उच्च शिक्षा में भेदभाव की समस्या वास्तविक है. रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसी घटनाओं ने दिखाया कि कैंपस में जातिगत उत्पीड़न के गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इसलिए सुरक्षा तंत्र जरूरी है. लेकिन सुरक्षा किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं हो सकती. संविधान सभी नागरिकों को समान संरक्षण देता है. यदि नियम केवल कुछ वर्गों को शिकायत का अधिकार देते हैं और बाकी को बाहर रखते हैं, तो वे स्वयं भेदभाव पैदा कर सकते हैं. अस्पष्ट भाषा दुरुपयोग का रास्ता खोलती है. झूठी शिकायतें, संस्थागत दबाव या राजनीतिक इस्तेमाल की संभावना बनी रहती है. सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सही था कि भाषा को संशोधित करने की जरूरत है.

अब सवाल यह है कि सरकार वास्तव में क्या करेगी. समिति बनाना समय लेने का तरीका हो सकता है, लेकिन यदि समिति में विविध विशेषज्ञ, शिक्षाविद और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएं तथा उसकी सिफारिशें सार्वजनिक हों, तो संतुलित समाधान निकल सकता है. सरकार को इन नियमों से पल्ला झाड़ना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें सुधारना चाहिए. भेदभाव विरोधी प्रावधान बने रहें, पर वे समावेशी हों. सामान्य वर्ग के छात्रों को भी शिकायत का अधिकार मिले. प्रक्रिया पारदर्शी हो और झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान हो. 2012 के नियमों को आधार बनाकर आगे बढ़ाया जा सकता है, बजाय पूरी तरह नए और विवादित ढांचे पर अड़े रहने के.

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यह मुद्दा सिर्फ यूजीसी नियमों का नहीं है. यह इस बात का भी संकेत है कि सामाजिक न्याय की नीतियां बनाते समय संतुलन कितना जरूरी है. एक वर्ग की सुरक्षा दूसरे वर्ग की अनदेखी पर आधारित नहीं हो सकती. सरकार के आज के बयान से उम्मीद जगी है कि वह नियमों को न्यायसंगत और व्यावहारिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगी. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह प्रक्रिया चलेगी, जो अच्छा है. अंतिम परीक्षा यह होगी कि समिति की सिफारिशें कितनी निष्पक्ष और प्रभावी साबित होती हैं. यदि सरकार दबाव में सिर्फ टालमटोल करेगी, तो विवाद जारी रहेगा. यदि वह वास्तव में सभी छात्रों के हित में संशोधन करती है, तो यह एक सकारात्मक मिसाल बनेगी. उच्च शिक्षा संस्थानों में शांति और समानता दोनों के लिए यही जरूरी है.

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